होलिका-दहन पर वामपंथी कलुष

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होलिका-दहन पर वामपंथी कलुष

 

स्मृति–विनाश की इस वैचारिक आग को पहचानिए, भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर जितने हमले बाहरी आक्रान्ताओं ने नहीं किए, उससे कहीं अधिक गहरे, कहीं अधिक धूर्त हमले आज के वैचारिक उपनिवेशवादियों ने किए हैं। यह हमला तलवारों का नहीं, शब्दों का है; यह आक्रमण सीमाओं का नहीं, स्मृति का है। आज जो लोग होली, होलिका-दहन और प्रह्लाद की कथा को “ब्राह्मणवाद द्वारा एक दलित नारी को जलाए जाने” की घटना बताकर प्रस्तुत करते हैं, वे न परंपरा जानते हैं, न कथा समझते हैं—वे बस भारत की सांस्कृतिक संचेतना को उसकी अपनी कहानी से काट देना चाहते हैं।

होलिका की कथा जितनी सरल है, उतनी ही गहन भी। कश्यप ऋषि और दिति की पुत्री, दिति की संतानों को, स्वाभाव वैचित्र्य के कारण दैत्य कहा गया है। सम्पूर्ण कथा श्रीमद्भागवत पुराण में बहुत विस्तार से कही गई है। भारत वर्ष में होनी वाले सर्वाधिक कथाओं में समस्त भागवताचार्य अपनी कथा को यहीं से प्रारम्भ करते है। इस आधार पर दैत्यकुल की राजकुमारी, वप्रीचिति की पत्नी और स्वरभानु की माता—यह एक संपूर्ण दैत्यवंशी, राक्षसी चरित्र है। उसका भाई हिरण्यकश्यप न केवल राजा था, बल्कि एक अत्याचारी, अहंकारी और असुर-प्रवृत्ति वाला शासक था। उसके सामने किसी “शोषित समुदाय” की कथा गढ़ना या उसे “दलित नारी उत्पीड़न” में बदल देना केवल अज्ञान नहीं—एक सुनियोजित बौद्धिक छल है, जो भारतीय मिथकीय चेतना को वर्गीय, जातीय और जेंडरवादी चश्मे से दूषित करना चाहता है।

यहाँ सत्य सरल है: होलिका किसी “अबला स्त्री” की कथा नहीं। वह वरदान से सशक्त, छल से प्रेरित और अधर्म की सहायक है। ब्रह्मा ने उसे अग्नि-प्रतिरोध का वरदान दिया, परंतु वह वरदान धर्म-विरोधी कर्मों के लिए नहीं था। जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठती है, तो उसका जलना कर्मफल है—अन्याय का अंत, अधर्म की पराजय और सत्य की विजय। यही पुराणों का स्वर है, यही भारतीय संस्कृति की जीवंतता का मूलाधार है।

पर आज इस कथा को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने वाले Cultural Marxism के प्रशिक्षित कार्यकर्ता इसे “ब्राह्मणों द्वारा स्त्री-दहन” का उदाहरण बताते हैं। उनकी चाल पुरानी है—हर परंपरा को उत्पीड़न का प्रमाण बनाओ, हर कथा को वर्ग-संघर्ष के फ्रेम में फिट करो, हर मूल्य को अपराधबोध में बदलो। वे राक्षसी को पीड़िता बनाते हैं, दैत्यकुल को जाति-समूह कहते हैं, और धर्म-अधर्म की अनन्त कथा को सत्ता-विरोध का रंग देकर विकृत करते हैं। यह वही मानसिकता है जो श्रीराम को साम्राज्यवादी, श्रीकृष्ण को चालबाज, माता दुर्गा को पीड़ित स्त्री और श्रीगणेश को मज़ाक का पात्र बनाती है। यह वही विचारधारा है जो हमारे महापुरुषों, त्योहारों और प्रतीकों को अपने राजनीतिक एजेंडे की प्रयोगशाला बनाती है।

