क्या कहती है अंबिकापुर की सियासत, देखिए विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड

Ads

क्या कहती है अंबिकापुर की सियासत, देखिए विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड

  •  
  • Publish Date - May 22, 2018 / 02:14 PM IST,
    Updated On - November 29, 2022 / 08:25 PM IST

रायपुर/अंबिकापुर। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अक्टूबर-नवंबर में विधान सभा चुनाव होने हैं, लिहाजा सियासत की नब्ज अब धीरे-धीरे तेज होने लगी है। सियासत के इस महासमर की तैयारियों के बीच मतदाता अपने उस सियासी मूड को तैयार कर रहा है, जो मिशन 2018 में पार्टियों और उम्मीदवारों का भाग्य तय करेगा और आम जनता के इसी मूड को भांपने के लिए हम निकल पड़े हैं, दोनों राज्यों के दौरे पर। यानी हम विधायकजी का पूरा रिपोर्ट कार्ड तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।

विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड तैयार करने के लिए हमारी टीम पहुंची अंबिकापुर विधानसभा क्षेत्र। इस सीट पर शुरू से लेकर अभी तक राजमहल का खासा असर रहा है। कांग्रेस के वर्तमान विधायक टीएस सिंहदेव भी राजघराने से हैं, लेकिन लोकतंत्र के इस दौर में केवल महल का बैकग्राउन्ड ही कामयाबी की गारंटी नहीं है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में जीत हार का अंतर ये साबित भी करता है।

यह भी पढ़ें : इस आइलैंड पर बच्चे को जन्म देने पर पाबंदी, 12 साल बाद पहली बार किसी का जन्म

 

अतीत किसी ना किसी रूप में वर्तमान में भी अपना वजूद कायम रखता है। अंबिकापुर की सियासत में भी इस सच को महसूस किया जा सकता है। महल भले ही जर्जर हो गया हो, लेकिन इसका असर यहां की सियासत में अभी भी कायम है। अंबिकापुर के वर्तमान विधायक टीएस सिंहदेव राजघराने से ही हैं और इस इलाके में कांग्रेस की राजनीति की एक बड़ी ताकत माने जाते हैं। यूं तो यहां की सियासत में महल का असर हमेशा से ही रहा है, लेकिन 2008 में परिसीमन के बाद सामान्य सीट के रूप में अस्तित्व में आई अंबिकापुर विधानसभा सीट पर पैलेस का सीधा दखल दिखाई देता है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पैलेस का बैकग्राउन्ड सियासी सफलता की गारंटी हो। यदि ऐसा होता तो 2008 में टीएस सिंहदेव महज 980 वोट से नहीं जीतते। टीएस सिंहदेव हमेशा ये मानते रहे कि वो जीत उनके लिए हार के समान ही थी। इससे सीख लेते हुए उन्होंने अपनी मेहनत को सही दिशा दिखायी और 2013 में बीजेपी प्रत्याशी को 19 हजार 558 वोटों से हराया।

इसमें कोई शक नहीं कि सरगुजा में टीएस सिंहदेव कांग्रेस की बड़ी ताकत हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उनके आगे पूरी कांग्रेस नतमस्तक हो, क्योंकि जैसे ही अजीत जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने की घोषणा की, सरगुजा कांग्रेस में भी फूट पड़ गयी और सैकड़ों पदाधिकारी और कार्यकर्ता जोगी खेमे में चले गए। इसी खेमे से जनता कांग्रेस के जिलाध्यक्ष दानिश रफीक अंबिकापुर सीट से विधायक के संभावित उम्मीदवार के तौर पर अपना जोर आजमा रहे हैं।

