मप्र: बच्ची को पिता के पास कनाडा भेजने से अदालत का इनकार, मां को बताया पहली शरणस्थली
मप्र: बच्ची को पिता के पास कनाडा भेजने से अदालत का इनकार, मां को बताया पहली शरणस्थली
इंदौर, एक मई (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने 10 वर्षीय लड़की को उसके पिता के पास कनाडा भेजने से यह कहते हुए इनकार कर दिया है कि ‘मां बच्चे की पहली शरणस्थली है।’
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की पीठ ने लड़की के कनाडा में रहने वाले पिता की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
याचिका में कनाडा के ओंटारियो के ‘सुपीरियर कोर्ट ऑफ जस्टिस’ के परिवार न्यायालय के पारित आदेश के मुताबिक नाबालिग लड़की को कनाडा भेजने और उसकी अभिरक्षा पिता को सौंपने की गुहार की गई थी।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों और मामले के तथ्यों पर गौर के बाद कहा कि किसी बच्चे की अभिरक्षा से जुड़े मामलों में उसका ‘कल्याण’ और ‘सर्वोत्तम हित’ सबसे ऊपर होते हैं और विदेशी अदालत का आदेश केवल एक प्रासंगिक कारक हो सकता है, निर्णायक नहीं।
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘अदालतों के पारस्परिक सम्मान का सिद्धांत बच्चे के कल्याण की सर्वोपरि आवश्यकता को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।”
खंडपीठ ने कहा कि भारतीय न्यायालय किसी विदेशी अदालत के अभिरक्षा आदेश को ‘यांत्रिक रूप से लागू करने के लिए’ बाध्य नहीं है, यदि उसका अनुपालन बच्चे के कल्याण के प्रतिकूल हो।
उच्च न्यायालय ने महर्षि वाल्मीकि रामायण में लव-कुश से जुड़े एक प्रसंग का हवाला देते हुए कहा,“श्रीराम से वियोग होने के बाद माता सीता ने ही महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश का पालन-पोषण किया था। बच्चों के पिता अयोध्या के राजा श्रीराम थे, लेकिन फिर भी वे माता सीता के साथ ही रहते थे।’’
अदालत ने कहा कि इस प्रसंग में बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक पालन-पोषण और मातृ संरक्षण के पहलुओं पर जोर दिया गया है।
खंडपीठ ने अपने आदेश में संस्कृत के प्रसिद्ध श्लोक “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” (मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं) का भी उल्लेख किया।
लड़की के माता-पिता का विवाह महाराष्ट्र में 18 जनवरी 2014 को हुआ था। विवाह के बाद दोनों अमेरिका और बाद में कनाडा में रहने लगे। उनकी पुत्री का जन्म 29 अगस्त 2016 को शिकागो में हुआ और उसे जन्म से अमेरिकी नागरिकता प्राप्त हुई। बाद में परिवार कनाडा में स्थायी निवासी के रूप से बस गया तथा बच्ची टोरंटो के एक विद्यालय में पढ़ने लगी।
जनवरी 2022 में महिला अपनी बच्ची को लेकर भारत आई थी और उसका अप्रैल 2022 में कनाडा लौटने का कार्यक्रम था, लेकिन बाद में उसने वापस नहीं जाने का निर्णय लिया तथा बच्ची का दाखिला इंदौर के एक विद्यालय में करा दिया। इसके बाद दम्पति के बीच वैवाहिक विवाद शुरू हुआ।
उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के अलग-अलग फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी अदालत के आदेश का सम्मान महत्वपूर्ण है, लेकिन बच्चे का कल्याण सर्वोच्च मानदंड है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि नाबालिग लड़की को उसके समक्ष पेश किया गया था और न्यायाधीशों ने उससे अपने कक्ष में बातचीत की।
अदालत ने कहा,‘‘बच्ची हालांकि कम उम्र की है, लेकिन उसने मां के प्रति भावनात्मक लगाव व्यक्त किया है।’
उच्च न्यायालय ने कहा कि केवल विदेशी अदालत के आदेश के आधार पर बच्ची की अभिरक्षा पिता को नहीं सौंपी जा सकती क्योंकि उसे विदेश भेजना उसके हित में नहीं है।
खंडपीठ ने लड़की के पिता की याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसने यह फैसला करते वक्त बच्ची की बढ़ती उम्र में मां की देखभाल की जरूरत, उसकी भावनात्मक व शैक्षिक स्थिरता और समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखा है।
भाषा हर्ष जोहेब
जोहेब

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