दंपतियों के बांझपन में पुरुषों की अहम भूमिका, आनुवंशिक प्रौद्योगिकी से पता लगाना संभव : वैज्ञानिक
दंपतियों के बांझपन में पुरुषों की अहम भूमिका, आनुवंशिक प्रौद्योगिकी से पता लगाना संभव : वैज्ञानिक
(पायल मुखर्जी)
नयी दिल्ली, 10 जनवरी (भाषा) बांझपन से जूझ रहे कई दंपतियों के लिए सबसे अधिक हताश करने वाली बात यह है कि इलाज के बावजूद भी गर्भधारण नहीं कर पाने का कारण डॉक्टर उन्हें समझा पाने में असमर्थ होते हैं। हालांकि भारत में किये गए एक नये अध्ययन से दावा किया गया है कि नई आनुवंशिक प्रौद्योगिकी से अंततः उनके इस सवाल का जवाब मिल सकता है।
इस महीने ‘जर्नल ऑफ असिस्टेड रिप्रोडक्शन एंड जेनेटिक्स’ में प्रकाशित अनुसंधान पत्र के मुताबिक, 2021 और 2024 के बीच गंभीर शुक्राणु समस्याओं से ग्रस्त 247 भारतीय पुरुषों का विश्लेषण किया गया।
यह अध्ययन अहमदाबाद स्थित फ्रिगे इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स द्वारा आईसीएमआर (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद)के सहयोग से किया गया है। यह भारत में अब तक किया गया पुरुष बांझपन का सबसे बड़ा और सबसे व्यवस्थित आनुवंशिक अध्ययन है और विश्व स्तर पर उन कुछ अध्ययनों में से एक है, जिसमें उन्नत परिवार-आधारित आनुवंशिक विश्लेषण का उपयोग किया गया है।
अध्ययन में कहा गया कि कई लोग मानते हैं कि बांझपन मुख्य रूप से महिलाओं की समस्या है। हालांकि, अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि वास्तव में, पुरुषों से संबंधित कारक भी बांझपन का एक प्रमुख कारण हैं, लेकिन पुरुषों में इसका कारण पता लगाना अक्सर मुश्किल होता है।
इसमें कहा गया कि एक पुरुष देखने में स्वस्थ लग सकता है, और नियमित रक्त परीक्षण के परिणाम भी सामान्य हो सकते हैं, लेकिन वीर्य की जांच करने पर या तो शुक्राणु बिल्कुल नहीं मिलते या उनकी संख्या बहुत कम होती है। दुर्भाग्यवश, अधिकांश मामलों में इसका कारण अज्ञात होता है।
अध्ययन के मुताबिक, अधिकांश बांझपन क्लिनिक गुणसूत्र विश्लेषण और वाई-गुणसूत्र परीक्षण जैसे मानक आनुवंशिक परीक्षणों पर निर्भर करते हैं। ये परीक्षण केवल बड़े आनुवंशिक परिवर्तनों का पता लगाते हैं।
मुंबई स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक और अनुसंधान दल के हिस्सा डॉ. दीपक मोदी ने बताया कि अध्ययन में केवल तीन पुरुषों में गुणसूत्र संबंधी असामान्यताएं और आठ पुरुषों में वाई-गुणसूत्र सूक्ष्म विलोपन का पता चला।
डॉ. मोदी ने कहा, ‘‘इसका अभिप्राय यह है कि इस तरह के नियमित परीक्षण 247 पुरुषों में से केवल 11 में ही बांझपन का कारण बता सकते हैं। इसलिए, अधिकांश पुरुषों को उनकी स्थिति का कोई स्पष्ट कारण नहीं मिल पाया।’’
परंपरागत परीक्षणों से परे अनुसंधानकर्ताओं ने डीएनए अनुक्रमण की नई तकनीकों का उपयोग किया जो बांझपन से संबंधित जीनों की कहीं अधिक विस्तार से जांच करती हैं।
अनुसंधानपत्र के मुताबिक, 120 पुरुषों पर लक्षित अनुक्रमण (एसएमएमआईपी-आधारित) किया गया, और 48 पुरुषों पर संपूर्ण एक्सोम अनुक्रमण (डब्ल्यूईएस) किया गया, जिसमें अक्सर रोगी और दोनों माता-पिता शामिल होते हैं।
एक्सोम अनुक्रमण जीन के सभी प्रोटीन-कोडिंग क्षेत्रों (जिसे एक्सोम के रूप में जाना जाता है) को अनुक्रमित करने के लिए एक जीनोमिक तकनीक है।
इन उपायों से निदान की सफलता दर में छह से आठ प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप 247 पुरुषों में से 19 में आनुवंशिक निदान की पुष्टि हुई, यानी लगभग 13 में से एक में। ज्ञात और नये चिह्नित कारणों के आंकड़ों के आधार पर, उनका अनुमान है कि बांझपन से ग्रस्त पुरुषों में से आठ में से एक से लेकर पांच में से एक में अंतर्निहित आनुवंशिक कारण हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि बांझपन से जूझ रहे दंपतियों के लिए, आनुवंशिक निदान वर्षों के बार-बार और अनिर्णायक परीक्षणों को कम कर सकता है, आईवीएफ और शुक्राणु पुनर्प्राप्ति के बारे में यथार्थवादी निर्णय लेने में मार्गदर्शन कर सकता है। भविष्य के बच्चों और पुरुष रिश्तेदारों के लिए जोखिमों को स्पष्ट कर सकता है और अनावश्यक भावनात्मक और वित्तीय बोझ को रोक सकता है।
भाषा धीरज सुरेश
सुरेश

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