#ATAL_RAAG_पश्चिम बंगाल ‘शपथ ग्रहण’ में प्रतीकों के ज़रिए वैचारिक संदेश

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HIGHLIGHTS
  • भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतीकों के माध्यम से कई संदेश दिए। अक्सर हम राजनीति की चर्चा करते हुए केवल गणितीय रूप में घटनाक्रमों, परिणामों का मूल्यांकन करते हैं। लेकिन प्रतीकों के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ कहा जाता है। जो कई बार शब्दों में प्रकट नहीं हो पाता है। पश्चिम बंगाल के पूरे चुनावी प्रचार अभियान से लेकर शपथ ग्रहण समारोह तक 'प्रतीकों' ने बहुत कुछ सुस्पष्ट किया है।
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शपथ ग्रहण के मंच पर माखनलाल सरकार के पांव छूकर उनका सम्मान किया। आत्मीयता और श्रद्धा के साथ उनसे गले मिले। माखनलाल जैसे तपस्वी साधकों का सम्मान अपने विचार के प्रति समर्पण और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है।
  • श्चिम बंगाल में बीजेपी ने शपथग्रहण के साथ ही ये बता दिया कि- यहां के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य और संगठित हिन्दू शक्ति के साथ ही आगे कार्य होंगे।इसी से दशा और दिशा निर्धारित होगी।

पश्चिम बंगाल ‘शपथ ग्रहण’ में प्रतीकों के ज़रिए वैचारिक संदेश

— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

चाहे समाजनीति हो-राजनीति हो, याकि विचार-विमर्श हो। सबमें संकेतों और प्रतीकों के गहरे अर्थ होते हैं। प्रतीक भी अपने आप में दिशाबोध उद्घाटित करते हैं। कुछ ऐसा ही दृश्य पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के 9 मई 2026 को शपथग्रहण समारोह में देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतीकों के माध्यम से कई संदेश दिए। अक्सर हम राजनीति की चर्चा करते हुए केवल गणितीय रूप में घटनाक्रमों, परिणामों का मूल्यांकन करते हैं। लेकिन प्रतीकों के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ कहा जाता है। जो कई बार शब्दों में प्रकट नहीं हो पाता है। पश्चिम बंगाल के पूरे चुनावी प्रचार अभियान से लेकर शपथ ग्रहण समारोह तक ‘प्रतीकों’ ने बहुत कुछ सुस्पष्ट किया है। शपथ ग्रहण के दौरान कई ऐसे प्रतीक दिखे जो बहुत कुछ कह रहे हैं। पहला प्रतीक है — 25 ‘पच्चीसे बैसाख’ यानी गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की जयंती का अवसर। भाजपा ने शपथ ग्रहण के लिए इसी तारीख़ को चुना। क्योंकि बंगभूमि में जिस ‘सोनार बांग्ला’ का संकल्प भाजपा ने लिया है। वो राष्ट्रीयता का दिशाबोध गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की ‘स्व’ और ‘स्वदेशी’ की वैचारिकी से होकर ही जाएगा। ये अवसर यह भी बताने का निमित्त था कि- राष्ट्रीय अस्मिता और बांग्ला अस्मिता में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही हैं।

 

दूसरा प्रतीक है- शपथग्रहण समारोह का स्थान। शपथग्रहण जिस जगह आयोजित हुआ वो है कलकत्ता का ‘बिग्रेड परेड मैदान’। जहां से कभी 16 अगस्त 1946 को बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और क्रूर आतंक का पर्याय मुस्लिम लीग के नेता हुसैन सुहरावर्दी ने हिन्दुओं का नरसंहार कराया था। सुहरावर्दी ने भारत विभाजन वाले ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के क्रूर आतंक की शुरुआत की थी। उस दिन लाखों मुसलमानों की हत्यारी भीड़ ने बंगाल में रक्तपात की सीमाएं लांघ दी थी। हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था। कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल को हिन्दुओं के ख़ून से लाल कर दिया। लेकिन अब स्वाधीनता के बाद जब पहली बार पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनी तो वहां हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। भाजपा ने जिस ब्रिगेड परेड मैदान’ का चयन किया— वो ये बता रहा कि – पश्चिम बंगाल में अब राष्ट्रीयता के पर्याय ‘हिन्दुत्व’ की सरकार है। यही बोध ही भाजपा सरकार के कार्यों में परिलक्षित होगा। यहां रक्तपात और हिंसा की कहीं कोई जगह नहीं है। पश्चिम बंगाल में वही दिखेग जो ‘वंदेमातरम्’ की राष्ट्रीय चेतना से प्रकट होता है।

