प्रेम की शुरुआत एक ‘ऑटोग्राफ’ से हुई: आशा भोसले और आर. डी. बर्मन की साझेदारी और शादी की कहानी

प्रेम की शुरुआत एक ‘ऑटोग्राफ’ से हुई: आशा भोसले और आर. डी. बर्मन की साझेदारी और शादी की कहानी

प्रेम की शुरुआत एक ‘ऑटोग्राफ’ से हुई: आशा भोसले और आर. डी. बर्मन की साझेदारी और शादी की कहानी
Modified Date: April 12, 2026 / 09:02 pm IST
Published Date: April 12, 2026 9:02 pm IST

नयी दिल्ली, 12 अप्रैल (भाषा) आशा भोसले और राहुल देव बर्मन की प्रेम कहानी एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में शुरू हुई और इसे शब्दों ने नहीं, बल्कि संगीत ने आकार दिया। इसके परिणामस्वरूप हिंदी सिनेमा के कुछ सबसे सदाबहार गीत बने।

उन्नीस सौ सत्तर के दशक में दोनों ने अद्भुत काम किया, जिसमें ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ (1971) का ‘दम मारो दम’, ‘कारवां’ (1971) का ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘अपना देश’ (1972) का ‘दुनिया में लोगों को’ और ‘यादों की बारात’ (1973) का ‘चुरा लिया है तुमने’ जैसे हिट गाने शामिल हैं।

सांस्कृतिक लिहाज से मील का पत्थर माने जाने वाले इन गानों में बर्मन ने लैटिन बीट्स, पश्चिमी पॉप और जैज को भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ मिलाया, और भोसले की गायन प्रतिभा ने इन सभी शैलियों को एक साथ पिरो दिया। यह सब 1950 के दशक के मध्य में शुरू हुआ।

महान संगीतकार सचिन देव बर्मन के पुत्र राहुल देव बर्मन की पहली मुलाकात भोसले से किशोरावस्था में हुई थी, जब वह अपने पिता के साथ एक स्टूडियो में गए थे।

चश्मा पहने कॉलेज के छात्र आर डी बर्मन पार्श्व गायिका भोसले को देखकर अभिभूत हो गए और उनसे ‘ऑटोग्राफ’ मांगा।

भोसले ने खुद से छह साल छोटे बर्मन के बारे में 2022 में ‘द क्विंट’ को बताया, ‘‘वह अपने पिता को ‘अरमान’ फिल्म के लिए ‘चाहे तुम कितना भुलाओ’ गाने को रिकॉर्ड करते देखने के लिए महालक्ष्मी स्थित फेमस स्टूडियो आए थे। वह दुबले-पतले थे और सफेद कपड़े पहनने के साथ मोटा चश्मा लगाए हुए थे। कद छोटा होने के कारण वह अपनी उम्र से छोटे दिखते थे। उस लड़के ने मुझसे ‘ऑटोग्राफ’ मांगा और कहा कि उन्होंने मेरा मराठी नाट्य संगीत रेडियो पर सुना है।

उनकी पेशेवर साझेदारी कई साल बाद उस वक्त शुरू हुई जब उन्होंने विजय आनंद की संगीतमय थ्रिलर फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ (1966) में एक साथ काम किया, जिसमें शम्मी कपूर और आशा पारेख ने अभिनय किया था।

‘आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा’ गाने ने दोनों को भारत में पहचान दिला दी।

यह गीत स्वतंत्र संगीतकार के रूप में आर डी बर्मन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और एक ऐसे रचनात्मक सहयोग की शुरुआत हुई, जिसने हिंदी फिल्म संगीत को नया रूप दिया।

बाद के वर्षों में उनका रिश्ता और भी गहरा और व्यक्तिगत हो गया। दोनों ही अपने पहले विवाह से नाखुश थे।

भोसले ने महज 16 साल की उम्र में लता मंगेशकर के पूर्व सचिव गणपतराव भोसले के साथ घर से भागकर शादी की थी, लेकिन बाद में उन्होंने गणपतराव के साथ अपने रिश्ते खत्म करने का फैसला किया।

बर्मन 1971 में अपनी पहली पत्नी रीता पटेल से अलग हो गए थे। इस तरह दोनों को एक-दूसरे की संगति में ऐसा सुकून मिला जो सिर्फ स्टूडियो (काम की जगह) तक सीमित नहीं था, बल्कि उससे भी आगे था।

कई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि बर्मन ने भोसले को कई बार शादी का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने अपने पहले विवाह की खट्टे अनुभवों से आहत होकर इनकार कर दिया। फिर भी बर्मन ने हार नहीं मानी।

