महाराष्ट्र सरकार 42,242 हेक्टेयर भूमि को ‘वन’ का दर्जा देने के मामले में शीर्ष अदालत का रुख करेगी
महाराष्ट्र सरकार 42,242 हेक्टेयर भूमि को ‘वन’ का दर्जा देने के मामले में शीर्ष अदालत का रुख करेगी
मुंबई, चार मार्च (भाषा) महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने बुधवार को विधानसभा में बताया कि सरकार सिंधुदुर्ग जिले की 42,242 हेक्टेयर भूमि को दिये गये ‘वन’ के दर्जे के खिलाफ राहत पाने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख करेगी।
उन्होंने नीलेश राणे (शिवसेना के विधायक) द्वारा पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि वन वर्गीकरण के कारण तटीय जिले में विकास कार्य ठप हो गए हैं और जिन किसानों की जमीनें इस वर्गीकरण से प्रभावित हुई हैं, उनके लिए गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं।
बावनकुले ने सदन को बताया कि राज्य सरकार वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की सहायता लेगी और भूमि के वन वर्गीकरण पर राहत पाने के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करेगी।
उन्होंने कहा कि इस मामले से संबंधित 1997 और 2008 में दायर हलफनामों में आवश्यक सुधार किए जाएंगे।
मंत्री ने बताया कि संशोधित सर्वेक्षण के अनुसार, सरकार 9,173 हेक्टेयर भूमि को वर्गीकरण से बाहर करने को लेकर सकारात्मक है और केवल 1,875 हेक्टेयर भूमि ही वन के रूप में वर्गीकृत रहने की संभावना है।
राणे ने आरोप लगाया था कि न्यायालय के समक्ष पहले प्रस्तुत किए गए 42,242 हेक्टेयर के आंकड़े का जिला प्रशासन या तहसीलदारों के पास कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है और उन्होंने समयबद्ध पुन: सर्वेक्षण की मांग की।
सिंधुदुर्ग जिले के कुदल से सत्तारूढ़ गठबंधन के विधायक ने दावा किया था कि उपग्रह सर्वेक्षणों में गांवों, मंदिरों और कृषि भूमि को वन के रूप में दिखाया गया है, जिससे निवासियों और किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
विधायक ने कहा कि कुदल तालुका के पुलास जैसे गांवों में प्रधानमंत्री आवास योजना के पात्र लाभार्थियों को वन क्षेत्र घोषित होने के कारण डेढ़ साल से अधिक समय से गृह निर्माण की अनुमति नहीं मिली है।
उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 98 प्रतिशत भूमि को निजी वन के रूप में दर्शाया गया है, जिससे किसानों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
बावनकुले ने जवाब देते हुए कहा कि 1996 के गोदावर्मन मामले में न्यायालय के वन संरक्षण संबंधी फैसले के बाद किए गए सर्वेक्षणों में त्रुटियां थीं।
मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यालयों, मंदिरों और अस्पतालों जैसी संस्थाओं को वन के रूप में चिह्नित करना गलत था।
मंत्री ने कहा कि इस मुद्दे को जल्द से जल्द हल करने के लिए वन विभाग के साथ बैठक की जाएगी।
भाषा जितेंद्र संतोष
संतोष

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