‘वंदे मातरम्’ की विरासत का जश्न मनाते दिखी संस्कृति मंत्रालय की झांकी
‘वंदे मातरम्’ की विरासत का जश्न मनाते दिखी संस्कृति मंत्रालय की झांकी
नयी दिल्ली, 26 जनवरी (भाषा) गणतंत्र दिवस पर इस वर्ष संस्कृति मंत्रालय की झांकी में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष का सफर दिखाया गया जिसमें बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की इस रचना को, एक प्रख्यात मराठी गायक की आवाज में औपनिवेशिक काल की दुर्लभ रिकॉर्डिंग को और ‘जेन जेड’ द्वारा इसके गायन को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया।
‘वंदे मातरम्: एक राष्ट्र की आत्मा की पुकार’ विषय पर आधारित इस झांकी के अग्रभाग में ‘वंदे मातरम्’ की पांडुलिपि की रचना को दर्शाया गया है, जबकि इसके निचले भाग में चटर्जी की छवि चित्रित की गई है।
झांकी के मध्य भाग में पारंपरिक परिधानों में कलाकारों ने भारत की लोक विविधता को दर्शाया, जबकि कुछ कलाकार आधुनिक परिधानों में ‘जेन जेड’ का प्रतिनिधित्व करते नजर आए।
इनके पीछे कला-स्थापनाओं की एक श्रृंखला में मराठी सिनेमा और रंगमंच के प्रसिद्ध अभिनेता एवं गायक विष्णुपंत पगनीस द्वारा गीत की रिकॉर्डिंग, फांसी का सामना करते स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रीय तिरंगा थामे ‘भारत माता’ की भव्य तस्वीर प्रदर्शित की गयी।
एक अधिकारी ने बताया कि यह तस्वीर उनके द्वारा 1928 में रिकॉर्ड किए गए गीत की दुर्लभ रिकॉर्डिंग की है।
पिछले वर्ष ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 साल पूरे होने पर शुरू किए गए आधिकारिक पोर्टल के अनुसार, पगनीस की यह रिकॉर्डिंग “वंदे मातरम् की संभवतः सबसे साहसी प्रस्तुति” मानी जाती है।
पोर्टल के अनुसार, “उस समय सार्वजनिक रूप से गीत के केवल पहले दो अंतरों के गायन की ही अनुमति थी, लेकिन पगनीस ने साहसपूर्वक क्रम उलट दिया। उन्होंने पहले अंतिम दो अंतरे गाए और फिर शुरुआती दो अंतरे गाए। राग सारंग में सुरबद्ध इस संस्करण को ‘राष्ट्रगीत’ कहा गया, जो भारत के राष्ट्रीय गीत को लेकर उपजे विवाद पर एक साहसी कलात्मक प्रतिक्रिया थी।”
इस वेबसाइट पर 1905 के मूल संस्करण से लेकर 1935 के दौर की प्रस्तुति तक ‘वंदे मातरम्’ की विभिन्न रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध हैं।
‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ 77वें गणतंत्र दिवस परेड की प्रमुख थीम है। कर्तव्य पथ पर दर्शक दीर्घाओं की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय गीत के शुरुआती अंतरों को दर्शाने वाली पुरानी चित्रकलाएं प्रदर्शित की गयीं, जबकि मुख्य मंच पर पुष्प सज्जा के माध्यम से 1875 में इसकी रचना करने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को श्रद्धांजलि दी गयी।
झांकी के लंबे निचले पैनल में नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगोर, स्वतंत्रता सेनानी एवं दार्शनिक श्री अरबिंदो (अरबिंदो घोष, जिन्होंने 20वीं सदी के आरंभ में इस कविता का गद्य अनुवाद किया था), तथा औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाली प्रसिद्ध त्रयी ‘लाल-बाल-पाल’ (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल) की छवियां थीं।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जन-आह्वान बने ‘वंदे मातरम्’ को 1950 में संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया था।
भारत 26 जनवरी 1950 को गणराज्य बना, जब 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत संविधान लागू हुआ।
एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने पहले बताया था, “यह झांकी ‘भारत माता’, ‘वंदे मातरम्’ की अमर भावना और इसकी 150 वर्षों की यात्रा को समर्पित होगी। हमारे लिए यह गीत अपने सभी अंतरों के साथ संपूर्ण है, न कि केवल कुछ पंक्तियों तक सीमित है।”
उन्होंने कहा कि उद्देश्य यह भी है कि परेड के दौरान सलामी मंच के सामने झांकी को मिलने वाले लगभग 45 सेकंड के समय में ‘जेन जेड’ को ‘वंदे मातरम्’ की 150 वर्ष पुरानी विरासत से जोड़ा जा सके।
‘वंदे मातरम्’ की रचना प्रारंभ में स्वतंत्र रूप से की गई थी और बाद में इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। इसे पहली बार 1896 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में कांग्रेस अधिवेशन में रविंद्रनाथ टैगोर ने गाया था।
सरकार ने पिछले वर्ष छह नवंबर को एक नोट में बताया था कि ‘150 ईयर्स ऑफ वंदे मातरम्: ए मेलडी दैट बिकेम ए मूवमेंट’ के अनुसार, ‘वंदे मातरम्’ का राजनीतिक नारे के रूप में पहली बार सात अगस्त 1905 को उपयोग हुआ।
‘वंदे मातरम्’ पहली बार सात नवंबर 1875 को साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ था। बाद में 1882 में प्रकाशित ‘आनंदमठ’ उपन्यास में इसे शामिल किया गया और इसे रविंद्रनाथ टैगोर ने संगीतबद्ध किया।
नोट के अनुसार, यह गीत देश की सभ्यतागत, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग बन चुका है और इस अवसर का उद्देश्य ‘वंदे मातरम्’ में निहित एकता, त्याग और भक्ति के शाश्वत संदेश की पुनः पुष्टि करना है।
कर्तव्य पथ पर स्क्रीन पर ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े वीडियो भी प्रदर्शित किए गए।
भाषा गोला मनीषा
मनीषा

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