रघु राय की पहली मुलाकातों के दिलचस्प किस्से: हुसैन को पहचान न सके, मदर टेरेसा ने लगाई फटकार

रघु राय की पहली मुलाकातों के दिलचस्प किस्से: हुसैन को पहचान न सके, मदर टेरेसा ने लगाई फटकार

रघु राय की पहली मुलाकातों के दिलचस्प किस्से: हुसैन को पहचान न सके, मदर टेरेसा ने लगाई फटकार
Modified Date: April 28, 2026 / 02:25 pm IST
Published Date: April 28, 2026 2:25 pm IST

नयी दिल्ली, 28 अप्रैल (भाषा) देश के प्रख्यात छायाकारों में शामिल रघु राय के करियर में एम एफ हुसैन और मदर टेरेसा दो बेहद अहम नाम रहे और इन दोनों महान हस्तियों से उनकी पहली मुलाकातें बड़ी दिलचस्प थीं—हुसैन को वह पहचान नहीं पाए थे, जबकि मदर टेरेसा ने उन्हें ‘शूट’ के दौरान बुरी तरह डांट दिया था।

भारत के विविध रूपों को अपने कैमरे में कैद करने वाले रघु राय को करीब 30 वर्ष की आयु में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। रघु राय का रविवार तड़के यहां एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे।

रचना सिंह द्वारा लिखी जीवनी ‘रघु राय: वेटिंग फॉर द डिवाइन’ के अनुसार, हुसैन और मदर टेरेसा से राय की मुलाकातें उस दौर में हुईं, जब वह एक युवा छायाकार के रूप में अपनी पहचान बना रहे थे।

राय ने साठ के दशक में ‘द स्टेट्समैन’ में हुसैन से अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए कहा था, ‘‘दाढ़ी वाले एक व्यक्ति आए और बोले, ‘मेरा नाम हुसैन है और मैं एक कलाकार हूं।’ तब मुझे कला और कलाकारों के बारे में कुछ पता नहीं था।’’

हुसैन राय के काम की तारीफ करने आए थे। उन्होंने कहा था, ‘‘हम हर रविवार आपकी तस्वीरें देखते हैं… कोई भी भारत को आपकी तरह कैमरे में नहीं उतारता।’’

हुसैन के जाने के बाद ही राय को उस मुलाकात की असल अहमियत समझ आई।

राय ने कहा था, ‘‘मेरे संपादक ने मुझे रोककर कहा, ‘वह हुसैन बाबा थे… क्या तुम उन्हें नहीं जानते? वह बहुत बड़े कलाकार हैं।’ मैंने कहा, ‘नहीं’।’’

अगली बार जब दोनों मिले तो हुसैन ने राय को अपनी एक पेंटिंग भेंट की।

राय ने कहा कहा, ‘‘वह मेरे लिए ‘बर्थ ऑफ गणेश’ (गणेश का जन्म) लेकर आए थे… मूल पेंटिंग।’’

बाद में वह अपने काम के सिलसिले में मदर टेरेसा से मिलने कोलकाता गए। करीब 1970 में एक पत्रिका के संपादक ने राय को मदर टेरेसा की तस्वीरें खींचने भेजा था।

वह कोलकाता में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के परिसर में पहुंचे, जहां ‘‘लकड़ी की एक पुरानी मेज और कुछ चरमराती कुर्सियां थीं… बस इतना ही।’’

पुस्तक के अनुसार, राय ने तुरंत उस जगह में एक बेहतर फ्रेम खोजना शुरू किया और एक आधे गिरे पर्दे के पार उन्हें कुछ नन पढ़ती हुई दिखाई दीं। रोशनी और हलचल का वह दृश्य उन्हें अलौकिक लगा तथा उस क्षण को कैमरे में कैद करने की बेचैनी में वह सही कोण तलाशने के लिए फर्श पर लेट गए लेकिन उनकी इस हरकत ने हमेशा शांत रहने वाली मदर टेरेसा को भी चौंका दिया।

राय ने बताया था कि मदर टेरेसा चिल्लाकर बोलीं, ‘‘तुम वहां कर क्या रहे हो?’’

राय ने उनसे कहा, ‘‘मदर, पर्दे के पार वे सिस्टर फरिश्तों जैसी दिख रही हैं।’’

पुस्तक के अनुसार, राय ने कहा था, ‘‘वह (मदर टेरेसा उनकी बात) समझ गईं और बोलीं, ‘ठीक है।’ यही थीं मदर-सख्त, लेकिन अगर आपकी बात उचित है तो वह पूरी तरह आपका साथ देती थीं।’’

राय ने बाद में मदर टेरेसा पर चार पुस्तकें तैयार कीं।

ये मुलाकातें उस समय हुईं जब राय के काम पर लोगों का ध्यान जाने लगा था और जल्द ही उन्हें भारत से बाहर भी पहचान मिलने लगी। पुस्तक में दर्ज है कि 1970 के दशक की शुरुआत में बांग्लादेशी शरणार्थियों पर उनकी तस्वीरों ने ‘‘काफी हलचल’’ मचाई जिससे उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के अधिकारियों से बातचीत करने का मौका मिला।

राय ने कहा, ‘‘वे चाहते थे कि मैं विदेशों में सिर्फ शरणार्थियों पर प्रदर्शनी लगाऊं… मैंने मना कर दिया।’’ वह इसे प्रचार का माध्यम बनाए जाने को लेकर सतर्क थे।

इसके बजाय उन्होंने संतुलित प्रदर्शनी का प्रस्ताव रखा: उनके रचनात्मक काम की 50 तस्वीरें और शरणार्थियों की 25 तस्वीरें। यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया और इसके साथ ही उनकी एक अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय यात्रा शुरू हुई। इसके बाद जो हुआ, वह उम्मीदों से कहीं आगे था।

पेरिस और जर्मनी में प्रेस ने उनका जोरदार स्वागत किया। जर्मनी के प्रसिद्ध अखबार ‘डी वेल्ट’ ने उनकी प्रदर्शनी की खूब सराहना की। यही प्रतिक्रिया टोक्यो, वाशिंगटन, हांगकांग और देशों की अन्य राजधानियों में भी मिली।

उनके भारत लौटने पर तत्कालीन गृह सचिव गोविंद नारायण ने उन्हें बुलाया। उन्हें बताया गया कि उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा।

राय ने कहा, ‘‘मेरे मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘क्या आपको यकीन है?’ इस तरह मुझे पद्मश्री मिला।’’

यह सम्मान मिलना भी कुछ वैसा ही था, जैसी महान लोगों से हुई उनकी पहली मुलाकातें। यह सम्मान राय को उस समय मिला, जब शायद वह स्वयं भी अपने काम की महानता को पूरी तरह पहचान भी नहीं पाए थे।

भाषा

सिम्मी मनीषा

मनीषा


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