जोधपुर: कानूनी जंग जीतकर बाल विवाह की बेड़ियां तोड़ीं, दूसरों को भी उम्मीद की राह दिखाई
जोधपुर: कानूनी जंग जीतकर बाल विवाह की बेड़ियां तोड़ीं, दूसरों को भी उम्मीद की राह दिखाई
जोधपुर, 22 मार्च (भाषा) बारह बरस की उम्र-जब हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, तब उसकी कलाई पर शादी का धागा बांध बचपन की हंसी को घूंघट की ओट में छिपा दिया गया, लेकिन इस फैसला का बोझ एक दशक तक ढोने के बाद आखिरकार अदालत की चौखट पर कानूनी जंग जीतकर उसने बाल-विवाह की बेड़ियां तोड़कर न केवल अपनी जिंदगी दोबारा हासिल की, बल्कि उन अनगिनत लड़कियों के लिए भी उम्मीद की राह खोल दी, जिनका बचपन एक कुप्रथा की भेंट चढ़ गया।
ये कहानी है बिश्नोई समुदाय से ताल्लुक रखने वाली खुशबू (परिवर्तित नाम) की जिसका विवाह बृहस्पतिवार को जोधपुर की पारिवारिक अदालत के न्यायाधीश वरुण तलवार ने निरस्त कर दिया।
फैसले में न्यायाधीश ने कहा कि बाल विवाह बच्चों के वर्तमान ही नहीं, उनके भविष्य को भी कमजोर कर देता है। उन्होंने इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए समाज से सामूहिक पहल करने का आह्वान भी किया।
साल 2016 में जब खुशबू महज करीब 12 साल की थी, उसी समय यह ब्याह रचा दिया गया। अब अदालत ने बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत इसे अमान्य घोषित कर दिया।
खुशबू ने याद किया कि वह तब (जिस उम्र में शादी हुई) स्कूल जाने वाली एक मासूम बच्ची थी, जिसे इस बात की भी ठीक से समझ नहीं था कि उसके आसपास क्या घट रहा है।
खुशबू ने कहा, ‘‘गांव के बड़े-बुजुर्ग शादी की तैयारियों में लगे थे और मेरी जिंदगी का फैसला मेरी ही चुप्पी के बीच तय किया जा रहा था।’’
उन्होंने कहा, ‘‘फैसले दरअसल काफी हद तक उन रीति-रिवाजों से प्रेरित थे जिनके आगे माता-पिता की आवाज भी कहीं दबकर रह गई। उम्र बढ़ने के साथ मुझे धीरे-धीरे एहसास हुआ कि मैं एक ऐसे रिश्ते में बांध दी गई थी, जिसे न मैंने चुना था और न ही पूरी तरह समझा था।’’
खुशबू ने कहा कि कुछ वर्षों बाद उनकी जिंदगी में वह मोड़ आया, जब ससुराल की ओर से वैवाहिक संबंध शुरू करने का दबाव बढ़ने लगा। उन्होंने कहा कि तभी उन्हें पहली बार पूरी तरह एहसास हुआ कि बचपन में लिया गया वह फैसला अब उनके वर्तमान पर भारी पड़ने लगा है।
उसने इस रिश्ते को जारी न रखने का दृढ़ निश्चय किया और हिम्मत जुटाकर पुलिस का दरवाजा खटखटाया और वहीं से उसकी राह ‘सारथी ट्रस्ट’ की सामाजिक कार्यकर्ता कृति भारती तक पहुंची।
उसने कहा, ‘‘शुरू में वे झिझक रहे थे, लेकिन मेरा अडिग इरादा देखकर और मेरी बड़ी बहन के समझाने पर आखिरकार वे मान गए। मेरी बड़ी बहन की शादी भी बचपन में कर दी गई थी।’’
भारती की सहायता से खुशबू ने लगभग 18 महीने पहले पारिवारिक अदालत में विवाह रद्द करने का आग्रह करते हुए एक याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान उसने अदालत के समक्ष अपने उम्र संबंधी दस्तावेज रखे, जो बताते थे कि विवाह के समय वह नाबालिग थी। खुशबू ने दावा किया यह संबंध उसकी सहमति के बिना तय और संपन्न किया गया था।
ससुराल पक्ष ने दावा किया कि दोनों के बालिग होने के बाद विवाद किया गया, लेकिन अदालत में उनका यह तर्क टिक नहीं सका और वे मामला हार गए।
सामाजिक कार्यकर्ता कृति भारती ने कहा कि दूल्हे के परिवार को विवाह खत्म करने के लिए राजी करना बिल्कुल आसान नहीं था।
उन्होंने कहा, ‘‘भला कौन इतनी आसानी से दुल्हन पर अपना अधिकार छोड़ना चाहता है? यह बात परंपराओं में भी गहरी धंसी होती है और अहंकार में भी। ऐसे मामलों को हाथ में लेना अपमान और गालियों को झेलने जैसा होता है।’’
खुशबू का मामला उन परंपराओं पर भी उजागर करता है, जो कानून की सख्ती के बावजूद बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जिंदा रखे हुए हैं।
कृति भारती ने बताया कि यह शादी ‘मौसर’ (मृत्युभोज) नामक एक रस्म से जुड़ी थी, जो परिवार में किसी की मृत्यु के बाद आयोजित होती है। इस रस्म के दौरान सामूहिक रूप से कई बच्चों की शादियां करा दी जाती हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मौकों पर अक्सर परंपरा को कानून से ऊपर रख दिया जाता है और परिवारों को डर रहता है कि अगर उन्होंने विरोध किया तो उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है।
इस बीच, सातवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हुई खुशबू ने अब फिर से किताबें उठा ली हैं। वह ओपन स्कूलिंग के जरिए अपनी माध्यमिक परीक्षा की तैयारी कर रही है-मानो जिंदगी को नयी शुरुआत देने का संकल्प ले चुकी हो।
खुशबू ने कहा, ‘‘मेरी बड़ी बहन की भी यही इच्छा है कि मैं अपनी पढ़ाई पूरी करूं और अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं।’’
भाषा यासिर खारी
खारी

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