सिंधु जल संधि मामले में मध्यस्थता अदालत का आदेश भारत ने ठुकराया, कहा- कोई अधिकार क्षेत्र नहीं
सिंधु जल संधि मामले में मध्यस्थता अदालत का आदेश भारत ने ठुकराया, कहा- कोई अधिकार क्षेत्र नहीं
नयी दिल्ली, 31 अगस्त (भाषा) भारत ने स्थायी मध्यस्थता अदालत के उस आदेश को सोमवार को खारिज कर दिया, जिसमें पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित रखने के नयी दिल्ली के फैसले को दरकिनार किया गया है। भारत ने कहा कि ‘अवैध रूप से गठित’ इस निकाय को नयी दिल्ली के संप्रभु फैसलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।
विदेश मंत्रालय (एमईए) ने कहा कि सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को निलंबित रखने का भारत का फैसला अब भी प्रभावी है।
नयी दिल्ली ने पिछले साल अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले के बाद उठाए गए कई कूटनीतिक और आर्थिक कदमों के तहत सिंधु जल संधि को निलंबित रखने का फैसला किया था। उक्त आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत हुई थी।
पाकिस्तान ने इस साल मार्च में हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत का रुख किया था और भारत के इस कदम को चुनौती देते हुए संधि की स्थिति तय करने का अनुरोध किया था।
विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘आज अवैध रूप से गठित तथाकथित मध्यस्थता अदालत ने सिंधु जल संधि से संबंधित अंतरिम उपायों और स्थिति पर अपना तथाकथित फैसला सुनाया है।’
मंत्रालय ने कहा, ‘इस तथाकथित अदालत का गठन विश्व बैंक ने संधि की शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए किया था और भारत इसके फैसले को पूरी तरह खारिज करता है, जैसा कि उसने इस अवैध रूप से गठित निकाय के पहले के सभी फैसलों को भी खारिज किया है।’
भारत ने कहा कि उसने कभी भी इस ‘अवैध रूप से गठित तथाकथित मध्यस्थता अदालत’ के कानूनी अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया है और हमेशा कहा है कि इस निकाय का गठन ही सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि ‘‘भारत इस निकाय के समक्ष कभी पेश नहीं हुआ और इसके पहले के फैसलों पर भी कोई संज्ञान नहीं लिया।’’
मंत्रालय ने कहा कि मध्यस्थता अदालत को भारत के संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का ‘कोई अधिकार नहीं है।’ उसने कहा कि इस अदालत के फैसलों का भारत की ओर से शुरू की गई परियोजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
पिछले कुछ महीनों में भारत ने जम्मू-कश्मीर में कई पनबिजली परियोजनाओं पर काम तेज किया है, जिनका पाकिस्तान 1960 में हुई संधि के प्रावधानों के तहत विरोध करता रहा है।
स्थायी मध्यस्थता अदालत ने कहा कि उसने संधि को निलंबित करने के भारत के फैसले के अर्थ पर विचार किया और ‘‘पाया कि इसका मतलब केवल यह दावा हो सकता है कि सिंधु जल संधि या तो निलंबित है या समाप्त कर दी गई है।’’
अदालत ने उन संभावित आधारों की भी समीक्षा की, जिनके आधार पर भारत संधि को निलंबित या समाप्त कर सकता है। इनमें नयी दिल्ली की ओर से सार्वजनिक रूप से बताए गए कारण भी शामिल थे।
अदालत ने एक मीडिया बयान में कहा, ‘सर्वसम्मति से दिए गए फैसले में अदालत ने पाया कि इनमें से कोई भी आधार संधि को निलंबित या समाप्त करने को उचित नहीं ठहराता। इसलिए सिंधु जल संधि पूरी तरह लागू है और भारत को इसके तहत अपने दायित्वों का पालन करना होगा।’
भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि तब तक निलंबित रहेगी, जब तक पाकिस्तान ‘सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने से विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से पीछे नहीं हटता।’
अदालत ने कहा कि हालांकि भारत ने कार्यवाही के दौरान लिखित या मौखिक रूप से कोई पक्ष नहीं रखा, लेकिन उसने भारत के रुख को उन बयानों और गतिविधियों के आधार पर ध्यान में रखा, जो कार्यवाही के बाहर सामने आए थे।
अदालत ने कहा कि उसने भारत के इस आरोप पर ‘बेहद गंभीरता से’ विचार किया कि पाकिस्तान की ओर से सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने के कारण भारत सिंधु जल संधि के तहत अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाया।
अदालत ने कहा कि ‘‘अगर भारत के आरोप को सही भी मान लिया जाए, तब भी इससे पाकिस्तान की ओर से संधि के महत्वपूर्ण उल्लंघन की पुष्टि नहीं होती।’’
अदालत ने कहा कि सिंधु जल संधि ‘‘आतंकवाद या बल प्रयोग से संबंधित नहीं है और यह स्पष्ट रूप से केवल सिंधु नदी प्रणाली के जल उपयोग से जुड़े दोनों देशों के अधिकारों और दायित्वों को नियंत्रित करती है।’’
भाषा अमित माधव
माधव

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