एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: विवादास्पद अध्याय को लेकर शिक्षाविदों ने न्यायालय का रुख किया

एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: विवादास्पद अध्याय को लेकर शिक्षाविदों ने न्यायालय का रुख किया

एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: विवादास्पद अध्याय को लेकर शिक्षाविदों ने न्यायालय का रुख किया
Modified Date: April 6, 2026 / 06:57 pm IST
Published Date: April 6, 2026 6:57 pm IST

नयी दिल्ली, छह अप्रैल (भाषा) राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की एक पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित ‘आपत्तिजनक’ सामग्री वाले अध्याय को लेकर उठे विवाद के बाद जिन तीन शिक्षाविदों को बतौर विशेषज्ञ सेवा देने से रोका गया था उन्होंने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए याचिका दायर की।

उन्होंने कहा कि सामग्री का मसौदा तैयार करने में किसी एक व्यक्ति का एकाधिकार नहीं था, बल्कि यह एक सामूहिक प्रक्रिया थी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ को अवगत कराया गया कि तीनों विशेषज्ञ (प्रोफेसर मिशेल डैनिनो और उनकी सहयोगी सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार) कोई गैर भरोसेमंद ‘अस्थायी व्यक्ति’ नहीं हैं, बल्कि उनकी ‘काफी विश्वसनीयता’ है।

आलोक प्रसन्न कुमार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि न्यायालय की पिछली टिप्पणियों से उन्हें बहुत नुकसान पहुंचा है, इसलिए उन्होंने अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए आवेदन दायर किए हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने शंकरनारायणन से पूछा, ‘‘क्या आप अपने कार्यों का बचाव कर रहे हैं?’’ वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि शिक्षाविद संदर्भ प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं और उनका उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार लागू हुई नई शिक्षण पद्धति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करना है, जिसमें अन्य मुद्दे भी शामिल हैं।

कक्षा छह और सात की पाठ्यपुस्तकों में अन्य मुद्दों का भी उल्लेख है जिनका सामना विधायिका,कार्यपालिका और निर्वाचन आयोग को करना पड़ता है।

शंकरनारायणन ने कहा, ‘‘यह तर्क दिया गया कि न्यायपालिका को खास तौर पर निशाना बनाया गया है। उन मुद्दों का भी समाधान किया जा चुका है। हम अदालत को पूरी प्रक्रिया दिखाना चाहते हैं। ये कोई अस्थायी या अविश्वसनीय लोग नहीं हैं, बल्कि काफी विश्वसनीय शिक्षाविद हैं। लेखक (आलोक प्रसन्न) खुद एक वकील रहे हैं और इस अदालत में पेश भी हो चुके हैं।’’ शंकरनारायणन ने न्यायालय से सुनवाई के लिए समय मांगा।

मिशेल डैनिनो की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि उनके मुवक्किल ने भी स्पष्टीकरण दाखिल किया है।

सुपर्णा दिवाकर की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जे साई दीपक ने कहा, ‘‘आवेदन का सार यह है कि यह एक सामूहिक प्रक्रिया थी और किसी भी व्यक्ति के पास राय देने का एकाधिकार नहीं था।’’

न्यायालय ने आवेदन को रिकॉर्ड में लेने का निर्देश दिया और कहा कि वह दो सप्ताह बाद इस पर सुनवाई करेगा।

न्यायालय ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज के इस बयान को भी दर्ज किया कि संशोधित अध्याय की विषयवस्तु की समीक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा, पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रकाश सिंह की एक समिति गठित की गई है।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि समिति भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के साथ सहयोग करेगी, जिसकी अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस कर रहे हैं।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि एनसीईआरटी ने दो अप्रैल को एक अधिसूचना जारी करके राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण सामग्री समिति (एनएसटीसी) का पुनर्गठन किया था, जो राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शिक्षक अधिगम सामग्री तैयार करने वाली एक उच्च-स्तरीय समिति है।

इस समिति में 20 प्रतिष्ठित सदस्य होंगे और इसकी अध्यक्षता एमसी पंत करेंगे। न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है।

एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में विवादित अध्याय का मसौदा तैयार करने में शामिल तीन विशेषज्ञों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए न्यायालय ने 11 मार्च को केंद्र और सभी राज्य सरकारों को उनसे संबंध तोड़ने का निर्देश दिया था।

न्यायालय ने केंद्र को एक सप्ताह के भीतर संबंधित विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया था, ताकि एनसीईआरटी की कक्षा आठ और उससे ऊपर की कक्षाओं के लिए विधि अध्ययन से जुड़े पाठ्यक्रम को अंतिम रूप दिया जा सके।

उच्चतम न्यायालय को अवगत कराया गया कि यह अध्याय मिशेल डैनिनो की अध्यक्षता में पाठ्यपुस्तक विकास दल द्वारा तैयार किया गया था, जिसमें सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार सदस्य थे।

इसके पहले पीठ ने कहा था, ‘‘शुरू में ही हमारे पास यह संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो और उनके सहयोगी सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार को भारतीय न्यायपालिका के संबंध में उचित जानकारी नहीं है और/या उन्होंने जानबूझकर और सोच-समझकर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया ताकि कक्षा आठ के विद्यार्थियों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की जा सके…।’’

न्यायालय ने कहा था कि उसे कोई कारण नहीं दिखता कि इन व्यक्तियों को अगली पीढ़ी के बच्चों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने या पाठ्यपुस्तकों को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से किसी भी तरह से जोड़ा जाए।

न्यायालय ने केंद्र, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों, विश्वविद्यालयों और सरकारी निधि प्राप्त करने वाले सार्वजनिक संस्थानों को निर्देश दिया था कि ‘‘इन तीनों लोगों को तत्काल अलग कर दिया जाए और उन्हें ऐसी कोई जिम्मेदारी न सौंपी जाए जिसमें पूर्ण या आंशिक रूप से सार्वजनिक धन का उपयोग होता हो।’’

हालांकि, न्यायालय ने कहा था कि न्यायालय का आदेश उनके द्वारा संशोधन के लिए उच्चतम न्यायालय में अपील करने और यदि कोई स्पष्टीकरण देना चाहें तो उसे प्रस्तुत करने के अधीन होगा।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी ने अध्याय को शामिल करने के लिए अपनी ओर से और एनसीईआरटी की ओर से बिना शर्त और स्पष्ट माफी मांगते हुए हलफनामा दायर किया है।

उच्चतम न्यायालय ने 26 फरवरी को एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के आगे से किसी भी तरह के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण या डिजिटल प्रसार पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ लगा दिया, जिसमें ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से संबंधित ‘आपत्तिजनक’ सामग्री शामिल थी। न्यायालय ने कहा कि उन्होंने गोली चलाई है जिससे न्यायपालिका ‘लहूलुहान’ है।

भाषा संतोष नरेश

नरेश


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