मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रवादी नेता अब दुर्लभ हैं: होसबाले
मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रवादी नेता अब दुर्लभ हैं: होसबाले
नयी दिल्ली, 13 मई (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शीर्ष पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबाले ने कहा है कि मुसलमानों में राष्ट्रवादी नेता अब दुर्लभ ही देखने को मिलते हैं क्योंकि नेताओं को तभी समर्थन मिलता है जब उनमें अलगाववादी प्रवृत्तियां होती हैं।
होसबाले ने पीटीआई-वीडियो के साथ एक विशेष साक्षात्कार में स्वीकार किया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता थे और आज यदि मुस्लिम समुदाय में कुछ राष्ट्रवादी नेता हैं भी तो उन्हें समर्थन नहीं मिल पाता।
होसबाले से एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी की हालिया टिप्पणी के बारे में पूछा गया था जिसमें उन्होंने कहा था कि मुसलमानों के लिए अपना नेतृत्व बनाने का समय आ गया है, यानी उन्हें अपनी पार्टी बनानी चाहिए क्योंकि उन्हें तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों से न्याय नहीं मिल रहा है।
आरएसएस पदाधिकारी ने कहा, ‘‘यह उन पर निर्भर करता है और उनके अपने धर्म के लोग इस पर कैसे प्रतिक्रिया देंगे, यह अभी देखना बाकी है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन बात यह है कि मुसलमानों के बीच राष्ट्रवादी नेतृत्व, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मौजूद था… अब दुर्लभ हो गया है’’ क्योंकि पाकिस्तान के निर्माण के बाद भारत में धीरे-धीरे राजनीतिक परिवर्तन हुए जिससे छद्म-धर्मनिरपेक्ष नीतियां बनीं।
होसबाले ने कहा, ‘‘यही समस्या है। कुछ लोग हैं, लेकिन उन्हें समर्थन नहीं मिलता। आपको अलगाववादी होना पड़ेगा। तभी समुदाय समर्थन करता है।’’
यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें लगता है कि मुसलमानों को अपना नेतृत्व रखने की कोई आवश्यकता नहीं है, आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, ‘‘नेतृत्व ठीक है। हर समुदाय का अपना नेतृत्व हो सकता है। राजनीतिक दलों का आधार धर्म होना आवश्यक नहीं है।’’
होसबाले ने कहा कि भारतीय संविधान किसी भी प्रकार के संयोजन की अनुमति देता है, लेकिन अगर इसे धर्म के आधार पर किया जाता है, तो ये सब चीजें शुरू हो जाती हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘कई राजनीतिक दल ऐसे हैं जो कुछ खास धर्मों से जुड़े हैं। केरल में कुछ दल ईसाई धर्म से जुड़े हैं। सिख धर्म पर केंद्रित भी एक दल है।’’
होसबाले ने कहा, ‘‘जब तक वे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार कुछ नियमों का पालन करते हैं, तब तक एक राजनीतिक दल का गठन किया जा सकता है। तो मुस्लिम लीग भी है। हिंदू महासभा भी थी।’’
उन्होंने आगे विस्तार में जाते हुए कहा, ‘‘महत्वपूर्ण यह है कि क्या हमारी राष्ट्रीयता, हमारे राष्ट्र के मूलभूत मूल्यों से संबंधित कुछ राष्ट्रीय मुद्दों पर आम सहमति बन सकती है, जिनके बारे में यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू, संपूर्णानंद जी या महात्मा गांधी जी ने भी बात की थी।’’
आरएसएस पदाधिकारी ने कहा, ‘‘वे लोग राजनीतिक क्षेत्र में थे। मैं महर्षि अरविंद या विवेकानंद की बात नहीं कर रहा हूँ, जो आध्यात्मिक क्षेत्र में थे।’’
उन्होंने कहा कि इसलिए इन मुद्दों को ठीक से समझने की जरूरत है।
होसबाले ने कहा, ‘तो इसीलिए, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमने लंबे समय से यह मान रखा है कि धर्म सहित इनमें से किसी भी विषय पर चर्चा करना वर्जित है। यह एक कलंक है। ऐसा नहीं होना चाहिए,’
भाषा नेत्रपाल नरेश
नरेश

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