अपने बढ़ते कामों के बीच विकेंद्रीकरण पर जोर दे रहा संघ: भागवत
अपने बढ़ते कामों के बीच विकेंद्रीकरण पर जोर दे रहा संघ: भागवत
नागपुर, 19 मार्च (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि संगठन ने अपने बढ़ते काम और लोगों की बढ़ती उम्मीदों के बीच अपने स्वयंसेवकों को सशक्त बनाने के लिए विकेंद्रीकरण की शुरुआत की है।
नागपुर में मराठी अखबार ‘तरुण भारत’ के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘जेन जेड’ (युवा पीढ़ी) उन विचारधाराओं की ओर आकर्षित होती है, जिनमें ईमानदारी और राष्ट्र सेवा की भावना हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरएसएस को अच्छे कामों के लिए सोशल मीडिया पर अपनी ‘सक्रियता’ बढ़ाने की ज़रूरत है।
जब उनसे पूछा गया कि आरएसएस ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे होने के मौके पर हाल ही में संगठन में क्या बड़े बदलाव किए हैं, तो भागवत ने कहा कि संघ का काम बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ा है, और इसलिए अब विकेंद्रीकरण की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी इकाइयां जरूरी कामों को ज़्यादा कुशलता से संभालेंगी, जबकि मित्रता रखने और खुद मिसाल बनकर नेतृत्व करने का मूल तरीका पहले जैसा ही रहेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘चूंकि आरएसएस से लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं, इसलिए स्वयंसेवकों को भी अब ज्यादा मेहनत करनी होगी। इसलिए, अब और भी छोटी-छोटी इकाइयां बनाई जाएंगी, और जो काम पहले ऊपरी स्तर से होता था, वह अब ये छोटी इकाइयां करेंगी। जब कोई संगठन बड़ा होता है, तो यह एक स्वाभाविक बदलाव है।’’
भागवत ने बताया कि अब आरएसएस में 46 प्रांतों (प्रशासनिक इकाइयों) के बजाय 86 संभाग होंगे।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस के काम करने का तरीका नहीं बदलेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘यह पहले जैसा ही रहेगा। काम करने का वह तरीका है मित्रता करना और खुद मिसाल बनकर बदलाव लाना, जो संघ का मूल सिद्धांत है।’’
जब भागवत से पूछा गया कि विपरीत परिस्थितियों में भी संघ का विस्तार कैसे हुआ, तो उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन के विस्तार में प्रचार-प्रसार से मदद मिल सकती है, लेकिन आरएसएस की असली ताकत कुछ और ही है। उन्होंने कहा, ‘‘संघ का विस्तार ऐसे माध्यमों से नहीं होता। इसका विस्तार इसके काम और इसके कार्यकर्ताओं के बीच आपसी स्नेह से होता है।’’
भागवत ने युवा पीढ़ी के बारे में बात करते हुए कहा कि ‘जेन जेड’ ईमानदारी और राष्ट्र सेवा की ओर आकर्षित होती है और संघ की विचारधारा इन्हीं मूल्यों पर आधारित है।
‘जेन जेड’ में 14 वर्ष के किशोर से लेकर 29 वर्ष के युवा होते हैं।
जब संघ प्रमुख से पूछा गया कि क्या ‘जेन जेड’ के युवा आरएसएस की शाखाओं में शामिल होने के इच्छुक हैं और क्या संगठन उन्हें आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है, तो भागवत ने कहा, ‘‘वे शाखाओं में आते हैं। जहां ऐसा संभव नहीं होता या जहां शाखाएं नहीं लगतीं, वहां हमारे स्वयंसेवक ऊंची-ऊंची इमारतों और ‘गेटेड सोसाइटियों’ में रहने वाले लोगों तक पहुंच बनाते हैं।’’
उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय बैठकों में इस बात पर भी चर्चा होगी कि जेन-जेड को शाखाओं से कैसे जोड़ा जाए।
सोशल मीडिया के बारे में भागवत ने कहा कि लोग इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं, और संघ को अच्छे कामों के लिए ऐसे मंचों पर अपनी ‘सक्रियता’ बढ़ाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, ‘‘मीम और रील पहले से ही चलन में हैं। कुछ सामग्री आरएसएस के संचार विभाग के जरिये फैलाई जा रही है, और हमारे स्वयंसेवक भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे स्वीकार्यता मिलेगी। मैं इसे कोई उम्मीद तो नहीं कहूंगा, लेकिन हमें वहां अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी।’’
उन्होंने कहा कि आरएसएस का प्रचार विभाग मीडिया ‘इन्फ्लुएंसर्स’ और ‘यूट्यूबर्स’ के साथ भी बैठकें करता है।
जब उनसे पूछा गया कि कभी-कभी जब उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है, तो उन्हें कैसा महसूस होता है, तो भागवत ने कहा कि उन्हें हंसी आती है, और उन्हें ऐसा करने वालों पर दया भी आती है।
उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अब लोगों के पास आरएसएस के खिलाफ कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचा है। इसलिए, वे ऐसे कृत्य करते हैं और बातों का गलत मतलब निकालते हैं।’’
भागवत ने कहा कि जो लोग साम्यवाद और अन्य विचारधाराओं में विश्वास रखते हैं, वे भी यह स्वीकार करते हैं कि भले ही वे आरएसएस के विरोधी हों, लेकिन वे मानते हैं कि यह एक अच्छा संगठन है। उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे लोगों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है।’’
भाषा वैभव सुरेश
सुरेश

Facebook