जब उनसे पूछा गया कि बर्मन ने उन्हें कैसे मनाया, तो भोसले ने कहा, ‘‘वह कहते थे- आशा, सिर्फ तुम ही समझती हो। तुम कोशिश करने पर भी कभी बेसुरा नहीं गा सकती। मुझे बहुत अच्छा लगा, लेकिन मैं दोबारा शादी करने की गलती नहीं करना चाहती थी। वह सालों से शादी करने के लिए मेरे पीछे पड़े थे। बहुत समझाने-बुझाने के बाद, उन्होंने मुझे यकीन दिलाया कि उन्हें मेरी आवाज से प्यार हो गया है। मेरी आवाज उन्हें बहुत भा गई थी। इसलिए आखिरकार मैंने ‘ठीक है’ कह दिया।’’

उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर समेत उनका परिवार दोनों के बीच बढ़ती नजदीकी से वाकिफ था। बर्मन कथित तौर पर इस रिश्ते का इतना सम्मान करते थे कि जब शादी हुई, तो उन्होंने लता मंगेशकर से कहा कि उन्हें कोई महंगा तोहफा नहीं चाहिए, बस एक पत्र चाहिए जिसमें उनके वैवाहिक जीवन को खूबसूरत बनाने के बारे में सलाह दी गई हो।

शादी का रास्ता आसान नहीं था, क्योंकि आर डी बर्मन की मां उम्र के अंतर के कारण इस रिश्ते के घोर खिलाफ थीं।

पंचम दा के नाम से मशहूर आर डी बर्मन फिर भी आगे बढ़े। उन्होंने 1980 में एक निजी समारोह में भोसले से शादी की।

भोसले ने कहा, ‘‘संगीत हमारे विवाह का आधार था: हम बिस्मिल्ला खान, द बीटल्स, शर्ली बैसी… और न जाने कितने ही कलाकारों के गाने घंटों सुनते थे। पंचम सुबह 9:30 बजे नहाने के बाद लुंगी-कुर्ता पहनकर निकलते थे और दोपहर तीन बजे तक हम जॉन कोल्ट्रेन, अर्थ विंड एंड फायर, सर्जियो मेंडेस, सैंटाना, द रोलिंग स्टोन्स, ब्लड स्वेट एंड टियर्स, चक कोरिया, ओसिबिसा… जैसे कई कलाकारों के एल्बम गुनगुनाते रहते थे। संगीत के प्रति हमारी रुचि विविध थी, और यही हमारे बीच अटूट बंधन था।’’

यह विवाह बर्मन के रचनात्मक चरम के साथ-साथ उनके पेशेवर पतन के समय हुआ।

अस्सी के दशक में हिंदी फिल्म संगीत में आए बदलावों के साथ पंचम दा नए नामों के आगे फीके पड़ गए, साथ ही वह शराब की लत और बिगड़ते स्वास्थ्य से भी जूझ रहे थे।

अस्सी के दशक में, उन्होंने साथ मिलकर काम करना जारी रखा और कुछ सबसे सूक्ष्म और भावनात्मक रूप से जटिल रचनाएं तैयार कीं।

उन्होंने गुलजार की फिल्म ‘इजाजत’ (1987) पर काम किया, जिसमें ‘कतरा कतरा’ और ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे कई प्रशंसित गीत शामिल थे, जिनमें से ‘मेरा कुछ सामान’ के लिए आशा भोसले को सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका का दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

बर्मन का चार जनवरी, 1994 को हृदयाघात से निधन हो गया। वह 54 वर्ष के थे।

पिछले कुछ वर्षों में दिए गए साक्षात्कारों में आशा भोसले अक्सर बर्मन के साथ अपने रिश्ते और उनके साथ विवाह के बारे में बात करती रही हैं।

पिछले साल आरजे अनमोल और अमृता राव से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें खुद भी नहीं पता था कि वह इतने बड़े संगीत निर्देशक हैं। वह संगीत बनाते थे, लेकिन उनमें जरा भी अहंकार नहीं था।’’

क्या उन्हें लगता है कि आर.डी. बर्मन जैसा कोई दूसरा संगीत निर्देशक कभी हो सकता है? भोसले ने ‘द क्विंट’ को बताया कि उन्हें ए.आर. रहमान पसंद आते हैं।

भोसले ने कहा, ‘‘सच कहूं तो, पंचम की तरह बॉलीवुड बीट्स, जैज, रॉक, पॉप, सेमी-क्लासिकल को कोई भी कवर नहीं कर सकता। दूसरा आर.डी. बर्मन बनने के लिए तो उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़ेगा।’’

भाषा संतोष सुरेश

सुरेश


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