नयी दिल्ली, 27 अगस्त (भाषा) दिल्ली की करीब एक सदी पुरानी हवेलियों और अन्य विरासत इमारतों को जल्द ही नया जीवन मिल सकता है। इन्हें केवल संरक्षित और संवारा ही नहीं जाएगा, बल्कि होटल, कार्यालय, संग्रहालय और सांस्कृतिक स्थलों में भी बदला जा सकेगा तथा इनके संरक्षण के लिए मालिकों को वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।
नए अधिसूचित दिल्ली मास्टर प्लान-2047 में पहली बार दिल्ली में विरासत इमारतों के संरक्षण और पुनर्स्थापना के साथ “फिर से इस्तेमाल” तथा हस्तांतरणीय विकास अधिकार (टीडीआर) के माध्यम से वित्तीय प्रोत्साहन देने की औपचारिक व्यवस्था की गई है।
इसका विचार सरल है: पुरानी इमारत को संरक्षित किया जाए, इसे उपयोगी बनाया जाए और विरासत संपत्ति के कारण विकास की अनुमति न मिलने के एवज में मालिक को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए।
दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, निजी स्वामित्व वाली 1,300 से अधिक विरासत इमारतें हैं, जिनमें करीब 550 हवेलियां शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर पुरानी दिल्ली के शाहजहानाबाद क्षेत्र में स्थित हैं, जहां घनी आबादी वाले इलाकों और व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्रों के बीच सदियों पुरानी आवासीय इमारतें आज भी मौजूद हैं।
इन इमारतों को नया जीवन देने की संभावनाएं चांदनी चौक में पहले से ही दिखाई दे रही हैं। अधिकारियों ने बताया कि वहां दो हवेलियों को होटल में तब्दील किया जा चुका है, जबकि दो अन्य हवेलियों का उचित तरीके से संरक्षण और जीर्णोद्धार किया गया है तथा उनमें आज भी उनके मालिक परिवार रह रहे हैं।
इस प्रावधान के तहत किसी विरासत इमारत या उसके किसी हिस्से को व्यावसायिक, कार्यालय, होटल या सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें संग्रहालय, पुस्तकालय, शिल्प केंद्र और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन स्थल भी शामिल हो सकते हैं।
शर्त यह है कि किसी पुरानी इमारत के नए इस्तेमाल की प्रक्रिया में उसके विरासत स्वरूप से समझौता नहीं किया जा सकेगा।
मास्टर प्लान में कहा गया है कि ऐसे बदलाव की अनुमति तभी दी जाएगी, जब इमारत के मूल स्वरूप और विरासत महत्व को संरक्षित रखा जाए। इसके लिए संबंधित वैधानिक प्राधिकरों की मंजूरी और विरासत प्रभाव आकलन भी जरूरी होगा।
मास्टर प्लान में यह भी प्रावधान है कि जरूरत पड़ने पर स्थान संबंधी मानकों में ढील दी जा सकती है, ताकि पुरानी इमारतों का नए उपयोग के लिए व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल किया जा सके। हालांकि, अग्नि सुरक्षा और लोगों की सुरक्षा से जुड़े उपायों का पालन अनिवार्य होगा।
नीति का दूसरा प्रमुख पहलू विरासत इमारतों के संरक्षण और जीर्णोद्धार को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाना है।
ऐतिहासिक या पुरानी धरोहर वाली इमारतों के लिए इस योजना में एक खास छूट का प्रावधान किया गया है। इसके तहत मकान मालिक को हस्तांतरणीय विकास अधिकार (टीडीआर) के जरिये एफएआर में 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त निर्माण की मंजूरी मिलेगी। ‘एफएआर’ का सीधा मतलब यह होता है कि आप अपनी जमीन या प्लॉट पर कुल कितना बड़ा या कितने मंजिला मकान बना सकते हैं।
एमसीडी के विरासत प्रकोष्ठ के सदस्य सचिव डॉ. अकील अहमद ने एक उदाहरण के जरिये इस व्यवस्था को समझाया।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘मान लीजिए किसी विरासत इमारत का क्षेत्रफल 1,000 वर्ग मीटर है। पचास प्रतिशत प्रोत्साहन के तहत मालिक को 500 वर्ग मीटर के बराबर विकास अधिकार मिलेंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि वह पुरानी इमारत में 500 वर्ग मीटर का अतिरिक्त निर्माण कर सकता है। इसके बजाय, वह 500 वर्ग मीटर के इस विकास अधिकार का इस्तेमाल किसी अन्य पात्र स्थल पर कर सकता है या इसे हस्तांतरित कर सकता है।’’
भाषा आशीष सुरेश
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