#ATAL_RAAG_कहीं ट्रैप में तो नहीं फंस रहे…यूजीसी की नई गाइडलाइन और सामाजिक चिंताएं

#ATAL_RAAG_कहीं ट्रैप में तो नहीं फंस रहे…यूजीसी की नई गाइडलाइन और सामाजिक चिंताएं
Modified Date: January 28, 2026 / 04:26 pm IST
Published Date: January 28, 2026 4:26 pm IST

कहीं ट्रैप में तो नहीं फंस रहे..यूजीसी की नई गाइडलाइन और सामाजिक चिंताएं

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

यूजीसी की नई गाइडलाइन ने पूरे समाज को उद्वेलित कर रखा है। अपने आसपास मैं जहां भी देखता हूं। हर जगह दूसरे मुद्दे गौण हो चुके हैं। केवल UGC की विभाजनकारी नई गाइडलाइन की चर्चा हो रही है। चूंकि भारत का मानस राजनीति की भाषा समझता है। उसे सबसे ज़्यादा राजनीति में ही दिलचस्पी होती है। राजनीति का अपना नफा-नुकसान वाला गुणा-गणित होता है। अपने समीकरण होते हैं जिस आधार पर सभी दल और नेता अपनी बिसात बिछाते रहते हैं। उनकी सत्ता की अपनी मजबूरियां होंगी। ठीक ऐसे ही यूजीसी की नई गाइडलाइन पर चर्चा हो रही है। अलग-अलग तरह के राजनीतिक विश्लेषण हो रहे हैं।

मोटा-मोटी मैं कुछ समझ पाया हूँ तो ये कि— इस नई गाइडलाइन में जितने भी आरक्षित वर्ग हैं। उन्हें छोड़कर सामान्य वर्ग में आने वाले स्टूडेंट्स को घोषित तौर पर विलेन बना दिया गया है। अपराधी होने का लेबल चस्पा कर दिया गया है। झूठे आरोपों के बावजूद भी सामान्य वर्ग में आने वाले ‘विद्यार्थियों’ की अपील-दलील के लिए कोई जगह होगी। कोई सुनवाई नहीं होगी‌‌। झूठे आरोपों की प्रताड़ना और मानसिक दबाव झेलने के लिए उनका विद्यार्थी जीवन अभिशप्त होगा।

इसके चलते कुछ विशेष समुदायों और वर्गों को मज़ा भी आ रहा होगा कि — क्या अद्भुत दृश्य बना है। देश में हिन्दू होने की जो बड़ी पहचान समाज उभरी थी। अब उस पर डेंट लगेगा। उनकी नई सियासी पटकथाएं लिखी जाएंगी। नए समीकरण तलाशे जाएंगे। कुछ तो अभी से ही खाद-पानी लेकर बैठ गए होंगे।‌ अहा! अब हिंदू समाज को टूटते हुए देखेंगे।‌ हिंदू समाज के वर्गों को आपस में लड़ाएंगे। एक-दूसरे का शत्रु घोषित करेंगे।…वो अपने अभियान में जुट गए हैं और इसे अवसर दिया है यूजीसी की नई गाइडलाइन ने।

ये नई गाइडलाइंस भले ही सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के बाद आई हो। कोई भले ये कुतर्क दे कि— अजी उस समिति के चेयरमैन तो दिग्विजय सिंह थे। धोखे में रखकर ये नई गाइडलाइन लागू कर दी गई। सिस्टम ने खेला कर दिया। तो साहेब आपके सांसद उस समिति में घास छीलने के लिए बैठे थे? अगर सिस्टम और यूजीसी जैसी नियामक संस्थाओं पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है। फिर नियंत्रण किस चीज़ में है? समिति में शामिल सांसद- मीटिंग के नाम पर केवल चाय-नाश्ता पार्टियां ही करते हैं कुछ पढ़ते नहीं हैं क्या? अधिकारियों के ड्राफ्ट पर अगर सिग्नेचर ही करते हैं तो इन्हें सांसद रहने का अधिकार है क्या? वहीं जब हर सकारात्मक परिवर्तन का क्रेडिट आप लेते हैं तो ऐसे में ग़लत चीज़ों को स्वीकार भी करने का साहस होना चाहिए।

