टी20 के छक्के लगाने के युग में बल्ले की निर्माण प्रक्रिया में भी हुआ बदलाव

टी20 के छक्के लगाने के युग में बल्ले की निर्माण प्रक्रिया में भी हुआ बदलाव

टी20 के छक्के लगाने के युग में बल्ले की निर्माण प्रक्रिया में भी हुआ बदलाव
Modified Date: May 18, 2026 / 03:45 pm IST
Published Date: May 18, 2026 3:45 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

(एम आर मिश्रा)

नयी दिल्ली, 18 मई (भाषा) क्रिकेट में पावर-हिटिंग के बढ़ते चलन के कारण बल्लों का निर्माण करने वाली कंपनियों में भी एक खामोश क्रांति को जन्म दिया है, जो सुर्खियों से दूर है। यहां अब बल्ला बनाने के पारंपरिक शिल्प कौशल में वैज्ञानिक सटीकता को जोड़ा जा रहा है क्योंकि निर्माता वर्तमान समय के बल्लेबाजों की मांगों को पूरा करने के लिए होड़ में लगे हैं।

फ्रेंचाइजी क्रिकेट की दुनिया में जहां थोड़ा फायदा मिलने से भी किस्मत का फैसला हो सकता है, वहीं निर्माता अब प्रत्येक खिलाड़ी की ताकत, स्ट्रोकप्ले और मैच की स्थिति के अनुरूप बल्ले को नमी नियंत्रण, फाइबर विश्लेषण और व्यक्तिगत डिजाइन के जरिए बेहतर बना रहे हैं।

ऐसे युग में जहां फ्रेंचाइजी का मूल्यांकन सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है, जहां हर बाउंड्री मैच के परिणाम को बदल सकती है और टीम तैयार करने में किए गए भारी निवेश को उचित ठहराती है, वहां प्रदर्शन करने के दबाव ने अत्यधिक अनुकूलित बल्लों की अभूतपूर्व मांग पैदा कर दी है।

बल्लों के निर्माता अभी प्रदर्शन को बेहतर करने वाले बल्ले डिजाइन करने के लिए वैज्ञानिक डेटा, विश्लेषकों की प्रतिक्रिया और किसी विशेष खिलाड़ी के खेलने के तरीके पर काफी हद तक निर्भर हैं। उनका कहना है कि वह दिन दूर नहीं जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) इंजीनियरों को बल्ले बनाने में मदद करेगी।

पावरप्ले के माहिर बल्लेबाजों से लेकर डेथ ओवरों में मैच खत्म करने वाले बल्लेबाजों तक, कई शीर्ष बल्लेबाज अब आठ से दस बल्ले लेकर यात्रा करते हैं, जिनमें से प्रत्येक को एक विशेष उद्देश्य के लिए तैयार किया जाता है।

भारत की अग्रणी बल्ला निर्माता कंपनी सैंसपेरिल्स ग्रीनलैंड्स (एसजी) के सीईओ पारस आनंद ने पीटीआई से कहा, ‘‘क्रिकेटर खेल के विभिन्न चरणों में, स्थिति के अनुसार, अलग-अलग प्रकार के बल्ले इस्तेमाल करते हैं। औसतन वे आठ से दस बल्ले रखते हैं। वे अपने प्रत्येक बल्ले की अच्छी समझ रखते हैं और उन पर नंबर लिख देते हैं।’’

इससे पता चलता है कि क्रिकेट उन दिनों की तुलना में कितना विकसित हो चुका है जब खिलाड़ी अक्सर पूरे सत्र के लिए केवल एक बल्ला ही अपने पास रखते थे।

आनंद ने कहा, ‘‘पहले बल्लेबाज बल्ले को तैयार करने के लिए नेट में अभ्यास करते थे और उसे सही आकार में लाते थे। लेकिन आज की पीढ़ी को पूरी तरह से तैयार बल्ला चाहिए। वरना वे कहते हैं कि बल्ला अच्छा नहीं है। खिलाड़ी कहते हैं, ‘मेरा शाम को मैच है, उससे पहले मुझे बल्ला भेज दो।’’

इस तरह की मांग ने बल्ले के निर्माण को एक सटीक विज्ञान में बदल दिया है।

मेरठ स्थित एसजी की बल्ले का निर्माण करने वाली इकाइयों में आयातित इंग्लिश विलो की लकड़ी को सुखाने के लिए एक बेहद नियंत्रित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

आनंद ने कहा, ‘‘जब आयातित लकड़ी भारत पहुंचती है, तो हम उसे हवा में सुखाते हैं। अगर आप लकड़ी को इस गर्म और शुष्क मौसम में रखते हैं तो उसमें से थोड़ी नमी कम हो जाती है, जिससे उसका वजन कम करने में मदद मिलती है।’’

