शिव को मिलेगा राज या नाथ का होगा मध्यप्रदेश !

शिव को मिलेगा राज या नाथ का होगा मध्यप्रदेश !

शिव को मिलेगा राज या नाथ का होगा मध्यप्रदेश !
Modified Date: November 29, 2022 / 08:36 pm IST
Published Date: November 10, 2018 9:46 am IST

देश के बीजेपी शासित अहम राज्यों में से एक मध्य प्रदेश..इस बार यहां 28 नवंबर को मतदान होगा और 11 दिसंबर को नतीजे आएंगे । यहां करीब 15 साल से बीजेपी सत्तासीन है । अब चौथी जीत के लिए सीएम शिवराज सिंह क़िला लड़ाए हुए हैं । मध्यप्रदेश में कुल 52 जिले हैं, जबकि विधानसभा सीटों की संख्या 230 हैं। इनके अलावा एक सीट और भी है, जिस पर किसी को मनोनीत करने का अधिकार राज्यपाल के पास रहता है। 2013 में हुए चुनाव के स्कोर कार्ड पर नज़र डालें तो बीजेपी के पास 166 सीटें, कांग्रेस के खाते में 57 और अन्य के खाते में 8 सीटें हैं। मप्र के अलग-अलग अंचलों की सियासी स्थिति अलग-अलग है । मालवा की बात करें तो ये भौगोलिक रूप से मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा इलाका है । इसमें 13 जिले शामिल हैं । मालवा में बीजेपी हमेशा से ताकतवर रही है । यहां से कैलाश विजयवर्गीय और सुमित्रा महाजन जैसे नेता आते हैं । उज्जैन, शाजापुर, आगर मालवा, रतलाम, झाबुआ, अलीराजपुर, देवास और सीहोर की सभी विधानसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा है जबकि इंदौर की 9 में से 8 सीट उसके कब्जे में है ।

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मालवा की 57 सीटों में से 53 पर बीजेपी का कब्जा है । निमाड़ में भी कमोबेश मालवा जैसी ही स्थिति है । यहां से भी 2013 में बीजेपी ने लगभग एकतरफा जीत हासिल की थी ।

लेकिन सियासी पंडितों का ये कहना है कि इस बार मालवा का माहौल बीजेपी की समर्थन में नहीं दिख रहा है । ख़ासकर किसान आंदोलनों के चलते यहां वोटर्स का मन बीजेपी के प्रति खट्टा हुआ है । मालवा में पाटीदार समुदाय प्रभावशाली है पर साथ ही राजपूतों का भी कई इलाकों में वर्चस्व रहा है । SC-ST एक्ट के खिलाफ चल रहे सवर्ण आंदोलन का जोर भी मालवा और चंबल इलाके में देखा गया है । बुंदेलखंड और मालवा में दलितों की बड़ी आबादी रहती है । आंकड़ों के हिसाब से उज्जैन जिले में प्रदेश के सबसे ज्यादा दलित रहते हैं । दलितों के कर्मचारी संगठन अजाक्स की लोकप्रियता भी यहां सबसे ज्यादा दिखती है । अजाक्स इस वक्त खुलकर शिवराज सरकार का विरोध कर रहा है ।

महाकौशल की बात करें तो ये राज्य का दूसरा सबसे बड़ा इलाका है । इसका केंद्र हैं जबलपुर..बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह इसी इलाके से आते हैं । उनके अलावा युवा मोर्चा के अध्यक्ष अभिलाष पांडे और लोधी समुदाय के दिग्गज नेता प्रहलाद पटेल भी इस क्षेत्र से हैं । महाकौशल में जबलपुर, मंडला, डिंडौरी, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी, कटनी और बालाघाट जिले शामिल हैं..कुल मिलाकर यहां 38 विधानसभा सीट हैं । प्रदेश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी यहीं रहती है । यहां की 38 में से 13 सीटें ST और 2 SC आरक्षित हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ का छिंदवाड़ा भी महाकौशल में आता है । नर्मदा इस इलाके की जीवन रेखा है और आस्था का केंद्र भी..ऐसे में नदी किनारों की बदहाली और अवैध खनन इस बार निर्णायक मुद्दा है । इलाके के लोग शिवराज सरकार के उन तमाम वादों को याद कर रहे हैं..जो नर्मदा के संरक्षण के लिए किए गए थे और जो पूरे नहीं हो पाए । इस बार सवर्ण आंदोलन की आंच यहां भी महसूस हुई है । ख़ासकर नरसिंहपुर और जबलपुर जिले में इस आंदोलन ने असर दिखाया वहीं गन्ना किसानों का असंतोष भी बीजेपी की राह में रोड़ में बन सकता है ।

