अब न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है : कानूनी विशेषज्ञ

अब न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है : कानूनी विशेषज्ञ

अब न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है : कानूनी विशेषज्ञ
Modified Date: August 12, 2026 / 10:13 pm IST
Published Date: August 12, 2026 10:13 pm IST

नयी दिल्ली, 12 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति ने पिछले साल उनके सरकारी आवास से नकदी मिलने के मामले में लगाए गए आरोपों में उन्हें दोषी पाया है। कानूनी विशेषज्ञों ने बुधवार को यह बात कही।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायमूर्ति वर्मा के इस्तीफा देने के बाद महाभियोग की प्रक्रिया ‘‘अपने आप समाप्त’’ हो गई है।

इससे पहले दिन में समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी। रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश वर्मा अपने आधिकारिक आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत या स्वामित्व के संबंध में संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे।

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा याचिकाएं खारिज किए जाने का किसी नए कदम पर असर नहीं पड़ेगा।

उन्होंने कहा, ‘‘अब रिपोर्ट संसद में पेश हो चुकी है और उन्होंने (न्यायमूर्ति वर्मा) इस्तीफा भी दे दिया है, इसलिए उन्हें हटाया नहीं जा सकता। मेरी राय में महाभियोग प्रस्ताव अब निष्प्रभावी हो गया है, लेकिन रिपोर्ट के आधार पर निश्चित रूप से प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि उनके विचार से इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं किए जाने के कारण न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाया जा सकता है।

उन्होंने कहा, ‘‘इस्तीफा देने की स्थिति में न्यायमूर्ति वर्मा को पेंशन पाने का अधिकार होगा, जबकि महाभियोग के जरिये हटाए जाने पर उन्हें पेंशन संबंधी लाभ नहीं मिलेंगे। और दूसरी बात, अगर जांच समिति ने कहा है कि प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए, तो मुझे यकीन है कि प्राथमिकी दर्ज की जाएगी।’’

संविधान विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा पद से इस्तीफा दे देने के बाद महाभियोग का सवाल ही नहीं उठता।

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे विचार से संसद का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया है। जहां तक प्राथमिकी का सवाल है, संसदीय कार्यवाही इसमें बाधा नहीं बनती। जब वह न्यायाधीश थे, तब प्राथमिकी के लिए भारत के प्रधान न्यायाधीश की अनुमति जरूरी थी, क्योंकि उन्हें न्यायाधीश के रूप में संरक्षण प्राप्त था। लेकिन अब वह संरक्षण समाप्त हो गया है।’’

धवन ने कहा कि मामले में उचित जांच होनी चाहिए और यह केवल आपराधिक कार्यवाही के जरिये ही संभव है।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि समिति की रिपोर्ट के आधार पर न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है।

उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि समिति ने पूरी जिम्मेदारी न्यायमूर्ति वर्मा पर डाल दी है कि वह बताएं कि पैसा कहां से आया। अगर लुटियंस दिल्ली के एक एकड़ वाले बंगलों में रहने वाले सभी लोगों से उनके परिसरों में मिली हर वस्तु के बारे में जवाब मांगा जाए तो मेरा मानना है कि सैकड़ों प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ सकती हैं।’’

इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल तिवारी ने कहा कि अब न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है।

तिवारी ने कहा, ‘‘न्यायाधीशों को मिला संरक्षण उन्हें न्यायिक शक्तियों का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करने की अनुमति देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे अपने घर में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी रख सकते हैं। उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। अब सरकार को आगे बढ़ना चाहिए और कानून मंत्रालय को इस मामले में पहल कर प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए।’’

एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल सोनी ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा अब न्यायाधीश नहीं हैं और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर मामले की गहन जांच की जानी चाहिए।

भाषा शफीक सुरेश

सुरेश


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