तीसरा प्रतीक है — शपथ ग्रहण के मंच में बैकग्राउंड में लगे बैनर में निहित संदेश। बैकग्राउंड की तस्वीर में एक-एक तस्वीर अपने आप में बड़ी कहानी कहती है। बैकग्राउंड की तस्वीर में ‘शंख बजाती’ नारी शक्ति के ज़रिए ये बताया गया कि—पश्चिम बंगाल में शक्ति जागृत अवस्था में है। नारी जब शंखनाद कर रही है तो उसका अर्थ ही मङ्गल बेला का शुभारम्भ है। आरती करता हुआ पुरुष ; इस भाव में भी शक्ति की आराधना है। वहीं सबसे प्रखर संकेत है कालीघाट शक्तिपीठ जो 51 शक्तिपीठों में से एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ के तौर पर भी जाना जाता है। यह पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का सबसे सशक्त प्रतीक है। वहीं ‘धुनुची’ का चित्रण भी बंगभूमि की सांस्कृतिक पहचान में से एक है। जो शुद्धता और पवित्रता तथा भक्ति भाव का सर्वोच्च रूप है। दुर्गा पूजा में माँ दुर्गा के समक्ष धुनुची नृत्य करने की परंपरा है। इसके साथ ही माँ दुर्गा को असुर वध करते हुए दिखाया गया है। जो ये बता रहा है कि दानवदल भले कितने भी छद्म रूप धरे। जो समाज में विध्वंस फैलाता है। लोगों को दुःख देता है। उसका अन्त सुनिश्चित है। ये असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। जो पश्चिम बंगाल में साकार भी हुआ। वहीं ‘सिंदूर खेला’ का चित्रण – वो पारंपरिक प्रतीक है जो भारतीय संस्कृति में ‘शक्ति’ की उपासना के तौर पर जाना जाता है। इसमें भी मातृशक्ति ही केंद्र में होती है। पश्चिम बंगाल की सुप्रसिद्ध दुर्गा पूजा के समय जब विजयादशमी की तिथि को मां को विदाई दी जाती है। उससे ठीक पहले विवाहित महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर लगाकर एक दूसरे के सुहागिन होने की कामना करती हैं। ये पश्चिम बंगाल के जनजीवन में रचा बसा है। यानी पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने शपथग्रहण के साथ ही ये बता दिया कि- यहां के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य और संगठित हिन्दू शक्ति के साथ ही आगे कार्य होंगे।इसी से दशा और दिशा निर्धारित होगी।

ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘विकास और विरासत के सम्मान’ के ध्येय का प्रतिबिंब है। चाहे पूरे चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत तमाम भाजपा नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट से ‘बांग्ला’ में संदेश देने की बात हो। याकि ये सभी प्रतीक। इनके पीछे का संदेश यही है कि हमारे भारत में ‘एकता की विविधता’ है। सभी परंपराएं, त्योहार, कलाएं, बोली-भाषा, वेश-भूषा सब हमारे अपने हैं। इनसे एकत्व प्रकट होता है। यही एकता ही भारत की शक्ति बनती है।

चौथा प्रतीक है — बीजेपी के बलिदानियों का मेमोरियल। शपथ ग्रहण स्थल पर भाजपा ने अपने उन तमाम कार्यकर्ताओं के नामों से जुड़ा मेमोरियल बनाया। जो भाजपा संगठन का विस्तार करते हुए टीएमसी, ममता बनर्जी सरकार की राजनीतिक हिंसा का शिकार हुए। ये बताया गया कि — भाजपा के लिए जिन्होंने जीवन न्योछावर कर दिया। उन बलिदानियों को भाजपा कभी नहीं भूलेगी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बलिदानियों के परिवारों से मुलाक़ात की। उन्हें ये भरोसा दिलाया कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। न्याय होगा। कोई अपराध बख़्शे नहीं जाएंगे।

 

