ओटीटी मंच से ‘सतलुज’ फिल्म हटाए जाने पर पंजाब के नेताओं ने दी प्रतिक्रिया

ओटीटी मंच से ‘सतलुज’ फिल्म हटाए जाने पर पंजाब के नेताओं ने दी प्रतिक्रिया

ओटीटी मंच से ‘सतलुज’ फिल्म हटाए जाने पर पंजाब के नेताओं ने दी प्रतिक्रिया
Modified Date: July 6, 2026 / 04:33 pm IST
Published Date: July 6, 2026 4:33 pm IST

चंडीगढ़, छह जुलाई (भाषा) पंजाब में राजनीतिक दलों और सिख संगठनों ने सोमवार को अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को एक ओटीटी मंच से हटाए जाने की आलोचना की।

उन्होंने कहा कि यह फिल्म राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक का सामना करने के लिए देश को मजबूर करती है। उनका कहना था कि इतिहास को सेंसर प्रकिया के जरिए दबाने के बजाय ईमानदारी से स्वीकार किया जाना चाहिए।

शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने फिल्म को ज़ी5 मंच से हटाए जाने की आलोचना करते हुए कहा, “यह केवल सेंसरशिप नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति, सच्चाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।”

फिल्म का मूल शीर्षक ‘पंजाब 95’ था और यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। यह फिल्म पिछले शुक्रवार को भारत में ज़ी5 मंच पर रिलीज हुई थी, लेकिन दो दिन बाद ही इसे मंच से हटा दिया गया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुखपाल सिंह खैरा ने कहा, “मैं दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को हटाए जाने की कड़ी निंदा करता हूं। यह फिल्म 1995 में मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रोफेसर जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और उनकी हत्या में पुलिस की बर्बरता को दर्शाती है।”

आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और सांसद मलविंदर सिंह कंग ने कहा कि जब कोई देश अपने इतिहास से डरने लगता है, तो सेंसरशिप उसका सबसे खतरनाक हथियार बन जाती है।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) के मुख्य सचिव कुलवंत सिंह मन्नन ने कहा कि फिल्म को मंच से नहीं हटाया जाना चाहिए था। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोग यह फिल्म देखें। यदि वास्तविकता दिखाई जा रही है और लोग उस समय की घटनाओं के बारे में जान पाते हैं, तो इसमें गलत क्या है।

वहीं, सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि यह केवल सेंसरशिप नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति, सच्चाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।

बादल ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में इस कदम की निंदा करते हुए कहा कि पंजाब को अपने अतीत का सामना ईमानदारी से करना चाहिए।

खालड़ा के जीवन पर आधारित यह फिल्म तीन वर्षों से अधिक समय तक सेंसर प्रक्रिया में अटकी रही।

मंच ने रविवार शाम को एक बयान जारी कर दर्शकों को सूचित किया कि हनी त्रेहन द्वारा निर्देशित यह फिल्म अब भारत में उपलब्ध नहीं है।

कांग्रेस नेता ने सरकार से फिल्म को फिर से जारी करने की अपील की ताकि वर्तमान और भावी पीढ़ियां जान सकें कि ‘पुलिस राज’ क्या होता है, जो दुर्भाग्य से पंजाब में अभी भी हावी है।

फिल्म में दोसांझ ने खालड़ा की भूमिका निभाई है, जिन्होंने 1984 से 1994 के बीच 10 वर्षों की अवधि में पंजाब में हजारों अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार की जांच की थी। बाद में 1995 में वह स्वयं लापता हो गए थे।

खालड़ा के अपहरण औऱ हत्या के संबंध में वर्ष 2005 में पंजाब पुलिस के चार कर्मियों को सात साल के कारावास की सजा सुनाई गई। दो साल बाद पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनकी सजा बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दी।

भाषा प्रचेता वैभव

वैभव


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