पिता एक नाबालिग बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक: उच्च न्यायालय

पिता एक नाबालिग बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक: उच्च न्यायालय

पिता एक नाबालिग बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक: उच्च न्यायालय
Modified Date: April 19, 2026 / 12:39 am IST
Published Date: April 19, 2026 12:39 am IST

प्रयागराज, 18 अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग बच्चे की मां द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि पिता एक हिंदू नाबालिग का प्राकृतिक संरक्षक होता है और जब तक किसी न्यायालय के आदेश का उल्लंघन कर बच्चे को उसकी मां से जबरन अलग नहीं किया जाता, तब तक पिता की अभिरक्षा को अवैध नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उसका पूर्व पति 2022 में बंदूक के बल पर उसके दो नाबालिग बच्चों को अपने साथ ले गया और तब से उन्हें अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने ‘तेजस्विनी गौड एवं अन्य बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी’ मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों की अभिरक्षा के मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तभी स्वीकार्य होती है, जब अभिरक्षा अवैध या बिना वैधानिक अधिकार के हो।

अंजलि देवी की ओर से दलील दी गई कि बच्चों की अभिरक्षा के लिए विभिन्न मंचों पर कई आवेदन किए गए, लेकिन संबंधित अधिकारियों द्वारा कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

अदालत ने 10 अप्रैल को पारित अपने आदेश में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 361 की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी नाबालिग को उसके वैध अभिभावक से दूर करना अपराध है, लेकिन यह अपराध तभी बनता है जब बच्चे को उसके प्राकृतिक संरक्षक से अलग किया जाए। अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम की धारा 4(2) के अनुसार पिता को प्राकृतिक संरक्षक माना गया है।

अदालत ने कहा कि केवल यह आरोप कि पिता ने बच्चों को जबरदस्ती मां से अलग किया, अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि बच्चे अवैध अभिरक्षा में हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में पांच वर्ष से अधिक उम्र के दोनों बच्चे 2022 से अपने पिता के साथ रह रहे हैं और कोई ऐसी असाधारण परिस्थिति प्रस्तुत नहीं की गई है जिससे यह प्रतीत हो कि उनकी अभिरक्षा अवैध है, ऐसे में इस अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

भाषा सं राजेंद्र खारी

खारी


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