गवाहों ने गत तीन दशक में सज्जन कुमार का आरोपी के तौर पर नाम नहीं लिया: अदालत
गवाहों ने गत तीन दशक में सज्जन कुमार का आरोपी के तौर पर नाम नहीं लिया: अदालत
नयी दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा)दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान जनकपुरी क्षेत्र में हिंसा भड़काने से संबंधित एक मामले में बृहस्पतिवार को बरी करते हुए कहा कि मामले के गवाहों ने तीन दशकों से अधिक समय तक उन्हें आरोपी के रूप में नामजद नहीं किया।
मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता हरविंदर सिंह ने बताया था कि दंगे की घटना के दौरान उनके रिश्तेदार अवतार सिंह और पिता सोहन सिंह कोहली की जान चली गई, जबकि वह हमेशा के लिए अशक्त हो गए।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘दुर्भाग्यवश, पीड़ित हरविंदर सिंह का (इस अदालत में) जिरह से पहले ही निधन हो गया। फिर भी, 1991 में दर्ज उनका हलफनामा और बयान, जो इस मामले में साबित हो चुके हैं, अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं करते हैं, और इस बात का कोई तर्कसंगत स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि तीन दशकों से अधिक की लंबी अवधि तक आरोपी (सज्जन कुमार) का नाम क्यों नहीं लिया गया।’’
उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ने देरी का कारण बताते हुए कहा कि कुमार सांसद और कांग्रेस पार्टी के एक प्रभावशाली व्यक्ति थे, इसलिए गवाह उनसे डरते थे, लेकिन इस कारण को पर्याप्त कारण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा, ‘‘यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि अन्य मामलों में आरोपी को गिरफ्तार किया गया था और हिरासत में रखा गया था, जिससे किसी भी प्रकार के भय को दूर किया जा सकता था।’’
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह भी विशेष रूप से अहम है कि आरोपी की गिरफ्तारी की खबर अखबारों में व्यापक रूप से प्रकाशित हुई थी। इसलिए, इस दलील का सहारा भी नहीं लिया जा सकता कि शिकायतकर्ता और अन्य पीड़ितों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि जिस व्यक्ति से वे भयभीत हैं वह अब स्वतंत्र नहीं है।’’
उन्होंने कहा कि हलफनामे या शिकायतकर्ता के बयान में आरोपी का नाम न होना अभियोजन पक्ष के गवाहों की विश्वसनीयता का आकलन करते समय एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।
न्यायाधीश ने जांच अधिकारी (आईओ) के इस स्वीकारोक्ति को भी संज्ञान में लिया कि कुमार का नाम न तो हरविंदर सिंह के हलफनामे में, न ही 1991 में दर्ज किए गए उनके बयान में, और न ही दिल्ली पुलिस के दंगा-रोधी प्रकोष्ठ द्वारा जांच की गई दो प्राथमिकी के रिकॉर्ड में उल्लिखित था।
उन्होंने रेखांकित किया कि जांच अधिकारी के अनुसार, कुमार की संलिप्तता का संकेत किसी भी गवाह द्वारा उन अभ्यावेदनों में नहीं दिया गया था, जिन्हें पहले अदालतों ने स्वीकार कर लिया था।
अदालत ने अवतार सिंह की पत्नी और सोहन सिंह की बेटी हरजीत कौर के बयानों पर भी संज्ञान लिया, जिसके अनुसार, दो नवंबर, 1984 को हुई घटना में उनके पति और पिता की हत्या तब कर दी गई, जब वे अपने भाई, शिकायतकर्ता हरविंदर सिंह के साथ जनकपुरी की ओर जा रहे थे।
इसमें कहा गया, ‘‘यह आश्चर्य की बात है कि उन्होंने 23 अप्रैल, 1992 को दर्ज कराए गए अपने बयानों, 1992 और 1993 में दर्ज किए गए अपने अन्य बयानों, साथ ही 20 अगस्त, 2016 को विशेष जांच दल (एसआईटी) के समक्ष दर्ज कराए गए अपने बयान में आरोपी का नाम क्यों नहीं लिया, खासकर तब जब वह खुद स्वीकार करती हैं कि आरोपी एक जाने-माने नेता थे और वह और उनका परिवार उस पार्टी के पारंपरिक समर्थक थे जिससे आरोपी संबंधित था।’’
न्यायाधीश ने उल्लेखित किया कि आरोपी इलाके में चर्चित चेहरा था और गवाह को उसके बारे में स्पष्ट जानकारी थी, इसके बावजूद, उन्होंने 32 वर्षों तक उसका नाम नहीं लिया।
फैसले में अदालत ने कहा कि ऐसे गवाहों द्वारा आरोपी की पहचान पर भरोसा करना ‘‘जोखिम भरा होगा और इससे अन्याय हो सकता है’’।
भाषा धीरज नरेश
नरेश


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