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बुंदेलखंड भी विधानसभा चुनाव अपने शबाब पर है । हर बार की तरह इस चुनाव में भी पिछड़ापन यहां सबसे बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है । 2013 के आंकड़ों को देखें तो बुंदेलखंड में बीजेपी मजबूत स्थिति में है । 2013 के चुनाव में सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, दमोह, पन्ना जिले की कुल 26 सीटों में से 20 पर बीजेपी ने परचम लहराया था जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ छह सीटें ही आई थीं । बीजेपी ने बुंदेलखंड में चुनावी समीकरण को अपने पक्ष में करने के लिए ही निवाड़ी को जिला बनाया, सागर को स्मार्ट सिटी योजना में लिया, पन्ना को मिनी स्मार्ट सिटी घोषित किया, छतरपुर को मेडिकल कॉलेज का उपहार दिया । इस बार बुंदलेखंड की सात सीटों पर कड़ा मुकाबला होने की संभावना है । ये वो सीटें हैं..जहां 2013 में जीत का अंतर बेहद मामूली था ।

बात करें विंध्य क्षेत्र की जो बघेलखंड के नाम से भी जाना जाता है तो ये देश का शायद इकलौता इलाका है.. जहां कुल आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा सवर्णों का है । सतना और रीवा जिले के कुछ विधानसभा सीटों पर तो 40 फीसदी से भी ज्यादा ब्राह्मण रहते हैं । इस इलाके से निकले 5 ब्राह्मण सीएम प्रदेश पर राज कर चुके हैं । दूसरी ओर यहां बसपा भी जनाधार रहा है । यहां की कुल आबादी में 32-33 फीसदी दलित भी हैं । सवर्ण आंदोलन का असर विंध्य में भी दिख रहा है..ज़ाहिर है यहां के सवर्ण वोटर भी इसी मुद्दे के चलते बीजेपी से नाराज चल रहे हैं । 2013 के आंकड़ों के मुताबिक विंध्य के 7 जिलों की 30 विधानसभा सीटों में से 17 पर बीजेपी, 11 पर कांग्रेस और 2 पर बीएसपी काबिज है ।

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मध्य प्रदेश में खासतौर पर चंबल संभाग के मुरैना, भिंड और ग्वालियर में विरोध के सुर कुछ ज्यादी ही सुनाई दिए। ऐसे में जानकारों का कहना है कि बीजेपी के लिए सवर्णों को गुस्से पर काबू पाना आसान नहीं होगा। लेकिन इसके साथ ही जानकार ये भी बताते हैं कि कांग्रेस के लिए भी जवाब देना आसान नहीं होगा। क्योंकि वो भी खुलकर अध्यादेश लाए जाने का विरोध करने से बचती रही। 

 

