‘अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स’ का टिकट काउंटर केसरिया से रंगा गया

‘अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स’ का टिकट काउंटर केसरिया से रंगा गया

‘अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स’ का टिकट काउंटर केसरिया से रंगा गया
Modified Date: August 12, 2026 / 10:23 pm IST
Published Date: August 12, 2026 10:23 pm IST

कोलकाता, 12 अगस्त (भाषा) कोलकाता की मशहूर सांस्कृतिक संस्था ‘अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स’ बुधवार को एक बार फिर राजनीतिक प्रतीकों की लड़ाई का ‘कैनवास’ बन गई।

नाट्य कर्मियों द्वारा एक दिन पहले इसकी दीवारों को सफेद रंग से रंगे जाने के बाद बुधवार को भाजपा विधायक रुद्रनील घोष की मौजूदगी में इसके एक हिस्से पर फिर से केसरिया रंग चढ़ा दिया गया और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए गए।

पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता में आने के बाद अकादमी के टिकट काउंटर की दीवार का रंग बदलकर केसरिया कर दिया गया था। इससे जाने-माने नाट्य कलाकारों को काफी निराशा हुई। उन्होंने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य को पत्र लिखकर अपील की थी कि इस संस्थान को राजनीतिक प्रतीकों की लड़ाई से दूर रखा जाए।

पेंट की एक परत को लेकर शुरू हुई बहस अब राजनीतिक पहचान की एक प्रतीकात्मक लड़ाई में बदल गई है। वैसे भाजपा ने खुद को ‘‘रंग बदलने वाली राजनीति’’ से दूर दिखाने का प्रयास किया था।

हालांकि, नाट्यकला से जुड़े लोगों और राजनीतिक विरोधियों ने पश्चिम बंगाल की वामपंथी कलात्मक परंपरा से लंबे समय से जुड़ी सांस्कृतिक जगह में केसरिया रंग के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।

बुधवार को मौके पर मौजूद रुद्रनील घोष ने इमारत की दीवारों को हाल में केसरिया रंग से रंगे जाने को सही ठहराने के लिए उस ढांचे की एक पुरानी तस्वीर दिखाई।

अभिनय से राजनीति के क्षेत्र में आए घोष ने कहा, ‘‘इस टिकट काउंटर का रंग साफ तौर पर केसरिया और चॉकलेट जैसा था। असली रंग वही रहेगा। बस एक महीने पहले, अकादमी परिसर लाल झंडों से ढका हुआ था। कार्यसमिति अकादमी के न्यासमंडल को परेशान कर रही है। यहां भ्रष्टाचार का बोलबाला है, लेकिन वामपंथियों को इससे कोई दिक्कत नहीं है।’’

उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने मंगलवार को दीवारों को सफेद रंग से रंगा, वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सक्रिय कार्यकर्ता थे।

घोष ने माकपा नेता विकास रंजन भट्टाचार्य पर भी निशाना साधा, जो उन कलाकारों, नाट्य कर्मियों और संस्कृति प्रेमियों के बीच मौजूद थे, जिन्होंने सिर्फ 24 घंटे पहले ही दीवारों को दोबारा सफेद रंग से रंगा था।

राज्य की सत्ता में बदलाव के बाद जुलाई की शुरुआत में सामिक भट्टाचार्य ने इमारत की दीवारों को केसरिया रंग में रंगने के कदम की निंदा की थी।

भाषा

राजकुमार पारुल

पारुल


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