ख़ैर मुझे ये भी लगता है कि— देर सबेर ये गाइडलाइन बदलेगी। लेकिन यूजीसी की ये गाइडलाइन अंग्रेजों के ‘रॉलेट एक्ट’ और Criminal Tribes Act, 1871 जैसी है। जो भारत की आत्मा पर प्रहार कर रही है। संविधान निर्माताओं की भावना पर कुठाराघात कर रही है। मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद -14 , 15 , 16 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की भारतीय दृष्टि को नष्ट करती है। भेदभाव से मुक्ति के स्थान पर शिक्षा के संस्थानों में ही— भय, दबाव, मानसिक यन्त्रणा और वर्ग के आधार पर भेदभाव निर्मित करेगी। जो हमारे संविधान की मूल भावना के पूरी तरह से विरोध में है। विद्यार्थी जीवन को जंजीरों की जकड़न वाला बना देगी। ये गाइडलाइन
सरकारी संस्थानों में अनुदान को समाप्त करते हुए — निजीकरण को बढ़ावा देगी।‌

इस नई गाइडलाइन का ये एक पक्ष है। लेकिन दूसरी ओर मेरी चिंताएं व्यापक सामाजिक पहलुओं को लेकर बहुत ज़्यादा हैं। हम जिस पूरे समाज को अपना समाज मानते हैं। अपने बंधु-बांधव मानकर दैनंदिन जीवन में रहते हैं। एक-दूसरे के सुख-दु:ख के साथी बनते हैं। हर तरह के भेदभाव को दूर करते हुए सामाजिक समरसता, सद्भाव के साथ आगे बढ़ते हैं। जहां भी भेदभाव हैं। उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं। कांधे से कांधा मिलाकर अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं के आदर्शों का पालन करते हुए — देश और समाज की तरक्की के लिए काम करते हैं। यूजीसी की ये विभाजनकारी नई गाइडलाइन—हमारे उसी सामाजिक जीवन में दरारें डालने का काम करने वाली है। ये ठीक वैसे ही है जैसे भाई को भाई से लड़ा दिया जाए। इसके चलते पूरा समाज आज एक अलग तरह के मनोवैज्ञानिक दबाव और वैचारिक संघर्ष में फंसा हुआ दिख रहा है । क्रिया और प्रतिक्रिया के भिन्न-भिन्न अनुभव और पीड़ादायक-कटु अनुभव देखने को मिल रहे हैं। जो हमारे स्वस्थ समाज में विचलन पैदा कर रहे हैं। कुछ लोग तो आग में घी डालने के लिए बैठे ही हुए हैं कि—कहीं कोई असावधानी का अप्रिय प्रसंग आए। फिर वो भावनाओं को टूल बनाकर हर ओर अशांति का वातावरण निर्मित कर दें।

लेकिन किसी भी चीज़ को समझने के लिए हमें अपने संविधान निर्माताओं की दृष्टि की कसौटी पर परखना होगा। यहीं से हमें उज्ज्वल वर्तमान और भविष्य की राह दिखेगी। हमारे संविधान निर्माताओं ने जब आरक्षण का प्रावधान किया था तो मूल संविधान में (1950) में केवल ST और SC— यानी हिंदू समाज की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए ही आरक्षण था। आगे मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई‌ । ओबीसी वर्ग ( अन्य पिछड़ा वर्ग ) में कई जातियों को जोड़ा गया। 1991 से ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान हुआ। इसी तरह से दिव्यांगों, महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। ऐसे ही 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को भी आरक्षण दिया गया। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि — संविधान में धार्मिक आधार पर कहीं भी आरक्षण का प्रावधान नहीं है। लेकिन धार्मिक आधार पर तुष्टिकरण जारी है। मुस्लिम समुदाय — ‘अल्पसंख्यक और ओबीसी’ के दोनों आरक्षण का लाभ उठाता आ रहा है। इसी तरह ईसाई मिशनरियां भी कन्वर्जन कराने के बाद कन्वर्टेड लोगों के ज़रिए दो तरह के आरक्षण लेती हैं। पहला अल्पसंख्यक का आरक्षण और दूसरा ST/SC—OBC वर्ग का आरक्षण।