होलिका-दहन का अर्थ किसी व्यक्ति, कुल और जाति का दमन नहीं, बल्कि जीवन में नकारात्मकता के दहन का संदेश है। यह नव वसंत का, नवहर्ष का, नई शुरुआत का और सत्य के धारण एवं संरक्षण का पर्व है। इसमें प्रह्लाद की विजय, भक्ति की शक्ति और अधर्म के अंत का संदेश है। इसे महिला-विरोध, किसी समाज का-विरोध या सत्ता-विरोध की कहानी में बदलना हमारी परंपरा का नहीं—हमारी स्मृति का अपमान है।

भारतीय समाज को बाँटने के लिए आज जो “थिएटर ऑफ एब्सर्ड” रचा जा रहा है—कि हिरण्यकश्यप शूद्र था, शूद्र तप नहीं कर सकते, गुरुकुल नहीं जा सकते—वह इतिहास का नहीं, वैचारिक क्षुद्रता का प्रमाण है। जिन लोगों ने न शास्त्र पढ़े, न पुराण समझे, वे आज सोशल मीडिया की आधी-अधूरी जानकारी से एक संपूर्ण सभ्यता को अपराधी सिद्ध करने में लगे हैं। वास्तविकता यह है कि होलिका और हिरण्यकश्यप भारतीय चेतना में सदियों से गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति में शस्त्र और शास्त्र काम अध्ययन करने के बाद अहंकार वशीभूत होकर अधर्म के प्रतीक बने हैं और भक्त प्रह्लाद सत्य का। जो लोग इस सबसे सरल सत्य को भी “सामाजिक न्याय” के चश्मे से विकृत कर देते हैं, वे न्याय के नहीं—भारतीय समाज को भीतर से तोड़ने वाले मानसिक उपनिवेशवाद के वाहक हैं।

आज आवश्यकता किसी प्रतिक्रिया की नहीं है, और न किसी प्रतिशोध की, बल्कि तथ्यों के पुनःस्थापन की चुनौती है। अपनी चेतना में स्मृति को पुनः प्रखर करने की है। परंपरा को आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों के फ्रेम में कैद करने की जगह उसके कालातीत संदेश को समझने की है। यह लड़ाई केवल एक कथा की नहीं, बल्कि भारतीय तत्वज्ञान, वांगमय, दर्शन की और वैचारिक संप्रभुता की लड़ाई है।

होलिका का जलना किसी स्त्री का दहन नहीं—अत्याचार, असहिष्णुता, अधर्म, अनीता और असत्य का दहन है। उसका अंत किसी समाज पर अत्याचार का नहीं, बल्कि अधर्म की पराजय का उत्सव है। इसे विकृत कर प्रस्तुत करना एक ऐसी वैचारिक बीमारी है जिसमें संस्कृति को अपराधबोध से भरकर समाज को विवेकहीन बनाया जाता है।

आज, भारत की सभ्यता इस आक्रमण को पहचान चुकी है। वह जानती है कि हमारी परंपराएँ हिंसा की नहीं, समरसता की उपज हैं। होलिका-दहन उसी समरसता का उत्सव है—अहंकार के अंत और सत्य के आरंभ का पर्व। इसे किसी राजनीतिक चश्मे से देखना और किसी आधुनिक विचारधारा में फँसाकर प्रस्तुत करना केवल भ्रम नहीं, सांस्कृतिक अपराध है।

आज ज़िम्मेदारी हमारी है कि हम इस वैचारिक धुंध में भी स्पष्ट देख सकें और यह कह सकें कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भारतीयता चाहिए—न कि वह वैचारिक चश्मा जो हर कथा को केवल संघर्ष, हर पात्र को केवल पीड़ित और हर पर्व को केवल अपराध में बदल देता है। होलिका-दहन पर कलुष केवल परंपरा का नहीं, विवेक का अपमान है। इसे समझना और इस भ्रम को तोड़ना आज केवल सांस्कृतिक कर्तव्य नहीं—राष्ट्रीय आवश्यकता है।

– कैलाश चन्द्र

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