न्यायालय ने दो दशक पुराने मामले में देरी पर नाखुशी जताई, छह सप्ताह में जांच पूरी करने का निर्देश

न्यायालय ने दो दशक पुराने मामले में देरी पर नाखुशी जताई, छह सप्ताह में जांच पूरी करने का निर्देश

न्यायालय ने दो दशक पुराने मामले में देरी पर नाखुशी जताई, छह सप्ताह में जांच पूरी करने का निर्देश
Modified Date: June 4, 2026 / 06:33 pm IST
Published Date: June 4, 2026 6:33 pm IST

नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को गुजरात पुलिस को राजस्व अभिलेखों में जालसाजी और धोखाधड़ी से संबंधित दो दशक पुरानी आपराधिक शिकायत की जांच छह सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया और कहा कि संवैधानिक अदालतों का यह कर्तव्य है कि जब बहुत समय से लंबित जांच की बात उनके संज्ञान में लाई जाए तो वे मूक दर्शक न बनी रहें।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने टिप्पणी की कि इस मामले में आपराधिक शिकायत की जांच में अत्यधिक देरी हुई है।

पीठ ने कहा कि तेज गति से सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से अंतर्निहित रूप से जुड़ा हुआ है।

मौजूदा मामले के मुताबिक, एक व्यक्ति ने भीलोडा के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष चार व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक षड्यंत्र), 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और 463 (जाली दस्तावेज बनाना) के तहत शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उक्त संपत्ति उसने 1975 में स्वयं अर्जित की थी। बाद में, जब वह पांच फरवरी, 2002 से 21 मार्च, 2002 तक हज यात्रा पर था, तब आरोपियों ने उसके जाली हस्ताक्षर बनाकर उक्त संपत्ति से संबंधित एक फर्जी विभाजन विलेख और एक फर्जी विक्रय विलेख तैयार किया। इस प्रकार की जालसाजी के जरिये आरोपियों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किए गए।

वर्ष 2014 में, पुलिस ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसे अस्वीकार कर दिया गया और विस्तृत जांच का निर्देश दिया गया, जिसे 60 दिनों के भीतर पूरा किया जाना था। बाद में, 2017 में गुजरात उच्च न्यायालय ने छह सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया और यह भी दर्ज किया कि जांच के दौरान एकत्र की गई कुछ सामग्री संबंधित पुलिस थाने से गायब हो गई थी।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि उच्च न्यायालय को आरोपपत्र दाखिल करने में हुई अत्यधिक देरी पर ध्यान देना चाहिए था और इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए था।

भाषा शफीक नरेश

नरेश


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