जब अन्याय ही कानून बन जाए तो प्रतिरोध ही एकमात्र रास्ता रह जाता है : माकपा नेता ने मालदा घटना पर कहा

जब अन्याय ही कानून बन जाए तो प्रतिरोध ही एकमात्र रास्ता रह जाता है : माकपा नेता ने मालदा घटना पर कहा

जब अन्याय ही कानून बन जाए तो प्रतिरोध ही एकमात्र रास्ता रह जाता है : माकपा नेता ने मालदा घटना पर कहा
Modified Date: April 4, 2026 / 12:47 pm IST
Published Date: April 4, 2026 12:47 pm IST

कोलकाता, चार अप्रैल (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव का बचाव करते हुए कहा कि ‘‘जब अन्याय ही कानून बन जाए, तो प्रतिरोध ही एकमात्र रास्ता रह जाता है।’’

बुधवार को हुई हिंसक घटनाओं और देर रात तक चले नाटकीय घटनाक्रम पर माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव एवं पोलित ब्यूरो के सदस्य सलीम ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में इस घटना को ‘‘जनता की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने में केंद्र और राज्य, दोनों के ही विफल रहने तथा त्रुटिहीन मतदाता सूची के प्रकाशन का परिणाम’’ बताया।

उन्होंने कहा, ‘‘जब लोगों की नागरिकता और मतदान के अधिकार छीने जाते हैं, तो ऐसे आंदोलन होना तय है। निर्वाचन आयोग जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन कर रहा है। जब आपराधिक मानसिकता के लोग विधायक बनते हैं, तो वे कानून बनाकर उभरते मुद्दों का समाधान करने में विफल रहते हैं और कार्यपालिका व नौकरशाही की शक्ति बढ़ा देते हैं। इसलिए अब यह लड़ाई जनता बनाम कार्यपालिका बन गई है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब बीडीओ से लेकर सीईओ और निर्वाचन आयोग तक के अधिकारी न्याय देने में विफल रहते हैं, तो प्रशासन का चरित्र पुलिस राज्य जैसा हो जाता है। वे लोकतांत्रिक रास्ते से भटककर कठोर दमनात्मक कदम उठाने लगते हैं।’’

बुधवार को मालदा जिले के मोथाबाड़ी क्षेत्र में एसआईआर के बाद मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विरोध में प्रदर्शन कर रही भीड़ हिंसक हो गई। प्रदर्शनकारियों ने सड़क अवरुद्ध कर दी, वाहनों में तोड़फोड़ की और पुलिसकर्मियों पर हमला किया। इस दौरान सात न्यायिक अधिकारियों को स्थानीय बीडीओ कार्यालय के अंदर बंधक बना लिया गया, जबकि एक अन्य अधिकारी को करीब नौ घंटे तक एक वाहन में बंद रखा गया।

इस हिंसा के संबंध में अब तक राज्य अपराध जांच विभाग (सीआईडी) द्वारा कम से कम 35 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) को इस घटना की जांच सौंपी है।

शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल प्रशासन की आलोचना की है।

गिरफ्तार लोगों में मुख्य आरोपी माने जा रहे कलकत्ता उच्च न्यायालय के 43 वर्षीय वकील मोफक्करुल इस्लाम, उनके सहयोगी वकील एकरामुल बगानी और मोथाबाड़ी से आईएसएफ उम्मीदवार मौलाना शाहजहां अली शामिल हैं।

माकपा ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए आईएसएफ के साथ गठबंधन किया है।

सलीम ने कहा, ‘‘जब अन्याय कानून बन जाता है, तो प्रतिरोध ही रास्ता होता है। दुनिया भर में लोगों ने ऐसे अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक और तर्कहीन कदमों का विरोध किया है। जनता की शक्ति को नजरअंदाज कर कोई भी कार्यपालिका लंबे समय तक नहीं टिक सकती।’’

वामपंथी नेता ने आरोप लगाया कि राज्य में विवादित एसआईआर प्रक्रिया हाशिए पर पड़े गरीब और पिछड़े वर्गों के खिलाफ ‘‘युद्ध’’ जैसी है।

उन्होंने कहा, ‘‘शुरुआत से ही एसआईआर की योजना विभाजनकारी राजनीति को फिर से स्थापित करने के लिए बनाई गई। जिन नामों को जांच के लिए अलग किया गया, वे क्षेत्र और धर्म के आधार पर चुने गए, जिसमें जनसांख्यिकी और चुनाव परिणामों को ध्यान में रखा गया।’’

उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘यह मतुआ समुदाय, शरणार्थियों, मुसलमानों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ एक युद्ध है। कई योग्य लोगों के नाम बिना कारण बताए हटा दिए गए। यह एक पक्षपाती एआई टूल के साथ अधूरे और खराब तरीके से की गई प्रक्रिया थी।’’

सलीम ने कहा कि इस प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका इसलिए बढ़ी क्योंकि विधायिका और कार्यपालिका दोनों अपने कर्तव्यों में विफल रहे।

उन्होंने कहा, ‘‘वे न तो पश्चिम बंगाल को समझते हैं और न ही बंगालियों को। उन्हें यह भी नहीं पता कि बंगाली नामों का उच्चारण, वर्तनी और लेखन कैसे होता है। ब्रिटिश काल से ही दिल्ली के शासक इसे समझने में विफल रहे हैं। न्याय-निर्णय के लिए नाम भेजना इस बात का प्रमाण है कि विधायिका और कार्यपालिका दोनों विफल हो चुकी हैं, और अब न्यायपालिका पर यह दायित्व आ गया है। ऐसे में नौकरशाही, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी शक्तिशाली हो जाते हैं और जनता का प्रतिरोध स्वाभाविक हो जाता है।’’

भाषा गोला नेत्रपाल

नेत्रपाल


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