वस्तुत: हमारे संविधान निर्माताओं ने आरक्षण के जो प्रावधान किए। अस्पृश्यता के अंत के लिए कानूनी प्रबंध किए । सभी वर्गों के उत्थान और कल्याण के लिए नियम और कानून बनाए।
समय-समय पर संसद ने आरक्षण को लेकर संसोधन किए। नए कानून बनाए। अपराधियों को दंडित करने के लिए कठोर कानून बनाए। ताकि समाज के जो वर्ग पीछे रह गए हैं उनके समुचित विकास के लिए विशेष व्यवस्था की जाए। इससे उनकी प्रगति के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन इसमें दृष्टि भेदभाव की नहीं है बल्कि जो हमारे बंधु बांधव किसी कारणवश पीछे रह गए उनके उत्थान और कल्याण का संकल्प था। किन्तु वोट-बैंक की राजनीति ने इन सब बातों को अपने राजनीतिक हथियारों में बदल दिया।

सका दुष्परिणाम ये हुआ कि कुछ राजनीतिक दलों, नेताओं ने — हिन्दू समाज को आरक्षित वर्ग और अनारक्षित वर्ग की नई जातियों में बदल कर; अपनी-अपनी सियासी रोटियां सेंकने लगे। कभी आरक्षण खत्म करने का भय दिखाया जाने लगा। शोषक और शोषित की कहानियों के ज़रिए हिन्दू एकता को तोड़ने की कसमें खा ली गईं। जातीय आधार पर उभरे नेताओं और उनके दलों ने जाति की राजनीति की। अपने घर-परिवार को समृद्ध किया। पूरे कुनबे को राजनीतिक खानदान में बदल दिया लेकिन वो जिस ‘जातिवाद’ के नाम पर राजनीति में आए। उस ‘जाति’ के हालात नहीं बदले। क्योंकि उनकी मंशा में ‘जाति’ — वोटबैंक है। जाति के नाम पर नेता बने लोगों ने अपने बेटे और बेटियों के विवाह भी— अपनी जाति में नहीं किए। जबकि उनकी जाति के लोग उन्हें अपनी जाति का रहनुमा मानते रहे।

हिन्दू एकता को तोड़ने के लिए, सामाजिक समरसता को तोड़ने के लिए नए-नए समीकरण समय-समय पर देखने को मिले। कभी ‘भूरा बाल’ साफ करो, कभी MY— मुस्लिम-यादव गठजोड़, कभी तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार, कभी आदिवासी हिंदू नहीं है। कभी ‘भीम-मीम’ के फ़र्ज़ी नारे गढ़े गए।कभी मनुवाद-ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ संगठित फतवागीरी, अगड़ा बनाम पिछड़ा, कभी हिन्दी बनाम- तमिल-तेलुगु, कभी उत्तर बनाम दक्षिण, ये जाति बनाम-दूसरी जाति। यानी वो तमाम हथकंडे वर्षों से अपनाए जाते रहे।अब भी अपनाए जा रहे हैं। जो हिन्दू होने की पहचान को तोड़ दे। एकता और समरसता को तोड़ दे। आज ये दृश्य आम होते दिखाई दे रहे हैं।

