‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त पंजाब में सैन्य ढांचे पर हमले के दावे की उपग्रह तस्वीरें भ्रामक: सूत्र
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त पंजाब में सैन्य ढांचे पर हमले के दावे की उपग्रह तस्वीरें भ्रामक: सूत्र
नयी दिल्ली, दो जनवरी (भाषा) कुछ पाकिस्तानी तत्व सोशल मीडिया पर ऐसी “भ्रामक और अपुष्ट उपग्रह तस्वीरें” प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें दावा किया गया है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पंजाब में भारतीय सैन्य ठिकानों पर हमले हुए। मामले से वाकिफ सूत्रों ने शुक्रवार को कहा कि पाकिस्तानी तत्वों के इस कृत्य का मकसद “एक विफल विमर्श को फिर से हवा देना है।”
सूत्रों ने कहा कि इन तस्वीरों में दिखाए गए ठिकानों के स्वतंत्र सत्यापन से “पुष्टि होती है कि कथित लक्ष्यों पर विनाश या क्षति का कोई मंजर ही नहीं नजर आता है।”
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर चलाया जा रहा मौजूदा अभियान अप्रमाणित तस्वीरों और “दुष्प्रचार को फिर से हवा देने की कोशिशों” पर आधारित है, जो स्वतंत्र जांच में नहीं टिकता।
भारत ने पिछले साल 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था, जिसके तहत पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया। जवाब में पाकिस्तान ने भी भारत पर हमले किए, जिससे दोनों पक्षों के बीच सैन्य संघर्ष छिड़ गया।
उस समय मीडिया ब्रीफिंग के दौरान भारतीय अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें “दुष्प्रचार अभियान” का भी मुकाबला करना पड़ा था।
मामले से वाकिफ एक सूत्र ने कहा कि “एक विफल विमर्श को फिर से हवा देने” की हताश कोशिशों के तहत कुछ पाकिस्तानी तत्वों ने “एक बार फिर सोशल मीडिया का सहारा लेकर भ्रामक और अपुष्ट उपग्रह चित्र प्रसारित किए हैं, जिनमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान अमृतसर के आसपास के क्षेत्रों सहित पूरे पंजाब में भारतीय सैन्य ठिकानों पर हमले का झूठा दावा किया गया है।”
हालांकि, सूत्र ने कहा कि तथ्य बदले नहीं हैं और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पंजाब में भारतीय सैन्य ठिकानों पर पाकिस्तानी हमलों के दावों का समर्थन करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है।
मामले से वाकिफ एक अन्य सूत्र ने कहा कि तस्वीरों में दिखाए गए भारतीय सैन्य ठिकाने “पूरी तरह से सुरक्षित हैं, उनपर हमले के प्रभाव, संरचनात्मक क्षति या किसी भी अन्य नुकसान के कोई संकेत नहीं मिले हैं।”
सूत्र ने कहा कि सात महीने बाद इन तस्वीरों का अचानक सामने आना, वह भी “सत्यापन योग्य समय-विवरण, उपग्रह-स्रोत विवरण या आधिकारिक पुष्टि के बिना”, वास्तविक दस्तावेज पेश करने के बजाय झूठा विमर्श गढ़ने के लगातार किए जा रहे प्रयासों का सबूत है।
भाषा पारुल सुरेश
सुरेश

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