लता मंगेशकर ने आशा भोसले को बताया था बेजोड़, प्रतिद्वंद्विता को किया था खारिज
लता मंगेशकर ने आशा भोसले को बताया था बेजोड़, प्रतिद्वंद्विता को किया था खारिज
नयी दिल्ली, 12 अप्रैल (भाषा) आशा भोसले, लता मंगेशकर की छोटी बहन थी जिन्होंने उनकी छाया से निकलकर अपना अलग मुकाम बनाया, लेकिन दोनों बहनें कभी प्रतिद्वंदी नहीं थीं।
लता ने खुद दोनों बहनों के बीच प्रतिस्पर्धा पर विराम लगाते हुए कहा था कि वह परिवार का हिस्सा और पड़ोसी समेत एक ऐसी गायिका हैं, जिनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।
फिल्म निर्माता और लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर के साथ हुई बातचीत की एक श्रृंखला ‘लता मंगेशकर…इन हर ओन वॉइस’ नाम की पुस्तक में प्रकाशित की गई है। ऐसी ही बातचीत में दिवंगत गायिका लता ने अपनी छोटी बहन के बारे में विस्तार से बात की और उनके बीच प्रतिद्वंद्विता की बातों को खारिज किया।
किताब के मुताबिक, लता मंगेशकर ने कहा था, ‘‘आशा बेहद प्रतिभाशाली है। वह हर तरह के गाने बहुत अच्छे से गा सकती है – गम भरे गाने, डांस नंबर और कैबरे। मैं यह इसलिए नहीं कह रही हूं क्योंकि वह मेरी बहन हैं, बल्कि यह मेरा फर्ज है कि मैं उनके गुणों के बारे में बताऊं। जिस तरह के गाने वह गा सकती हैं, उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।’’
लता मंगेशकर से जब मीडिया में दोनों बहनों के बीच प्रतिद्वंद्विता से जुड़ी चर्चा के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ‘‘यह कहना गलत है कि प्रतिद्वंद्विता ने हमारे रिश्ते को खराब कर दिया है। हम बहनें और पड़ोसी हैं। हम एक-दूसरे से बात करते हैं और साथ खाना खाते हैं। अगर हममें से किसी को कोई परेशानी होती है, तो हम एक-दूसरे को बताते हैं। अगर कोई खुशी का मौका होता है, तो हम साथ मिलकर मनाते हैं।’’
दोनों बहनें मुंबई के पेडर रोड स्थित प्रभु कुंज में अगल-बगल के फ्लैट में रहती थीं।
लता मंगेशकर का निधन फरवरी 2022 में हुआ था, जबकि आशा भोसले ने रविवार को दुनिया को अलविदा कहा। दोनों ही बहनों ने 92 वर्ष की उम्र में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली।
मंगेशकर ने उस संगीत के बारे में भी बात की, जिन्होंने भोसले की विशिष्ट आवाज को आकार दिया, विशेष रूप से संगीतकार एस. डी. बर्मन ने।
उन्होंने कहा था, ‘‘जब आशा ने पहली बार गायन जगत में कदम रखा, तो उनकी गायकी काफी अलग थी – फिर वह भी बर्मन दा के प्रभाव में आईं और उनकी शैली को और विकसित किया। उनकी शैली में एक विशेष शब्द पर जोर दिया जाता था, ‘मेरे बन जाओ’, ‘जाओ’ शब्द पर जोर दिया गया। उन्होंने बांग्ला लोक गायन से इस शैली को अपनाया। ओ.पी. नय्यर ने भी इस शैली का प्रयोग किया।’’
लता ने बातचीत में कहा था, ‘‘हावड़ा ब्रिज फिल्म में आशा का गाया हुआ ‘आइए मेहरबां’ याद है? किस तरह से उन्होंने ‘आइए’ शब्द पर ज़ोर दिया था। यह एक और उदाहरण है। आशा अक्सर ओ. पी. नय्यर के लिए गाती थीं। वह हमेशा शमशाद बेगम, गीता दत्त, रफी साहब और किशोर कुमार को अपने गीत गाने के लिए चुनते थे। उनका मानना था कि उनका संगीत मेरी आवाज के साथ मेल नहीं खाता और मैं उनसे सहमत थी। मेरी आवाज उनकी धुन के लिए उपयुक्त नहीं थी।’’
आर. डी. बर्मन के साथ भोसले की लंबी और शानदार साझेदारी पर लता ने कहा था, ‘‘आर. डी. एक संगीत निर्देशक थे जो कलाकार की क्षमता के अनुसार धुन तैयार करते थे। उन्होंने आशा के लिए जो धुन तैयार की, वे विशेष रूप से उन्हीं के लिए थी और उनकी आवाज के अनुकूल थी। लेकिन उन्होंने मेरे लिए जो संगीत तैयार किए, वे बिल्कुल अलग हैं।’’
लता मंगेशकर ने अपनी बहन की गणपतराव भोसले से हुई पहली शादी के मुश्किल भरे वर्षों के बारे में भी बात की, जिसके कारण परिवार में दरार आ गई थी।
उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा, ‘‘उसे हमसे मिलने या हमें पत्र लिखने की अनुमति नहीं थी। वर्षों तक यही स्थिति बनी रही। गणपतराव भोसले आशा को अलग-अलग संगीत निर्देशकों के पास ले जाते थे और उनसे ऑडिशन दिलवाते थे। उनका मानना था कि आशा उन्हें खूब पैसा कमाकर देगी और वे उसे अपने नियंत्रण में रखना चाहते थे। उन वर्षों में आशा ने बहुत कष्ट झेला।’’
आशा भोसले 1960 में पति गणपति राव से अलग हो गईं और अपने परिवार के साथ रहने के लिए वापस लौट आईं।
लता मंगेशकर ने बताया था, ‘‘हम उस समय वालकेश्वर में रह रहे थे, और जब आशा घर लौटी, तो उसका तीसरा बच्चा आनंद गर्भ में था, जिसे हम ‘नंदू’ कहकर बुलाते हैं। आशा के लौटने के तुरंत बाद हम पेडर रोड पर प्रभु कुंज में चले गए, और उसने हमारे ही तल पर एक फ्लैट खरीद लिया।’’
इस किताब में भोसले की ओर से मंगेशकर को श्रद्धांजलि भी शामिल थी, जिसमें उन्होंने अपने बीच के संबंध को याद किया था और बताया था कि कैसे सांगली में बचपन में उनकी बड़ी बहन उन्हें हर जगह, यहां तक कि स्कूल तक भी साथ ले जाया करती थीं।
भोसले ने लिखा था, ‘‘हम एक-दूसरे से इतने जुड़े हुए थे कि वह मुझे हर दिन अपने साथ स्कूल ले जाती थी, जब तक कि आखिरकार उसकी शिक्षिका ने हम दोनों को एक ही कक्षा में बैठने देने से इनकार नहीं कर दिया।’’
उन्होंने लिखा था कि लता जब घर लौटी तो रोने लगीं और स्कूल जाने से मना कर दिया, तब पिताजी ने उनके लिए एक निजी शिक्षक की व्यवस्था की।
भोसले ने लता मंगेशकर की गायकी के बारे में कहा कि उनकी आवाज और सुर की परिपूर्णता ईश्वर प्रदत्त उपहार थी।
उन्होंने लता मंगेशकर को याद करते हुए कहा था, ‘‘लेकिन इतनी कम उम्र में अपनी प्रतिभा को पूरी तरह से समझना और उसका उपयोग करना एक ऐसी बात है जो मुझे हतप्रभ करती है।’’
भाषा धीरज सुभाष
सुभाष

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