भोपाल। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी हैं मध्यप्रदेश की भोजपुर विधानसभा सीट की। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सटी भोजपुर विधानसभा सीट भाजपा और पटवा परिवार का अभेद किला बना हुआ है। भोजपुर सीट पर पहले पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा और फिर सुरेंद्र पटवा का कब्जा रहा है। इस इलाके से जीतकर जनप्रतिनिधि मुख्यमंत्री, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर पहुंचे लेकिन क्षेत्र में उतना विकास नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। यहां बेरोजगारी, बिजली सड़क और पानी मुख्य समस्याएं हैं। बदइंतजामी से जनता परेशान और नाराज है जिसका खामियाजा इस बार विधायक सुरेंद्र पटवा को उठाना पड़ सकता है।
नाराजगी और शिकायतें भोजपुर विधानसभा क्षेत्र के सियासतदानों के लिए खतरे की घंटी है। अगर वक्त रहते इनकी नाराजगी दूर नहीं की गई तो आने वाले विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। राजधानी भोपाल की सीमा से सटी भोजपुर विधानसभा की तासीर शहरी और ग्रामीण दोनों है। भोजपुर से लेकर मंडीदीप और बाड़ी के कुछ इलाकों में फैले इस विधानसभा क्षेत्र में मंडीदीप, औबेदुल्लालंज, गौहरगंज, सुल्तानपुर के साथ-साथ करीब 300 गांव आते है। इन इलाकों में सड़कों का बुरा हाल है। शहर में तो गाडियां जैसे-तैसे गढ्ढों भरे रास्तों से निकल जाती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में हालात और बुरी है।
भोजपुर विधानसभा क्षेत्र में केवल सड़कों का ही बुरा हाल नहीं है बल्कि किसान और ग्रामीण अब भी बिजली और पानी जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं। सरकारी अस्पताल तो है लेकिन ना तो अच्छे डॉक्टर हैं और ना इलाज के लिए मशीनें। लिहाजा मरीजों को इलाज के लिए दूसरे शहर ले जाना पड़ता है।
भोजपुर में रोजगार के अवसरों की कमी भी आने वाले चुनाव में बड़ा सियासी मुद्दा बनना तय है। औद्योगिक क्षेत्र मंडीदीप होने के बाद भी यहां स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिलता। दरअसल अधिकांश फैक्ट्रियों में यूपी और बिहार के लोगों को काम दिया जा रहा है, जिस वजह से यहां के युवा बेरोजगार घूमने को मजबूर हैं। वहीं भोजपुर में समस्याएं सुलझने के बजाए सियासत के जाल में उलझती ज्यादा नजर आती हैं। जहां कांग्रेस के नेता तमाम मुद्दों को लेकर विधायक सुरेंद्र पटवा को घेरने में जुट गई है। वहीं बीजेपी विधायक का कहना है कि विपक्ष का काम केवल आरोप लगाना है।
भोजपुर विधानसभा क्षेत्र में मुद्दों की कमी नहीं है। सियासतदान और पार्टियों भी अपनी अपनी सहूलियतों के इस हिसाब से इन मुद्दों को भुनाने की कोशिश में लग गए हैं। अब देखना है मतदाता के मन के खेत में किसका रोपा ज्यादा अच्छी से लगता है।
भोजपुर विधानसभा के सियासी इतिहास की बात की जाए तो कभी ये सीट कांग्रेस का गढ़ हुआ करता थी, लेकिन 1985 में जब सुंदरलाल पटवा यहां से पहली बार चुनाव लड़े, उसके बाद यहां कांग्रेस सिर्फ 2003 में ही चुनाव जीत पाई है। सीट पर पटवा परिवार का दबदबा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2013 में सुरेंद्र पटवा कांग्रेस के दिग्गज नेता सुरेश पचौरी को भी शिकस्त दे चुके हैं।
यह भी पढ़ें : अलवर मॉब लिंचिंग, राहुल ने कहा- ये मोदी का क्रूर ‘न्यू इंडिया,जवाब में पीयूष ने बताया नफरत का सौदागर
ये वो भव्य शिव मंदिर है जो भोजपुर विधानसभा क्षेत्र को बेहद खास बनाती है। जो भी इस मंदिर को देखने आता है। इसकी भव्यता में खो जाता है और उसके मन में यही सवाल पैदा होता है कि एक हजार साल पहले इस तरह का निर्माण कार्य कैसे किया गया होगा। कुछ इसी तरह के सवाल यहां के सियासी गलियारों में भी उठते हैं। आखिर भोजपुर विधानसभा क्षेत्र जो कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, उसे बीजेपी ने अपना मजबूत किला कैसे बना लिया और पटवा परिवार के इर्द-गिर्द क्यों घुमती है यहां की राजनीति।
