राजस्थान : 24 वर्षों में 17,675 दृष्टिबाधितों को नेत्रदान से मिली नई रोशनी
राजस्थान : 24 वर्षों में 17,675 दृष्टिबाधितों को नेत्रदान से मिली नई रोशनी
(तस्वीरों के साथ)
(अविनाश बाकोलिया)
जयपुर, पांच अप्रैल (भाषा) नेत्रदान के लिए जागरूक करने में जुटे ‘आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान’ के प्रयासों के चलते सात राज्यों और 30 शहरों के 17,675 दृष्टिबाधितों को नेत्रदान से नई रोशनी मिली है।
नेत्रदान से किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति के जीवन को रोशन किया जा सकता है, लेकिन अफसोस की बात है कि लोग नेत्रदान के लिए पर्याप्त रूप से आगे नहीं आ रहे हैं।
‘आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान’ पिछले 24 वर्षों से लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक करने का काम कर रही है। सोसायटी की ओर से समय-समय पर सरकारी और निजी अस्पतालों, मंदिरों, कॉलेजों और कार्यालयों में हेल्प डेस्क और शिविर लगाए जाते हैं।
आंकड़ों के अनुसार, सोसायटी ने अपनी स्थापना (2002) से लेकर अब तक पिछले 24 साल में 27,307 कॉर्निया एकत्रित कर 17,675 दृष्टिबाधितों को मुफ्त प्रत्यारोपण के जरिए नई रोशनी दी है।
‘आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान’ की प्रबंधक प्रियंका स्वामी ने बताया कि राजस्थान के अलावा 30 शहरों और छह राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड और हरियाणा) में भी कॉर्निया भेजा जा रहा है।
उन्होंने बताया कि अकेले राजस्थान में तीन लाख से अधिक लोग खराब कॉर्निया के कारण अंधेपन का शिकार हैं, लेकिन भ्रांतियों के कारण अक्सर लोग नेत्रदान के लिए आगे नहीं आते हैं।
‘आई बैंक सोसायटी ऑफ राजस्थान’ के अध्यक्ष बी.एल. शर्मा ने बताया कि लाखों लोग ऐसे हैं जो अपने जीवन में रोशनी पाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं और यह तभी संभव होगा जब लोग नेत्रदान के प्रति जागरूक हों और ज्यादा से ज्यादा नेत्रदान करें।
उन्होंने कहा कि कुछ लोग इसका महत्व समझ नेत्रदान करते हैं, लेकिन सामाजिक भ्रांतियों और कुरीतियों के कारण कई लोग नेत्रदान से पीछे हटते हैं।
शर्मा ने बताया कि कुछ भ्रांतियों की वजह से लोग नेत्रदान से बचते हैं, जिनमें मृत्यु के बाद देह को छेड़ना नहीं चाहिए, नेत्रदान से अगले जन्म में आंखें नहीं मिलेंगी, नेत्रदान से चेहरा विरूपित हो जाता है, प्रत्यारोपण के लिए पूरी आंख को ही निकाल लिया जाता है जैसे भ्रम शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि यदि लोग नेत्रदान के लिए आगे आएं तो राजस्थान में तीन लाख का आंकड़ा कम होगा और दृष्टिबाधितों के जीवन का अंधेरापन दूर होगा।
शर्मा ने कहा, ‘‘इन भ्रांतियों को मिटाने में समय लगेगा, लेकिन हर परिवार और समाज को प्रयास करना चाहिए कि परिवार में मृत्यु के बाद नेत्रदान अवश्य हो।’’
उन्होंने बताया कि राजस्थान में होने वाले 91 प्रतिशत प्रत्यारोपण उनकी संस्था ही करती है, जिसके लिए 16 जिलों में 14 केंद्र स्थापित हैं।
उन्होंने बताया कि कॉर्निया प्राप्त कर जयपुर लाया जाता है और उसे यहां प्रत्यारोपण होने लायक बनाया जाता है। इसके बाद विभिन्न जगहों पर वितरित किया जाता है।
प्रियंका स्वामी ने बताया कि राजस्थान के अलावा 30 शहरों और छह राज्यों में भी कॉर्निया भेजा जा रहा है। उन्होंने बताया कि राजस्थान में सात सरकारी अस्पतालों और 25 निजी अस्पतालों में कॉर्निया उपलब्ध कराया जा रहा है।
प्रियंका ने बताया कि जब कॉर्निया प्राप्त किया जाता है तो उसे एक विशेष रसायन में रखा जाता है, ताकि उसकी गुणवत्ता खराब न हो। उन्होंने बताया कि 15 दिन तक कॉर्निया सुरक्षित रहता है, और यदि 15 दिन में कॉर्निया का उपयोग नहीं होता है तो उसे सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज के छात्रों के लिए अनुसंधान हेतु दे दिया जाता है।
प्रियंका ने बताया कि मृत्यु के छह से आठ घंटे तक आंखें सुरक्षित रहती हैं और 24 घंटे के भीतर कॉर्निया आई बैंक तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने बताया कि कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे एड्स, हेपेटाइटिस, सर्पदंश, जलने, डूबने आदि) में नेत्रदान संभव नहीं होता।
कॉर्निया लाभार्थी गौरव थापा ने कहा, ‘‘मैं निर्माण क्षेत्र में काम करता था। मेरी आंख में कंकड़ लगने से आंख खराब हो गई थी। चार महीने बाद ही मेरी शादी थी। एक युवक की दुर्घटना में मौत हो गई तो उनके माता-पिता ने अपने बेटे का नेत्रदान किया, जिसका कॉर्निया मुझे लगा।’’
उन्होंने बताया, ‘‘2011 से लेकर अब तक मेरी आंख एकदम ठीक है। मैं तो यही कहूंगा कि हमें भी मरने के बाद अपने अंगों को दान करना चाहिए ताकि किसी जरूरतमंद के काम आ सके।’’
नेत्रदान करने वाले परिवार के सुनील बैरवा ने बताया, ‘‘मुझे गर्व महसूस होता है कि मेरा बड़ा भाई किसी की नजर से हमें देख रहा है। हम तो बस यही कहेंगे कि नेत्रदान अवश्य करना चाहिए ताकि किसी दृष्टिबाधित का जीवन रोशन हो सके।’’
आंख में क्रिकेट की बॉल लगने से विकास सैनी की आंखों में अंधेरा छाने लगा। सैनी ने कहा कि वह बड़ा होकर डॉक्टर बनना चाहता था, लेकिन आंख में लगने के कारण तनाव होने लगा कि अब डॉक्टर कैसे बनूंगा।
उन्होंने कहा, ‘‘ऑपरेशन के बाद जब दिखने लगा तो मुझे सबसे बड़ी खुशी मिल गई। अब मैं अपने सपने को जरूर पूरा करूंगा।’’
कभी अपने अंधेपन से लाचार पवन शर्मा आज कॉर्निया प्रत्यारोपण के बाद खुश हैं और नेत्रदान करने वाले के प्रति आभारी हैं। पवन ने कहा कि आंखों की रोशनी लौटने से जीवन में नई उमंग भर गई है।
बॉबी की शादी के तुरंत बाद कॉर्निया की खराबी से छोटे-छोटे कामों पर दूसरों पर निर्भरता ने जिंदगी में कड़वाहड़ घोल दी थी।
बॉबी ने बताया, ‘‘ऑपरेशन के बाद मुझे नई जिंदगी मिली है। मैं अपनी इस खुशी को शब्दों में बयां नहीं सकती।’’
भाषा बाकोलिया नेत्रपाल शफीक
शफीक

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