बल्ले की नमी को नियंत्रित करना आधुनिक बल्ले के निर्माण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। बल्ले निर्माताओं के लिए चुनौती काफी कठिन है क्योंकि खिलाड़ी बड़े आकार, मोटे किनारों और बड़े स्वीट स्पॉट वाले बल्ले चाहते हैं, लेकिन उनका वजन अधिक नहीं होना चाहिए। यह बीते युग से एक बड़ा बदलाव दर्शाता है।

आनंद ने कहा, ‘‘संभव है कि 1980 के दशक में सुनील गावस्कर ने जिन बल्लों का इस्तेमाल किया होगा उनमें अधिक नमी रही हो। वे बल्ले पतले और भारी थे।’’

गावस्कर ने खुद पीटीआई को बताया था कि वह 2.4 पाउंड (1.08 किलोग्राम) और 2.9 पाउंड (1.32 किलोग्राम) के बीच वजन वाले बल्ले का इस्तेमाल करते थे। वर्तमान समय के बल्लेबाज मैदान के प्रारूप और प्रकृति के आधार पर 1.15 किलोग्राम से 1.35 किलोग्राम तक के बल्ले से खेलते हैं।

पूर्व भारतीय खिलाड़ी और कोच डब्ल्यू वी रमन ने बताया, ‘‘बल्ले का वजन व्यक्तिगत पसंद का मामला है। यह इस पर निर्भर करता है कि बल्लेबाज इनमें कितना सहज महसूस करता है।’’

आईसीसी के मौजूदा नियमों के अनुसार बल्ले की लंबाई 38 इंच, चौड़ाई 4.25 इंच, गहराई 2.6 इंच और किनारे की मोटाई 1.56 इंच से अधिक नहीं हो सकती है।

यही नहीं पेशेवर स्तर पर इस्तेमाल होने वाले प्रत्येक बल्ले को अंपायरों द्वारा उपयोग किए जाने वाले मानक बल्ले के माप से गुजरना पड़ता है। नियमों में वजन की कोई आधिकारिक सीमा निर्धारित नहीं है, जिससे निर्माताओं को आकार संबंधी सीमाओं के अंदर रहकर नए प्रयोग करने पड़ते हैं।

आनंद ने कहा, ‘‘एक क्रिकेटर की शारीरिक ताकत के आधार पर उसकी जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं। अगर वह अच्छी डीलडौल वाला बल्लेबाज है तो उसे संतुलित बल्ले की जरूरत हो सकती है। अगर वह बहुत मजबूत नहीं है, तो उसे ऐसा बल्ला चाहिए जो हाथ में हल्का महसूस हो।’’

पावर हिटर अक्सर बल्ले के निचले हिस्से में अधिक वजन रखना पसंद करते हैं ताकि गेंद हवा में ऊपर उठे।

इसके बाद आती है बल्ले के हैंडल की बात। एक ऐसा पहलू जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कारक है।

आनंद ने कहा, ‘‘सचिन तेंदुलकर हमेशा सख्त हैंडल चाहते थे। सौरव गांगुली भी काफी लचीलापन चाहते थे। अगर कोई खिलाड़ी हैंडल के आकार से सहज नहीं है, तो इसका असर उसके स्विंग और फॉलो-थ्रू पर पड़ेगा।’’

आनंद के अनुसार भारत अब वैश्विक इंग्लिश विलो की खपत का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जिससे बल्ले निर्माण में देश के प्रभुत्व का पता चलता है।

व्यापारिक अनुमानों से पता चलता है कि भारत ब्रिटेन से प्रतिवर्ष कई सौ टन इंग्लिश विलो की टहनियों का आयात करता है। विश्व स्तर पर टी20 लीग की भरमार के कारण बल्लों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। विलो के पेड़ को परिपक्व होने में आमतौर पर 15 साल लगते हैं और एक पेड़ से लगभग 40 बल्ले तैयार किए जा सकते हैं।

भारत के पूर्व ऑफ-स्पिनर हरभजन सिंह का मानना ​​है कि बल्ले में लगातार हो रहे बदलाव के बावजूद क्रिकेट के मूल सत्य को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने पीटीआई से कहा, ‘‘बल्लेबाज का कौशल सबसे ज्यादा मायने रखता है। विराट कोहली ने (रायपुर में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की तरफ से कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाफ) अपना शतक एक ही बल्ले से बनाया, जिसका उन्होंने पूरे मैच में इस्तेमाल किया।’’

हरभजन ने सचिन तेंदुलकर द्वारा उपहार में दिए गए बल्ले से बनाए गए अपने दो टेस्ट शतकों को बड़े ही स्नेह से याद किया।

उन्होंने कहा, ‘‘पाजी (तेंडुलकर) ने मुझे पांच या छह बल्ले उपहार में दिए थे और मैंने अपने करियर के अंत तक उन्हीं से खेला। जब मैं खेला करता था तब मैच की स्थिति में सबसे ज्यादा बल्ले बदलने वाले खिलाड़ी दादा (सौरव गांगुली) थे।’’

भाषा

पंत आनन्द

आनन्द


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