लू से निपटने के लिए वार्ड-स्तरीय जोखिम मानचित्र, समर्पित कार्ययोजना बनाने का सुझाव
लू से निपटने के लिए वार्ड-स्तरीय जोखिम मानचित्र, समर्पित कार्ययोजना बनाने का सुझाव
नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के एक कोर समूह ने शहरी क्षेत्रों में लू और उसके प्रभावों को कम करने के लिए कई सिफारिशें की हैं, जिनमें रिमोट सेंसिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अन्य प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कर वार्ड-स्तर पर गर्मी के प्रति संवेदनशीलता और उससे निपटने की क्षमता का मानचित्र तैयार करना, समर्पित कार्य योजनाएं बनाना और हरित आवरण का विस्तार करना शामिल है। एनएचआरसी की ओर से बृहस्पतिवार को जारी बयान में यह जानकारी दी गई है।
बयान के मुताबिक, एनएचआरसी अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी रामासुब्रमणियन ने बुधवार को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर अपने कोर समूह की बैठक की अध्यक्षता की, जिसका विषय ‘शहरी क्षेत्रों में लू और उसका शमन’ था।
बयान के अनुसार, बैठक में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रामासुब्रमणियन ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने लायक स्थिति न होने और शहरों में ‘कंक्रीट के जंगलों’ के विकास के कारण तापमान वृद्धि और लू से संबंधित चुनौतियां और बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा कि दशकों से पर्यावरण को हुए नुकसान की “भरपाई” नहीं की जा सकती है और हमारा ध्यान इसके प्रभाव को कम करने पर केंद्रित होना चाहिए।
एनएचआरसी प्रमुख ने कहा, “हमारे लिए सब कुछ पहले जैसा कर लेना संभव नहीं है।”
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रामासुब्रमणियन ने इस बात को रेखांकित किया कि जल निकायों और जंगलों का विनाश गर्मी का प्रकोप बढ़ने का “प्रमुख कारण” है। उन्होंने मौजूदा पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के मजबूत उपाय करने, जल निकायों के आसपास निर्माण पर सख्त पाबंदी लगाने और टिकाऊ शहरी विकास पर केंद्रित व्यावहारिक सिफारिशें पेश किए जाने की वकालत की।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रामासुब्रमणियन ने कहा कि औद्योगिक क्रांति ने जलवायु परिवर्तन और लू के प्रकोप को इस कदर बढ़ा दिया कि “हमें इसका एहसास तब होने लगा, जब इसका वास्तव में हमारे जीवन पर असर पड़ा।”
उन्होंने कहा, “अगर कोई गांधीवादी अर्थव्यवस्था के बारे में पढ़े, तो उसे पता चलेगा कि राष्ट्रपिता ने कभी भी पूरे देश के औद्योगीकरण की कल्पना नहीं की थी। उनका (महात्मा गांधी) सपना था कि हर गांव को आत्मनिर्भर होना चाहिए, लेकिन इसके विपरीत हुआ, जिसके परिणामस्वरूप गांवों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन हुआ।”
एनएचआरसी प्रमुख ने कहा कि सर्दियों में प्रदूषण और गर्मियों में लू के प्रकोप पर हर साल चर्चा की जाती है, लेकिन इनके प्रभाव से मानव जीवन की रक्षा के लिए किए गए शमन प्रयासों का कोई स्पष्ट असर नहीं दिख रहा है।
बयान के मुताबिक, बैठक में जो प्रमुख सुझाव उभरकर सामने आए, उनमें जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, एआई, भूमि सतह तापमान और सामाजिक भेद्यता संकेतकों का इस्तेमाल करके वार्ड-स्तरीय ताप संवेदनशीलता और लचीलापन मानचित्र विकसित करना शामिल है, जो स्थानीय पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और एक समग्र ‘ताप संवेदनशीलता सूचकांक’ से समर्थित हो।
बयान के अनुसार, बैठक में गर्मी से निपटने की कार्ययोजना को संस्थागत बनाने और समर्पित “हीट अधिकारियों”, नियमित निगरानी तथा अंतर विभागीय समन्वय के माध्यम से सभी राज्यों, जिलों और शहरों में इनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करने का भी सुझाव दिया गया। इसमें एक एकीकृत और वैज्ञानिक रूप से मान्य रिपोर्टिंग एवं डेटा प्रबंधन प्रणाली के जरिये लू से होने वाली मौतों और इससे प्रभावित मरीजों की निगरानी में सुधार लाने की भी सिफारिश की गई।
भाषा पारुल रंजन
रंजन

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