जनरल जोरावर सिंह ने पर्वतीय युद्ध रणनीति का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया : वरिष्ठ सैन्य अधिकारी
जनरल जोरावर सिंह ने पर्वतीय युद्ध रणनीति का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया : वरिष्ठ सैन्य अधिकारी
नयी दिल्ली, 12 अप्रैल (भाषा) सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रविवार को कहा कि लद्दाख पर विजय प्राप्त करने से लेकर तिब्बत में अपने साहसिक अभियानों को अंजाम देने तक, महान योद्धा जनरल जोरावर सिंह ने पर्वतीय युद्ध रणनीति की एक आदर्श विरासत छोड़ी है।
जम्मू-कश्मीर राइफल्स और लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंट के कर्नल, लेफ्टिनेंट जनरल एम.पी. सिंह ने दिल्ली छावनी स्थित मानेकशॉ सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में दिए गए अपने मुख्य भाषण में यह बात कही।
मौका महान सैन्य जनरल के जीवन और विरासत पर आधारित एक पुस्तक के अनावरण का था।
पिछले साल 11 अप्रैल को, जम्मू-कश्मीर राइफल्स रेजिमेंट और विचारक संस्था भूमि युद्ध अध्ययन केंद्र (सीएलएडब्ल्यूएस) द्वारा इसी स्थान पर आयोजित एक संगोष्ठी में, यह घोषणा की गई थी कि दिल्ली स्थित रक्षा विचारक संस्था में उनके सम्मान में एक “उत्कृष्टता पीठ” स्थापित की गई है।
‘स्नो लायन: ए मिलिट्री बायोग्राफी ऑफ जनरल जोरावर सिंह’ नामक पुस्तक, जिसमें उनके जीवन, परिचालन रणनीति, विजय और पर्वतीय युद्ध का विवरण दिया गया है, ‘उत्कृष्टता पीठ’ की स्थापना का परिणाम है।
लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा कि लेफ्टिनेंट जनरल जी.एस. कटोच (सेवानिवृत्त) द्वारा लिखित इस पुस्तक में नेतृत्व के कुछ महत्वपूर्ण सबक भी शामिल हैं।
“उत्कृष्टता पीठ” की स्थापना जम्मू-कश्मीर राइफल्स रेजिमेंट द्वारा की गई थी।
लेफ्टिनेंट जनरल सिंह ने कहा कि जनरल जोरावर एक “महान भारतीय योद्धा” थे, और उनका जीवन दूरदर्शिता और साहस का एक उल्लेखनीय उदाहरण था।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “लद्दाख, बाल्टिस्तान और पश्चिमी तिब्बत के दुर्गम पर्वतीय इलाकों में उनकी अनुकरणीय सैन्य सेवाएं उनकी रणनीतिक दूरदर्शिता, बुद्धिमत्ता और ऊंचाई वाले क्षेत्र में युद्ध कौशल का प्रमाण हैं।”
अधिकारी ने कहा, “लद्दाख पर विजय प्राप्त करने से लेकर बाल्टिस्तान में आगे बढ़ने की रणनीति बनाने और बाद में तिब्बत में अपने साहसी अभियानों को शुरू करने तक, जनरल जोरावर सिंह ने बार-बार ऊबड़-खाबड़ इलाकों के अपने ज्ञान को साबित किया। परिचालन कला की उनकी अद्वितीय समझ ने हमें पर्वतीय युद्ध रणनीति का एक आदर्श विरासत में दिया है।”
सैन्य जनरल का जन्म 1786 में बिलासपुर के कहलूर में हुआ था, जो वर्तमान हिमाचल प्रदेश में पड़ता है।
तिब्बत में उनके अभियान 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुए थे।
भाषा
प्रशांत नरेश
नरेश

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