वैसे भोजपुर के सियासी इतिहास इतिहास की बात की जाए तो 1967 में अस्तित्व में आई इस विधानसभा पर पहली बार हुए चुनाव में जनता ने कांग्रेस प्रत्याशी गुलाबचंद को जीत का तिलक लगाया था। गुलाबचंद यहां से लगातार दस साल क्षेत्र के विधायक रहे। लेकिन 1985 के बाद इस सीट पर पटवा परिवार का कब्जा हो गया। 1985 से 1998 तक सुंदरलाल पटवा ने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 2003 में उनके उत्तराधिकारी सुरेंद्र पटवा यहां से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े। लेकिन वो कांग्रेस प्रत्याशी राजेश पटेल से हार गए। हालांकि सुरेंद्र पटवा ने 2008 के विधानसभा चुनाव में राजेश पटेल को मात देकर पिछली हार का बदला ले लिया। 2013 में बीजेपी ने एक बार फिर सुरेंद्र पटवा को टिकट दिया जिन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता सुरेश पचौरी को शिकस्त दी। इस चुनाव में बीजेपी को जहां 80491 वोट मिले। वहीं कांग्रेस को 60342 वोट ले सकी। इस प्रकार जीत का अंतर 20149 वोटों का रहा।
भोजपुर में जाति समीकरण की बात की जाए तो आदिवासी औऱ मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। हालांकि सवा दो लाख मतदाता वाली इस सीट चुनाव नतीजों को देखकर तो यही लगता है कि भोजपुर विधानसभा में कास्ट फैक्टर ज्यादा असर नहीं डालती। सुरेंद्र पटवा ने अपने चाचा सुंदर लाल पटवा की विरासत संभाली और दो बार से वो लगातार विधायक भी चुन कर आए। सुरेंद्र पटवा वर्तमान में संस्कृति और पर्यटन मंत्री भी हैं लेकिन सुरेंद्र पटवा वो जादू नहीं चला पाए जो उनके चाचा ने क्षेत्र में किया था। हालांकि भोजपुर में बीजेपी से सुरेंद्र पटवा टिकट के स्वाभाविक दावेदार हैं, लेकिन सियासी गलियारों में ये भी चर्चा है कि पार्टी उनको कहीं और से चुनाव लड़ा सकती है। वहीं कांग्रेस से कई नेता टिकट के लिए ताल ठोंक रहे हैं।
भोजपुर विधानसभा क्षेत्र का नाम आते ही सबसे पहले जेहन में जो आता हैं। उसमें पहला है भोजपुर का भव्य शिव मंदिर और दूसरे हैं मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा। सियासत की तो बात करें तो भोजपुर में पटवा परिवार का सियासी दबदबा रहा है। सुंदरलाल पटवा के बाद यहां उनके भतीजे सुरेंद्र पटवा परिवार की सियासी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। 2003 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ने वाले सुरेंद्र पटवा शिवराज सरकार में संस्कृति और पर्यटन मंत्री भी हैं और अगर कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तो आगामी विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी की तरफ से टिकट के स्वाभाविक दावेदार हैं। पटवा के मुताबिक भोजपुर के लिए वो नेता नहीं बल्कि बेटा बनकर काम करते हैं और आगे भी करते रहेंगें।
यह भी पढ़ें : उद्धव ने कहा- मोदी के नहीं, आम जनता के सपनों के लिए लड़ रहा हूं
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों की बात करें तो कई नेता विधायक का टिकट पाना चाहते हैं। हालांकि कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी इस लिस्ट में सबसे मजबूत दावेदार हैं। पचौरी के मुताबिक भोजपुर में उतना विकास नहीं हुआ है, जितना होना चाहिए था।
भोजपुर में अगर कांग्रेस किसी युवा प्रत्याशी को मौका देती है तो सुरेश पचौरी के भतीजे गौरव पचौरी भी प्रबल दावेदार हैं। इसके अलावा राजेश पटेल और राजकुमार पटेल भी इस क्षेत्र से कांग्रेस का चेहरा हो सकते हैं। वहीं मंडीदीप नगर पालिका के अध्यक्ष बद्री सिंह चौहान भी चुनावी मैदान में उतरने का मन बना चुके हैं। हालांकि ये भी कहना है कि उनके नेता सुरेश पचौरी हैं और वो जो फैसला लेंगे उसी हिसाब से आगे की रणनीति बनेगी।
कुल मिलाकर भोजपुर में सियासी जंग आसान रहे वाली नहीं है। बीजेपी में जहां मौजूदा विधायक को एक बार फिर टिकट मिलना तय नजर आ रहा है। वहीं कांग्रेस के सामने पहली चुनौती तो सही उम्मीदवार चुनने की ही है।
वेब डेस्क, IBC24