भोजशाला विवाद :मुस्लिम पक्ष ने कहा,‘राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज रहा है विवादित परिसर’

भोजशाला विवाद :मुस्लिम पक्ष ने कहा,‘राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज रहा है विवादित परिसर’

भोजशाला विवाद :मुस्लिम पक्ष ने कहा,‘राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज रहा है विवादित परिसर’
Modified Date: April 29, 2026 / 09:55 pm IST
Published Date: April 29, 2026 9:55 pm IST

इंदौर, 29 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद मामले की सुनवाई के दौरान बुधवार को मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि विवादित परिसर राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में ऐतिहासिक तौर पर दर्ज रहा है और उपलब्ध स्रोतों में राजा भोज द्वारा स्थापित किसी सरस्वती मंदिर का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।

भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।

खुद को सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती के वंशज और सज्जादानशीन (किसी सूफी दरगाह, खानकाह या धार्मिक स्थल का आध्यात्मिक प्रमुख, गुरु या उत्तराधिकारी) बताने वाले काजी मोइनुद्दीन की ओर से उनके वकील नूर अहमद शेख ने इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने विस्तृत दलीलें पेश कीं।

मोइनुद्दीन ने भोजशाला मामले में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ नामक संगठन और कुलदीप तिवारी व एक अन्य व्यक्ति की ओर से दायर दो जनहित याचिकाओं पर हस्तक्षेपकर्ता के रूप में सवाल उठाए हैं। इन याचिकाओं में कहा गया है कि भोजशाला दरअसल सरस्वती मंदिर है और इस परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिया जाना चाहिए।

मोइनुद्दीन के वकील शेख ने अदालत में दावा किया कि मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती की वंशावली से जुड़े उनके मुवक्किल के पुरखों के पास विवादित परिसर की सनदें (अधिकार पत्र) ऐतिहासिक तौर पर रही हैं और सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में भी यह स्थान मस्जिद के रूप में दर्ज रहा है।

उन्होंने कहा कि भोजशाला परिसर में स्थित कमाल मौला मस्जिद के प्रबंधन से जुड़े लोगों का इस स्थान पर लंबे समय से ‘सतत और शांतिपूर्ण कब्जा’ रहा है।

मुस्लिम कानूनों का हवाला देते हुए शेख ने कहा कि किसी धार्मिक संपत्ति, विशेष रूप से मस्जिद या उससे संबंधित मिल्कियत के मामले में सज्जादानशीन और मुतवल्ली (वह व्यक्ति जिसे वक्फ यानी धर्मार्थ अर्पित संपत्ति के प्रबंधन, रख-रखाव और प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपी जाती है) जैसे पदाधिकारियों तथा उनके वंशजों को न केवल हस्तक्षेप का अधिकार होता है, बल्कि उन्हें उस संपत्ति के प्रबंधन और उपयोग के अधिकार भी प्राप्त होते हैं।

मुस्लिम पक्ष के वकील ने प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1904 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून में ‘संपत्ति के प्रभारी’ की शब्दावली का प्रयोग किया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति या पक्ष लंबे समय से किसी संपत्ति के प्रभार में है, उसे उस संपत्ति के संबंध में अधिकार प्राप्त होते हैं।

सुनवाई के दौरान धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने दावा किया कि दोनों जनहित याचिकाओं में हिन्दू पक्षकारों द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष ऐतिहासिक तथ्यों के संबंध में ‘भ्रामक प्रस्तुतीकरण’ किया गया है।

उन्होंने यह दावा भी किया कि उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में धार में परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा स्थापित किसी सरस्वती मंदिर के अस्तित्व का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।

वारसी ने यह भी कहा कि एएसआई ने भोजशाला विवाद को लेकर दायर मुकदमों में समय-समय पर अपने उत्तरों में परिवर्तन करते हुए तीन अलग-अलग रुख अपनाए हैं और यह स्थिति न्यायिक परीक्षण को लेकर गंभीर सवाल उत्पन्न करती है।

उन्होंने एएसआई द्वारा भोजशाला परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया और इसकी वीडियोग्राफी के तरीके के बारे में भी आपत्तियां जताईं और अदालत से अनुरोध किया कि इन आपत्तियों का परीक्षण किया जाए।

भोजशाला मामले में सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।

उच्च न्यायालय इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।

भाषा हर्ष शोभना

शोभना


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