स्मारक के जीर्णोद्धार के लिए घर की दीवार तोड़कर 150 साल पुरानी ईंटें दी इस परिवार ने

स्मारक के जीर्णोद्धार के लिए घर की दीवार तोड़कर 150 साल पुरानी ईंटें दी इस परिवार ने

स्मारक के जीर्णोद्धार के लिए घर की दीवार तोड़कर 150 साल पुरानी ईंटें दी इस परिवार ने
Modified Date: November 29, 2022 / 08:00 pm IST
Published Date: June 4, 2018 11:48 am IST

धमधा। धमधा में 273 साल पुराने एक स्मारक का पुनर्निर्माण आम नागरिक मिलकर कर रहे हैं। 1744 में बना यह मंदिरनुमा स्मारक तालाब के बीचोंबीच है, जो पिछले कुछ साल पहले गिरकर नष्ट हो गया। धमधा के आम नागरिकों ने इस पुरात्ताविक महत्व के स्मारक के महत्व को समझा और इसके पुर्ननिर्माण में आगे आए। इसका निर्माण पुरानी चूना-गारा पद्धति से किया जा रहा है। इसके लिए धमधा के ब्राह्मण पारा में यशवन्त एवं भूषण सोनी ने अपने पुराने घर की ईंटें निर्माण के लिए दी हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये ईंटें डेढ़ सौ साल पुरानी हैं और इनका साइज़ 9 बाइ 9 का है।

प्राचीन नगरी धर्मधाम में इस तरह के खंडहरों की भरमार है, लेकिन आज तक कभी इनके संरक्षण या पुर्ननिर्माण की दिशा में कोई काम नहीं किया गया, लिहाजा ये पुराने खंडहर टूटकर जमींदोज हो रहे हैं। उनका अस्तित्व खत्म हो रहा है। यह धमधा के अस्तित्व के लिए संकट का विषय है। इसी तरह के इस स्मारक को बचाने के लिए लोग आगे आए हैं।

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बिलासपुर के कारीगर प्रदीप सेंड्रे इसे बनाने के लिए धमधा आए हैं। उन्होंने इस प्राचीन स्मारक को पुरानी पद्धति से बनाने का विचार रखा। इसके लिए डेढ़ सौ साल पुरानी ईंटों की तलाश की गई। यशवंत सोनी और भूषण सोनी के पुराने घर में ये ईंटें थी, उन्होंने घर की परवाह न करते हुए, उन्हें निकाल कर स्मारक निर्माण के लिए प्रदान किया है। नगरवासियों ने इस स्मारक के निर्माण के लिए श्रमदान का अभियान छेड़ा है।

पद्मश्री अरूण शर्मा ने दिसंबर में किया था सर्वे

छत्तीसगढ़ शासन के पुरातत्व विभाग ने धमधा के इस स्मारक का अवलोकन 8 दिसंबर 2016 को किया था। जाने-माने पुरातत्वविद पद्मश्री अरूण कुमार शर्मा के साथ उनकी टीम के सदस्य प्रभात सिंह और तिर्की भी आए थे। उन्होंने बावली के किनारे बने हुए स्मारक का नाम-जोख किया। उन्होंने इसे प्राचीन संत या व्यक्ति की याद में बनाया हुआ स्मारक बताया। टीम के दौरे के वक्त बावली में पानी भरा था, लिहाजा उसकी नाप-जोख नहीं हो सकी थी। अब बावली सूखने के बाद स्मारक के अवशेष नजर आ रहे हैं। प्रभात सिंह का कहना है कि पुरातत्व विभाग इस स्मारक के लिए कोई बजट नहीं दे सकता, क्योंकि यह छोटा सा स्मारक है। इसके लिए नगर के लोगों को स्वयं सहयोग करना चाहिए। यह नगर की अस्मिता और स्वाभिमान का परिचायक है। विभाग से मार्गदर्शन अवश्य मिल सकता है।

1740 के आसपास बना है स्मारक

नैय्या तालाब के किनारे बने इस स्मारक का निर्माण सन् 1740 के आसपास हुआ है। नगर के विद्वान स्व. रामजी प्रसाद अग्रवाल ने अपनी हस्तलिखित डायरी में इस स्मारक का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार 1744 में गोंड राजा भवानी सिंह हुए थे, उनके शासन में गोविन्द दास बैरागी ने पश्चिम तरफ एक कुंड खोदाया और पक्का घाट बंधाया। मध्य में एक देवालय का निर्माण किया। एक घाट दक्षिणाभिमुख, एक घाट उत्तराभिमुख। बावली में अमराई लगाई, कुंड का नाम बावली रखा।

वेब डेस्क, IBC24


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