पश्चिम बंगाल चुनाव: भाजपा की नजर दक्षिण बंगाल में तृणमूल के अभेद्य किले में सेंध लगाने पर
पश्चिम बंगाल चुनाव: भाजपा की नजर दक्षिण बंगाल में तृणमूल के अभेद्य किले में सेंध लगाने पर
कोलकाता, 28 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे एवं अंतिम चरण के तहत बुधवार को होने वाला मतदान तय करेगा कि क्या तृणमूल कांग्रेस दक्षिण बंगाल के अपने गढ़ को बरकरार रख पाती है या भारतीय जनता पार्टी इसमें सेंध लगाकर सत्ता तक पहुंचने में सफल होती है।
चुनाव के दूसरे चरण के तहत बुधवार को राज्य विधानसभा की 142 सीट के लिए मतदान होगा।
पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान में इस बात की परीक्षा हुई कि उत्तर बंगाल और आस-पास के जिलों में भाजपा अपनी पारंपरिक बढ़त को बरकरार रख सकी है या नहीं और अब दूसरे चरण में तृणमूल कांग्रेस के गढ़ – कोलकाता, हावड़ा, उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना, नदिया, हुगली और पूर्वी बर्धमान – के मुकाबलों पर नजर रहेगी।
दूसरे चरण में जिन 142 सीट पर मतदान होना है, उनमें से तृणमूल कांग्रेस ने 2021 में 123 सीट जीती थीं, भाजपा ने सिर्फ 18 और ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट’ (आईएसएफ) ने एक सीट हासिल की थी।
पांच साल पहले भाजपा के आक्रामक प्रचार अभियान के बावजूद ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस ने दक्षिण बंगाल में शानदार प्रदर्शन किया और राज्य की सत्ता पर अपना कब्जा बरकरार रखा।
इस नतीजे ने स्पष्ट कर दिया कि अगर आपको पश्चिम बंगाल की सत्ता चाहिये, तो दक्षिण बंगाल को जीतना सबसे जरूरी है।
भवानीपुर विधानसभा सीट पर भी इसी चरण में मतदान होना है, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गढ़ है और भाजपा ने यहां नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है।
भाजपा के लिए दूसरा चरण केवल अंतिम दौर का मतदान नहीं है, बल्कि यह इस बात की असली परीक्षा है कि क्या सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप और नागरिकता की राजनीति सत्ताधारी दल की सबसे मजबूत दीवार में सेंध लगा सकती है।
तृणमूल कांग्रेस के लिए इस क्षेत्र पर अपनी पकड़ बरकरार रखना अहम है, जिससे उसके लगातार चौथी बार सत्ता में आने का रास्ता साफ होगा।
तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘‘यह हमेशा से हमारा मजबूत गढ़ रहा है तथा 2021 विधानसभा से लेकर 2024 के लोकसभा चुनावों में भी यहां के लोगों ने हमारा साथ दिया। अगर हम इस क्षेत्र में फिर से जीत दर्ज करते हैं, तो बंगाल में ममता बनर्जी की ही सरकार बनेगी।’’
भाजपा की प्रदेश इकाई के एक नेता ने कहा, “दक्षिण बंगाल के किले को ध्वस्त किये बिना हम सत्ता तक नहीं पहुंच सकते। उत्तर 24 परगना, कोलकाता और हावड़ा ही असली चुनावी युद्ध मैदान हैं। बदलाव यहीं से होगा।”
भौगोलिक स्थिति इसकी अहमियत को स्पष्ट करती है। उत्तर 24 परगना में विधानसभा की 33 सीट, दक्षिण 24 परगना में 31, हावड़ा में 16, नदिया में 17, हुगली में 18, पूर्वी बर्धमान में 16 और कोलकाता में 11 सीट हैं।
सीटों का यही गणित बताता है कि क्यों भाजपा के शीर्ष नेताओं ने प्रचार के अंतिम चरण में इन जिलों पर खास ध्यान केंद्रित किया और रैलियों व रोड शो के जरिए भ्रष्टाचार, घुसपैठ, चुनाव बाद हिंसा तथा महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। साथ ही, बनगांव के मतुआ ठाकुरबाड़ी जाकर प्रतीकात्मक रूप से इस समुदाय के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश भी की।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का यह बयान कि मतदान के बाद केंद्रीय बल 60 दिन तक पश्चिम बंगाल में तैनात रहेंगे, को 2021 के चुनाव बाद हुई हिंसा के संदर्भ में देखा गया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह संदेश तृणमूल कांग्रेस विरोधी मतदाताओं को आश्वस्त करने के लिए था कि यदि वे सत्तारूढ़ दल के खिलाफ मतदान करते हैं, तो उन्हें बाद में प्रताड़ना का सामना नहीं करना पड़ेगा।
वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने इसे डर की राजनीति करार देते हुए आरोप लगाया कि भाजपा दिल्ली से बंगाल को नियंत्रित करना चाहती है और केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है।
सत्तारूढ़ दल ने जवाब में कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय पहचान के मुद्दे को प्रमुखता देते हुए चुनाव को “बंगाल के अधिकारों” की रक्षा की लड़ाई बताया और चेतावनी दी कि भाजपा का अंतिम लक्ष्य ‘एनआरसी और सामाजिक विभाजन’ है।
राज्य में पहले चरण में 93.19 प्रतिशत मतदान दर्ज होने के बाद बनर्जी ने दावा किया था कि तृणमूल कांग्रेस पहले ही 100 सीट का आंकड़ा पार कर चुकी है।
यह राज्य में अब तक का सबसे अधिक मत प्रतिशत है।
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने नाम हटाए जाने के मुद्दे को दूसरे चरण का संभवत: सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।
उत्तर 24 परगना में मतदाता सूचियों से 12.6 लाख से अधिक नाम हटाए गए, दक्षिण 24 परगना में 10.91 लाख से अधिक, कोलकाता में लगभग 6.97 लाख, हावड़ा में लगभग छह लाख, हुगली में 4.68 लाख और नादिया में लगभग 4.85 लाख नाम हटाए गए।
कम से कम 25 निर्वाचन क्षेत्रों में हटाए गए नामों की संख्या पिछली जीत के अंतर से कहीं अधिक है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में जीत का अंतर हटाए गए नामों की तुलना में कम है, वहां एसआईआर न केवल चुनाव परिणामों को, बल्कि चुनाव के बाद के विमर्श को भी बदल सकता है
हालांकि, इस व्यापक मुकाबले के बीच भवानीपुर सीट प्रतिष्ठा का केंद्र बनी हुई है। इसे नंदीग्राम की तरह ही देखा जा रहा है, जहां 2021 में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया था। अब पांच साल बाद यह सियासी जंग तृणमूल कांग्रेस प्रमुख के गढ़ तक पहुंच गई है।
तृणमूल कांग्रेस के लिए भवानीपुर सीट बचाए रखना बनर्जी की राजनीतिक पकड़ को बनाए रखने और प्रतिष्ठा का सवाल है। वहीं, भाजपा के लिए इस किले को ढहाने का मतलब बंगाल की सबसे शक्तिशाली नेता के ‘अजेय’ होने के मिथक को तोड़ना होगा।
कोलकाता नगर निगम के आठ वार्डों में फैली भवानीपुर सीट को अक्सर ‘मिनी इंडिया’ कहा जाता है, जहां बंगाली, गुजराती, मारवाड़ी, जैन, सिख, मुस्लिम और बिहार-झारखंड से आए प्रवासी समुदायों की विविध आबादी रहती है।
भाषा
राखी दिलीप
दिलीप

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