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा—
“बंगाल में भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुँचाने की यात्रा में अपने प्राणों की आहुति देने वाले कार्यकर्ताओं की पावन स्मृति में बना यह मेमोरियल, शपथ ग्रहण स्थल पर उपस्थित हर कार्यकर्ता के हृदय में भावनाओं का ज्वार उत्पन्न कर रहा है।उन पुण्यात्माओं का त्याग, संघर्ष और बलिदान आज सार्थक होने जा रहा है।राष्ट्र और संगठन के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले उन सभी हुतात्माओं को कोटि-कोटि नमन।”

पांचवां प्रतीक अपनी जड़ों से जुड़े रहना—

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शपथ ग्रहण के मंच पर माखनलाल सरकार के पांव छूकर उनका सम्मान किया। आत्मीयता और श्रद्धा के साथ उनसे गले मिले। माखनलाल जैसे तपस्वी साधकों का सम्मान अपने विचार के प्रति समर्पण और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है।

 

सिलीगुड़ी के रहने वाले 98 वर्षीय माखनलाल सरकार जनसंघ-भाजपा के उन शुरुआती लोगों में से हैं जिन्होंने विचारधारा के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया।वो जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने जब – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”; के नारे के साथ जम्मू-कश्मीर में तिरंगा यात्रा के लिए निकले तो माखनलाल सरकार उनके साथ बढ़ चले।गिरफ्तारी दी। जेल की निर्मम यातना सही।

 

आगे चलकर जब 1980 में भाजपा का गठन हुआ तो संगठन को मजबूत करने में माखनलाल सरकार ने बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा की पौध को सींचा। संगठन को खड़ा किया। प्रतिकूल परिस्थितियों में अडिग रहे।

सालों के संघर्ष के बाद जब पश्चिम बंगाल में 2026 में ‘कमल’ खिला तो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अपने नींव के पत्थर को नहीं भूली। शपथ ग्रहण समारोह की अग्रिम पंक्ति में माखनलाल सरकार को आदरपूर्वक को स्थान दिया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श कर ये बता दिया कि – विचार के प्रति अनन्य समर्पण क्या होता है। आजकल लोग जब थोड़े में बौरा जाते हैं। उस समय नरेन्द्र मोदी जैसे तपस्वी राजर्षि बताते हैं कि भारत का मूल चिंतन और आदर्श क्या है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तपोभूमि यही सिखाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उसी तपशाला में तपे हैं। संघ राष्ट्र और समाज के प्रति अनन्य और असंदिग्ध समर्पण सिखाता है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चरितार्थ किया है।

छठवां प्रतीक —जनता ही जनार्दन है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र जब शपथ ग्रहण के दौरान मंच पर पहुंचे तो उन्होंने पहले हाथ हिलाकर वहां मौजूद जनमानस का अभिवादन किया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनादेश और विश्वास के लिए सबको नतमस्तक होकर प्रणाम किया।

 

ये कोई सामान्य बात नहीं है। शिखर पर होकर इतना विनम्र होना। धन्यता का अनुभव करना‌। ये वही करता है जो राष्ट्र में जागृत देवता देखता है। उपासना करता है। वैसे भी भारत के लोकतान्त्रिक इतिहास में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर वो लीक तोड़ी है। जो जनप्रतिनिधियों को जनता से दूर करती थी। सन् 2014 में संसद में प्रवेश के साथ साष्टांग प्रणाम करना हो।

याकि प्रयागराज कुंभ में सफाईकर्मियों के पांव धुलने, उन्हें चप्पल पहनाने का भाव हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसे अनेकों अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जो ये बताता है कि उनकी दृष्टि में जनता ही जनार्दन है। कहने का आशय ये कि प्रतीकों के ज़रिए लोक से जुड़ने, उनके साथ समानुभूति स्थापित करने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा का कोई तोड़ नहीं है। इसके पीछे की मंशा केवल राजनीतिक पकड़ मज़बूत स्थापित करना नहीं है। बल्कि ये एकात्म स्थापित करने का बोध है। ये पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवदर्शन’ और ‘अंत्योदय’ के प्रयोगधर्मी- विचार का प्रतिपादन है। जो वैचारिकी के दिशाबोध को निरूपित करता है।

— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
( साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)