चंबल-ग्वालियर इलाके की चुनावी तस्वीर पर नज़र डालें तो 34 सीटें यहां मौजूद हैं । ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा जैसे नेता इसी इलाके से आते हैं । चंबल इलाके में श्योपुर, मुरैना और भिंड जिले आते हैं । इन तीन जिलों की 13 सीटों में 8 पर बीजेपी, 3 पर कांग्रेस और 2 पर बसपा का कब्जा है । विधानसभा चुनाव के लिए घोषित उम्मीदवारों की सूची देखकर लगता है कि दोनों ही दलों ने यहां जनता की राय और सर्वे को दरकिनार करते हुए बड़े नेताओं के पसंदीदा चेहरे और जाति के आधार पर ही टिकट बांटे हैं। अंचल की 90 प्रतिशत सीटों पर चिर-परिचित चेहरे मैदान में हैं। दूसरे दलों से आए लोगों को टिकट से नवाजा गया है। बगावत, भितरघात और दलबदल का तेज होता सिलसिला यहां के चुनाव को दिलचस्प बना रहा है । यहां की हर सीट पर जातीय समीकरण बदलते हैं क्योंकि देश के बाकी इलाकों की तरह यहां प्रमुख जातियों के सर्वमान्य क्षत्रपों का अभाव है, जो कई-कई सीटों पर प्रभाव रखते हों । नतीजा ये कि जहां जिस जाति का दबदबा होता है..वहां उस समुदाय के नेता की जीत हो जाती है ।

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मध्‍य प्रदेश के चुनावी समर में एससी-एसटी ऐक्‍ट के खिलाफ सवर्णों का गुस्‍सा राजनीतिक दलों को तगड़ा झटका दे सकता है। राज्‍य की अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 35 सीटों पर सामान्‍य और ओबीसी के कुल वोटर एससी से ज्‍यादा हैं। ऐसे समय पर जब मध्‍य प्रदेश में आरक्षण विरोधी आंदोलन गति पकड़ रहा है, सामान्‍य और ओबीसी मतदाता किस तरफ जाएंगे, यह अनुमान लगाना राजनीतिक दलों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 35 सीटें आरक्षित हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की झोली में 28 सीटें आई थीं। जानकार बताते हैं कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर सामान्य वर्ग के मतदाता जीत या हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 2013 या उससे पहले के चुनाव में परंपरागत तौर पर सवर्ण मतदाता बीजेपी के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। लेकिन इस दफा तस्वीर अलग है। एससी-एसटी एक्ट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का जब फैसला आया तो विपक्षी दल निशाना साधने लगे की मौजूदा केंद्र सरकार दलितों और उपेक्षित समुदात के प्रति संवेदनशील है।

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मुद्दे ऐन चुनाव में गायब हैं और चेहरों पर फिर दांव लग रहे हैं । शिवराज सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ, जैसे  क्षत्रप चुनावी आकाश में छाए हुए हैं । मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अपना तीन कार्यकाल पूरा कर चुके हैं..वो नवंबर 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे । इन 15 बरसों में उन्होंने प्रदेश के अंदर खुद को बीजेपी के सबसे बड़े और सर्वमान्य लीडर के रूप में स्थापित किया है । यहां तक कि राष्ट्रीय परिदृश्य में भी उनकी गिनती बीजेपी के बड़े नेताओं में होने लगी है पर इस बार का चुनाव उनके लिए भी आसान नहीं है । किसान आंदोलन, मंदसौर गोलीकांड, व्यापमं घोटाला और इसके गवाहों की मौत, महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा जैसे मुद्दे शिवराज के खिलाफ जाते हैं । दूसरी ओर टिकटों के एलान के साथ ही जिस तरह बीजेपी के अंदर बगावत के सुर सुनाई पड़ रहे हैं..जिस तरह पार्टी के वरिष्ठ नेता हर हाल में अपने और अपनों के लिए टिकट पाने के लिए जोर-जबरदस्ती पर उतरते दिखे…वो पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते । सरताज सिंह जैसे नेता का कांग्रेस प्रवेश और उसके टिकट पर चुनाव लड़ना भी पार्टी को ऐन चुनावी दौर में झटका देने वाला घटनाक्रम है । इधर प्रमुख विपक्षी कांग्रेस इस बार सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताक़त झोक रही है । कमलनाथ की अगुवाई में पार्टी इस बार पहले ही आक्रामक तेवर दिखाने लगी थी और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अग्रेसिव कैंपेनिंग कर पार्टी के पक्ष में माहौल बना रहे हैं । मौजूदा तस्वीर ये सियासी घमासान का स्कैच तो खींचती है..पर ये बताने में सक्षम नहीं कि आखिर 2018 के इस चुनावी समर में विजेता की कुर्सी किसकी प्रतीक्षा कर रही है? 


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