न्यायालय ने कोलकाता बहूबाजार विस्फोट मामले के दोषी की समय से पहले रिहाई आदेश पर लगाई रोक
न्यायालय ने कोलकाता बहूबाजार विस्फोट मामले के दोषी की समय से पहले रिहाई आदेश पर लगाई रोक
नयी दिल्ली, 23 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें 1993 के कोलकाता बहूबाजार बम विस्फोट के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक दोषी को समय से पहले रिहा करने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति पी. के. मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका पर अंतरिम राहत दी। राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के 5 जून के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें दोषी मोहम्मद राशिद खान (77) को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर खान को भी नोटिस जारी किया जिसे ‘टाडा’ (आतंकवादी एवं विघटनकारी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के कड़े प्रावधानों के तहत दोषी करार दिया गया था।
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में त्रुटि की है। उन्होंने ऐसे में मामले में खान को राहत देने के लिए ‘सुधारवादी सिद्धांत’ पर भरोसा करने पर सवाल उठाया जिसमें 70 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों अन्य घायल हुए थे।
खान की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने बताया कि उनके मुवक्किल ने जेल में 33 साल से अधिक समय बिताया है और इस बात पर जोर दिया कि एक सह-आरोपी पन्नालाल जैसवारा को मार्च 2014 में सजा में छूट दी गई थी।
हालांकि, पीठ ने कहा कि मामले में उनकी भूमिकाएं पूरी तरह से अलग-अलग रही हैं। साथ ही यह उल्लेख किया कि खान विस्फोट की घटना का ‘‘सरगना’’ था।
शमशाद ने दलील दी कि कैदी का जेल में अच्छा आचरण रहा है, उसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।
पीठ ने टिप्पणी की कि उसे ऐसे कृत्य के लिए सजा सुनाई गई है जो ‘‘लगभग आतंकवादी कृत्य’’ के समान है।
खान के वकील ने उसकी खराब सेहत का जिक्र करते हुए पीठ से कहा, ‘‘वह मानसिक रूप से अस्वस्थ नहीं है, लेकिन उनकी हालत खराब है।’’
पीठ ने कहा कि अगर उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई, तो राज्य की सरकार की अपील निरर्थक हो जाएगी।
राज्य सरकार ने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने उसकी रिहाई के खिलाफ राज्य के ‘सजा समीक्षा बोर्ड’ की सिफारिश के बावजूद उसे राहत दी।
पांच जून को, उच्च न्यायालय ने खान के लंबे समय तक जेल में रहने, जेल में उसके व्यवहार को ध्यान में रखते हुए समय से पहले रिहा करने का आदेश दिया था।
वर्ष 2001 में एक विशेष टाडा अदालत ने 1993 के बहूबाजार मामले में खान और चार अन्य लोगों को दोषी करार दिया था। यह घटना उसकी कार्यशाला में हुई थी, जहां विस्फोटक रखे गए थे। खान को टाडा, शस्त्र अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
बाद में, शीर्ष अदालत ने उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा था।
भाषा सुभाष नरेश
नरेश

Facebook


