राज्यपाल के वार्षिक अभिभाषण की परपंरा पर पुनर्विचार जरूरी: सुरेश कुमार

राज्यपाल के वार्षिक अभिभाषण की परपंरा पर पुनर्विचार जरूरी: सुरेश कुमार

राज्यपाल के वार्षिक अभिभाषण की परपंरा पर पुनर्विचार जरूरी: सुरेश कुमार
Modified Date: January 30, 2026 / 04:42 pm IST
Published Date: January 30, 2026 4:42 pm IST

बेंगलुरु, 30 जनवरी (भाषा) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ विधायक सुरेश कुमार ने शुक्रवार को कहा कि राज्य विधानमंडल में राज्यपाल के वार्षिक अभिभाषण की परंपरा और उसकी आज के समय में प्रासंगिकता पर पुनर्विचार किए जाने की जरूरत है।

इस परंपरा को ‘औपनिवेशिक गुलामी’ करार देते हुए उन्होंने कहा कि कर्नाटक को इस सवाल पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू करने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए कि क्या यह परंपरा जारी रहनी चाहिए।

सुरेश कुमार ने विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए यह बात कही।

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 22 जनवरी को राज्य विधानमंडल के संयुक्त सत्र के दौरान सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर दिया था और मात्र तीन पंक्तियों में अपना पारंपरिक संबोधन समाप्त कर दिया था, जिस पर कांग्रेस सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।

राज्यपाल ने केंद्र सरकार के संदर्भ में तथा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के कार्यकाल की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को ‘रद्द’ किए जाने से जुड़ी कथित आलोचनात्मक टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए पूरा अभिभाषण पढ़ने से इनकार किया था।

कुमार ने कहा, “राज्यपाल द्वारा संयुक्त सत्र को संबोधित करना अब एक वार्षिक औपचारिकता बनकर रह गया है। आज राज्यपाल के अभिभाषण का महत्व, उद्देश्य और गरिमा समाप्त होती जा रही है। जयचामराजेंद्र वाडियार के बाद कर्नाटक में अब तक 18 राज्यपाल रहे हैं। इनमें धर्म वीर जैसे कुछ राज्यपाल आज भी याद किए जाते हैं, जबकि कुछ अन्य अवांछित कारणों से याद किया जाता है, जिसके बारे में मैं ज्यादा खुलकर नहीं कहना चाहता।”

उन्होंने कहा कि भारत ने इंग्लैंड की ‘वेस्टमिंस्टर’ प्रणाली को अपनाया है, जहां राजा या रानी संसद को संबोधित करते हैं।

उन्होंने आगे कहा, “लेकिन हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी, जहां राज्यपाल के अभिभाषण को लेकर टकराव पैदा हो। ठीक वैसे ही, जैसे भारतीय दंड संहिता बनाते समय साइबर अपराधों की कल्पना नहीं की गई थी।”

भाजपा विधायक ने स्पष्ट किया कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है और यह पार्टी के रुख को नहीं दर्शाती।

उन्होंने कहा, “राज्यपाल के अभिभाषण की परंपरा पर पुनर्विचार जरूरी है। क्या हमें इसे जारी रखना चाहिए? क्या यह आज प्रासंगिक है?”

उन्होंने कहा, “हम राज्यपाल को विधानसभा में बुलाते हैं, उनसे ‘मेरी सरकार’ कहकर भाषण पढ़वाते हैं। सरकार अभिभाषण तैयार करती है और हम विपक्ष उसकी आलोचना करते हैं। अंततः इससे राज्यपाल के पद की गरिमा को ठेस पहुंचती है।”

विधायक ने कहा कि राज्यपाल के भाषण में असल में सरकार की पिछले एक साल की उपलब्धियों के बारे में बात होनी चाहिए और आने वाले साल के लिए उसकी नीतियों की रूपरेखा होनी चाहिए, लेकिन आजकल राज्यपाल के भाषण में ‘राजनीतिक रंग’ आ गया है।

भाषा खारी नरेश

नरेश


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