भारत के उत्तरदायी हिन्दू समाज के हर जाति,वर्ग को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की साज़िशें हो रही हैं। सभी की जातीय आइडेंटिटी को बड़ा बनाने और ‘हिन्दू’ पहचान को कम करने के लिए उकसाया जा रहा है।‌ ये सब इसीलिए हो रहा क्योंकि विभाजनकारी— जातीय पहचान के आधार पर उन्मादित समाज को आसानी से नष्ट किया जा सकता। लेकिन जब बात ‘हिन्दू’ होने की आती है तो विभाजनकारी शक्तियां कांप जाती हैं। क्योंकि हिन्दू समाज ने अपनी एकता की शक्ति के ज़रिए ये बता दिया है कि— जब समाज संगठित होता है तो उसे कोई नहीं हरा सकता है। आप मानें या न मानें लेकिन 2014 में नरेन्द्र मोदी सरकार का केन्द्र में आना। ये क्रम निरंतर बने रहना। देश के अधिकांशतः राज्यों में हिन्दू एकता के चलते राष्ट्रीय विचारों की सरकारों का बनना। संगठित शक्ति का ही कारण है। वर्तमान में ये संगठित हिन्दू शक्ति केवल राजनीतिक क्षेत्र ही नहीं बल्कि समाज जीवन के हर क्षेत्र में पुनश्च मजबूत हुई है। अब हिन्दू और हिन्दुत्व की चर्चा करने में लज्जा, संकोच नहीं बल्कि गर्व का भाव आता है। ये इसलिए क्योंकि ये ‘राष्ट्रभाव’ है। भारत का आत्मस्वर है। यही बात भारत विरोधी-हिन्दू विरोधी शक्तियों को कांटे की तरह चुभ रहा है।

अब आप देखिए कि यूजीसी की नई गाइडलाइन के विरोध के बीच में लोग ये क्या कह रहे हैं कि —

“क्या करूंगा ऐसे हिन्दुत्व का जो मेरे बच्चों का भविष्य ही सुरक्षित न रखे। अगर अब नहीं जागे तो फिर कुछ नहीं बचेगा” … फिर गाहे-बगाहे, जाने-अनजाने में लोग कह रहे हैं कि —“हमारी भूल-कमल का फूल, बीजेपी, मोदी -योगी को अबकी बार सबक सिखाएंगे”। साथ ही सवर्ण एकता के ख़ूब नारे बुलंद किए जा रहे हैं।

चूंकि नियामक तो सत्ता ही है । नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। बीजेपी की सरकार है। ऐसे में आक्रोश उचित है। सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाने वाली हर चीज़ का विरोध होना ही चाहिए। यूजीसी की नई‌ विभाजनकारी गाइडलाइन को वापस लेने, संशोधित करने की शक्ति भी मोदी सरकार के पास ही है। ऐसे में सरकार से अपनी मांगे रखना। आक्रोश जताना, सबकुछ सही है।

लेकिन इस बीच ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ के ख़िलाफ़ शब्दावलियां, सबक सिखाने जैसी भाषा। प्रतिकार के लिए सवर्ण एकता का दंभ, जातीय विश्लेषण करना। क्या यहां हमें ठिठक कर सोचना नहीं चाहिए? हमें ये नहीं देखना चाहिए कि जिस अन्याय के खिलाफ हम आवाज़ उठा रहे हैं। क्या उस ‘आवाज़’ की पहचान ‘जातीय आइडेंटिटी’ है? याकि सामाजिक सद्भाव और समान अवसर की मांग? अगर इसके पीछे की आवाज़ ‘जातीय आइडेंटिटी’ है तो ये नई गाइडलाइन भी तो वही कर रही है न? जातीय आधार पर, वर्ग के आधार पर — विभाजन। ऐसे में तो ये ठीक नहीं है न?

महत्वपूर्ण बात ये भी कि — हम जिस हिन्दू और हिन्दुत्व की बात करते हैं। क्या वो इतना कमज़ोर है जिसे हम एक विचलन सी बात के लिए छोड़ने की वकालत करने लगे? चाहे ये जाने में हो, अनजाने में हो। गुस्से में हो। वास्तव में ये एक सुनियोजित ट्रैप का शिकार होना है। आप अनीति का विरोध करते हुए जब ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ के व्रत से डिगने की बातें कहते और लिखते हैं। आप जब ‘मोदी और योगी’ को सबक सिखाने की बात कहते हैं।वास्तव में ये आप नहीं कह रहे होते हैं। बल्कि ये वो कंटेंट है जो आपकी दु:खती नब्ज के लिए जनरेट किया जाता है। ये कुछ ‘शब्द और वाक्य’ जो आपको अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति और ताकत लगते हैं। वास्तव में ये— हर उस प्रसंग, घटना में आते हैं जहां से ‘हिन्दू-हिन्दुत्व’ की बड़ी आइडेंटिटी को चोट पहुंचाया जा सके। ठीक ऐसा अभी हो रहा है। इसके पीछे हिन्दू एकता को तोड़ने वाली बड़ी ताक़त है। जो नैरेटिव की जंग में सालों से जुटी हुई है।

