दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार के खिलाफ याचिका की स्वीकार्यता पर न्यायालय ने सवाल खड़े किये

दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार के खिलाफ याचिका की स्वीकार्यता पर न्यायालय ने सवाल खड़े किये

दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार के खिलाफ याचिका की स्वीकार्यता पर न्यायालय ने सवाल खड़े किये
Modified Date: May 6, 2026 / 08:17 pm IST
Published Date: May 6, 2026 8:17 pm IST

नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड की ओर से 40 साल पहले दायर एक जनहित याचिका की स्वीकार्यता पर बुधवार को सवाल खड़े किये।

इस याचिका में यह मुद्दा उठाया गया था कि क्या इस समुदाय का सर्वोच्च धर्माधिकारी अपने किसी भी सदस्य का बहिष्कार कर सकता है और क्या यह संविधान के तहत धार्मिक प्रथा के रूप में संरक्षित है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में नौ-सदस्यीय संविधान पीठ इस समय धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें केरल का शबरिमला मंदिर मामला भी शामिल है। यह पीठ विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा पर भी विचार कर रही है, जिनमें दाऊदी बोहरा समुदाय भी शामिल है।

पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत के अलावा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में एक जनहित याचिका दायर कर 1962 के उस फैसले को रद्द करने की मांग की थी, जिसमें “सरदार सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहेब” मामले में ‘‘बम्बई बहिष्कार निवारण अधिनियम 1949’’ को रद्द कर दिया गया था और समुदाय के किसी भी सदस्य के बहिष्कृत किये जाने को अवैध घोषित किया गया था।

संविधान पीठ के वर्ष 1962 के फैसले में कहा गया था, ‘‘दाऊदी बोहरा समुदाय की धार्मिक आस्था और सिद्धांतों से यह स्पष्ट है कि धार्मिक आधार पर उसके धार्मिक प्रमुख द्वारा बहिष्कृत किये जाने की शक्ति का इस्तेमाल उसके धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है। इसलिए 1949 का अधिनियम, जो ऐसे बहिष्कार को भी अवैध घोषित करता है, संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत समुदाय के अधिकार का उल्लंघन करता है।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने पीठ को बताया कि वह सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह और एक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिनके पिता दिवंगत असगर अली इंजीनियर स्वयं बहिष्कार के शिकार रहे थे और जिनके परिवार ने इसका गंभीर प्रभाव झेला है।

रामचंद्रन ने दलील दी कि जैसे पारसी समुदाय में अंतरधार्मिक विवाह करने वाली महिलाओं को धार्मिक आलोचना का सामना करना पड़ता है, वैसे ही दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार मानव गरिमा को सीधे प्रभावित करता है।

उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया कि दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख को ‘दाई’ कहा जाता है, जो शिया मुसलमानों का एक संप्रदाय है। शिया मुसलमानों में दो प्रमुख बोहरा संप्रदाय हैं- दाऊदी बोहरा और सुलेमानी बोहरा।

उन्होंने कहा, ‘‘दाई को 21वें इमाम का प्रतिनिधि माना जाता है, जो खुद ही जीवन से विरक्त हुए माने जाते हैं। दाऊदी बोहरा आस्था की विशेषता यह है कि दाई सर्वोच्च अधिकारी हैं।’’

रामचंद्रन ने यह भी बताया कि बच्चे जब जवानी की दहलीज में प्रवेश करते हैं तो वे सभी मामलों में दाई के प्रति पूर्ण निष्ठा की शपथ लेते हैं।

उन्होंने दलील दी कि यह केवल दाऊदी बोहरा समुदाय तक सीमित नहीं है; विभिन्न धर्मों में आस्था की एकता बनाए रखने के लिए अलग-अलग प्रकार के धार्मिक दंड या अनुशासन की व्यवस्था हो सकती है।

रामचंद्रन ने कहा, ‘‘इसलिए मुद्दा केवल धार्मिक अनुशासन थोपने का नहीं है, बल्कि असली सवाल यह है कि दंड कितना अनुपातिक है और उसका मानव गरिमा पर क्या प्रभाव पड़ता है।’’

इसी दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने पूछा, ‘‘आपकी प्रार्थना क्या है? क्या आप अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करके एक संविधान पीठ के फैसले को रद्द करने की मांग कर रहे हैं?’’

उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि शीर्ष अदालत को “सुसंगत” रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायालय रातों-रात अपना “रंग” नहीं बदल सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि अनुच्छेद 32 की याचिकाओं को संविधान पीठ के निर्णयों के खिलाफ कैसे स्वीकार किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘हम भी अंततः अपने ऊपर लागू सख्त और कठोर अनुशासन से बंधे हुए हैं। अनुच्छेद 32 के तहत एक याचिका आती है और आप एक संविधान पीठ के फैसले को दरकिनार कर देते हैं, तथा आप अपना खुद का निर्णय देकर पहले के फैसले को पलट देते हैं।’’

उन्होंने यह भी कहा, ‘‘एक दो-न्यायाधीशों की पीठ भी कल ऐसा ही कर सकती है। यह हमारे न्यायालय की कार्यप्रणाली और परंपरा से जुड़ा एक गंभीर विषय है।’’

रामचंद्रन ने जवाब दिया कि वह इस प्रश्न का ‘‘पूरी तरह और स्पष्ट रूप से’’ उत्तर देंगे, लेकिन बाद के चरण में।

इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘जब तक आप इस मुद्दे को स्पष्ट नहीं करते, हम आपके मामले के गुण-दोष पर कैसे सुनवाई कर सकते हैं? जब तक यह विषय सुलझ नहीं जाता, हम याचिका पर सुनवाई नहीं कर सकते।’’

उन्होंने यह भी टिप्पणी की, ‘‘कल हम शबरिमला मामले में यह कह रहे थे कि उस याचिका को (सुनवाई के लिए) स्वीकार ही क्यों किया गया। आज हम अपना रुख बदलकर यह नहीं कह सकते कि आपकी याचिका क्यों स्वीकार की जानी चाहिए। हम वही नौ न्यायाधीश हैं, (जो शबरिमला मामले में थे)। कल शबरिमला से क्या निष्कर्ष निकला? हमने कहा था कि याचिका को क्यों स्वीकार किया गया। आज हमें क्या कहना चाहिए? दोनों ही अनुच्छेद 32 की याचिकाएं हैं।’’

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को उस गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘इंडियन यंग लॉयर्स’ को कड़ी फटकार लगाई, जिसकी जनहित याचिका पर शीर्ष अदालत ने शबरिमला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। न्यायालय ने एनजीओ की धार्मिक मान्यता और उसकी मंशा पर भी सवाल उठाए।

संविधान पीठ ने यह जानना चाहा था कि 2006 में यह याचिका दायर करने के पीछे एनजीओ का उद्देश्य क्या था और मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे में उसका क्या हित या भूमिका है।

हिंदू पुरुष से शादी करने को लेकर धार्मिक बहिष्कार का दंश झेल रही एक पारसी महिला की भी याचिका पर कल बहस हुई थी। उनकी ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने कहा था कि ऐसा करना कानून की दृष्टि से गलत है।

मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।

भाषा

सुरेश माधव

माधव


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