कमजोर या मनगढ़ंत जांच से आपराधिक मुकदमा कमजोर पड़ता है : न्यायालय
कमजोर या मनगढ़ंत जांच से आपराधिक मुकदमा कमजोर पड़ता है : न्यायालय
नयी दिल्ली, 28 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि कमजोर या पूर्व-नियोजित जांच, दोनों ही आपराधिक अभियोजन के लिए घातक हैं, लेकिन पूर्व-नियोजित जांच अधिक ‘‘घातक’’ होती है, क्योंकि इसमें निर्दोष लोगों के फंसने की पूरी संभावना होती है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने ये टिप्पणियां असम में जुलाई 2008 में दर्ज हत्या के एक मामले के आरोपियों को बरी करते हुए कीं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह अपराध अनसुलझा ही रह गया और 16 लोगों के खिलाफ मुकदमे पर काफी समय एवं धन खर्च हुआ। इनमें से कुछ की मुकदमे के दौरान मृत्यु भी हो गई तथा बाकी को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा।
पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘‘कमजोर जांच या पूर्व-नियोजित जांच, दोनों ही, आपराधिक अभियोजन के लिए घातक हैं; लेकिन दूसरी स्थिति (पूर्व-नियोजित जांच) के परिणाम अधिक गंभीर होते हैं, क्योंकि इसमें निर्दोष लोगों के फंसने की पूरी संभावना होती है।’’
शीर्ष अदालत ने उन आरोपियों की अपीलों पर अपना फैसला सुनाया, जिन्होंने मार्च 2021 के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसे गौहाटी उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा था।
पीठ ने कहा कि कुल 16 लोगों के विरुद्ध आरोप-पत्र दाखिल किया गया था, जिनमें से एक की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई।
शीर्ष अदालत ने बताया कि 12 आरोपियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें कथित अपराधों के लिए दंडित किया गया, जिनमें तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) के अंतर्गत आरोप भी शामिल थे।
उच्च न्यायालय ने 11 आरोपियों की दोषसिद्धि और दंड को बरकरार रखा था, जबकि एक आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि दोषी ठहराए गए लोगों ने उसके समक्ष अपील दायर की है, जिनमें से दो अपीलकर्ता अब इस दुनिया में नहीं रहे।
पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।
भाषा सुरेश नरेश
नरेश

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