विभाजनकारी शक्तियां UGC की नई गाइडलाइन को उसी मौके के तौर पर देख रही हैं कि — कैसे भी हिन्दू समाज को एक-दूसरे से लड़ा दिया जाए। वो ऐसी कोशिशों में जुटी हुई भी हैं कि — ये बताया जाए कि देखो कैसे सामान्य वर्ग (सवर्ण) — आपके ख़िलाफ़ उतर आया है। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। स्वप्न में भी ऐसा नहीं होने दिया जा सकता है। यूजीसी की नई गाइडलाइन में जिन आरक्षित वर्गों के संरक्षण के नाम पर — नई गाइडलाइन आई है। वो हमारे विराट हिन्दू समाज का ही अंग हैं। हमारे अपने हैं। हम सब एक हैं। हममें कोई भेद नहीं है। यूजीसी की नई गाइडलाइन का विरोध केवल इसलिए किया जा रहा है । क्योंकि ये स्टूडेंट्स में भेदभाव करती है। हमारी सामाजिक समरसता को नष्ट करती है। नागरिक के सांविधानिक अधिकारों को छीनती है। ये नई गाइडलाइन समाज में नए तरह का वर्ग के आधार पर विभाजन पैदा करती है।जोकि अस्वीकार्य है। शिक्षा के समान अवसर और भयमुक्त शिक्षा राष्ट्र की आवश्यकता है। क्योंकि देश का भविष्य युवाओं और शिक्षा पर ही टिका है। ऐसे में अगर कहीं विभाजन के बीज बोए जाएंगे। सामाजिक एकता को चोट पहुंचेगी तो उसका विरोध होना ही चाहिए।

सरकार— यूजीसी की विभाजनकारी नई गाइडलाइन वापस ले। सभी वर्गों के उत्थान, कल्याण और उनकी सुरक्षा, भेदभाव से मुक्ति पर आधारित —संशोधित गाइडलाइन जारी करे। पूरी व्यवस्था की शल्यक्रिया भी करे। क्योंकि लंबे समय तक सत्ता के बीच — दीमक भी लग जाती है। परिस्थितिबोध के चलते अवसरवादियों और लाभार्थियों की जो नई भर्तियां होती हैं।वो अंदर ही अंदर खोखला कर देती हैं। हम सब इस बात को गंभीरता से समझें कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्यों और संक्रामक हालातों के बीच सावधानी अति आवश्यक है। भूलवश ऐसा न होकि हम अपनी क्षणिक उत्तेजना में— कहीं कोई बड़ी भूल न कर बैठें। जो एक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के नाते हमारे लिए हानिकारक सिद्ध हो। ये समूचा समाज-हमारा अपना है। राष्ट्र का भविष्य हम सब पर ही टिका है। हम जैसा वातावरण निर्मित करेंगे। उसके परिणाम भी हमें ही झेलने पड़ेंगे। समाज के बीच जो चुनौतियां आएंगी। हम सब मिलकर उन पर चर्चा करके। समाधान निकालेंगे। लेकिन अपनी एकता को खंडित नहीं होने देंगे। अपने हर एक क़दम में बस इस भाव को जिएं कि —

“संस्कृति सबकी एक चिरंतन, खून रगों में हिंदू है।
विराट सागर समाज अपना, हम सब इसके बिंदु है।”

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
( साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)

Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।


लेखक के बारे में