टीएस सिंहदेव के करीबी और लखनपुर नगर पंचायत के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल का कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी में चले जाना भी टीएस सिंहदेव की असफलता मानी जा रही है। लखनपुर कांग्रेस के लिए काफी अहम रहा है, ऐसे में यहां के नगर पंचायत अध्यक्ष का बीजेपी में चले जाना कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। इतना ही नहीं राजेश अग्रवाल अब बीजेपी से टिकट की दावेदारी भी करने लगे हैं। हालांकि टीएस सिंहदेव अपनों से अलग होकर दूसरे दलों में जाने वाले नेताओं से ज्यादा परेशान नजर नहीं आते। लेकिन उनका कहना है कि उन्होंने राजेश अग्रवाल जैसे लोगों को मनाने की भरपूर कोशिश की है।

यह भी पढ़ें :चीनी इस्लामिक एसोसिएशन ने कहा- मस्जिदों में फहराए जाएं राष्ट्रध्वज

 

वहीं दूसरी ओर बीजेपी से टीएस सिंहदेव को चुनौती देने वाले नामों में लगातार दो बार चुनाव हार चुके अनुराग सिंहदेव का पत्ता इस बार कट सकता है। ऐसे में हस्तशिल्प बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अनिल सिंह मेजर और वर्तमान सरगुजा सांसद कमलभान सिंह प्रबल दावेदार हो सकते हैं। वहीं बीजेपी जिलाध्यक्ष अखिलेश सोनी का नाम भी इस सूची में शामिल है। अखिलेश इससे पहले जिला पंचायत सदस्य, जिला सहकारी बैंक के संचालक और पार्षद जैसे पदों पर निर्वाचित हो चुके हैं।

कुल मिलाकर अंबिकापुर की सियासत की बिसात में राजा से लेकर प्यादे तक सभी अपनी अपनी चालें चल रहे हैं। अब देखना है कि राजनीति के इस खेल में कुर्सी हासिल कर कौन राजा बनता है और कौन प्यादा साबित होता है।

अंबिकापुर के सियासी इतिहास की बात करें तो यहां की राजनीति पैलेस के आसपास घूमती नजर आती है। लेकिन यहां अब आम मुद्दे हावी हो चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी के सामने महल के असर को खत्म करके कांग्रेस को मात देने की चुनौती है तो वहीं कांग्रेस महल को पकड़कर फिर से अंबिकापुर में अपनी सीट पक्की करने के लिए तैयारी शुरू कर चुकी है।

यह भी पढ़ें : शिक्षाकर्मी वर्ग 3 ने लगाया उपेक्षा का आरोप- वेतन विसंगति के मुद्दे पर मोर्चा के रुख से नाराजगी

 

सरगुजा संभाग में अंबिकापुर को एक अहम सियासी केंद्र माना जा सकता है। यहां होने वाली सियासी गतिविधियों का असर दूसरी सीटों पर भी पड़ता है। लिहाजा आने वाले चुनाव में इस सीट पर पूरे राज्य की नजर होगी। वैसे अंबिकापुर के सियासी इतिहास की बात की जाए तो यहां का राजनीति पर महल का असर शुरू से ही रहा है और यही यहां से कांग्रेस की सफलता की बड़ी वजह भी रही है

1952 में सरगुजा रियासत के महाराज रामानुज शरण सिंहदेव ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। 1962 के चुनाव में इस सीट से लखनपुर रियासत के अमरेश प्रसाद सिंहदेव ने निर्दलीय के तौर पर जीत हासिल की। लेकिन 1967 में सत्यनाराण त्रिपाठी ने जीत के साथ वापस ये सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी। 1972 में इस सीट पर सरगुजा सियासत की महारानी देवेंद्र कुमारी सिंहदेव ने कांग्रेस को जीत दिलाई। लेकिन 1977 में जनता लहर के कारण जनता पार्टी के प्रभु नारायण त्रिपाठी ने इस सीट को जीता। उसके बाद ये सीट अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व कर दी गई। 1980 से 1998 तक लगातार पांच बार कांग्रेस के मदन गोपाल सिंह यहां से चुनाव जीते। लेकिन 2003 में ये सिलसिला टूटा और बीजेपी के कमलभान सिंह कांग्रेस के मदन गोपाल सिंह को हराकर यहां से पहली बार विधायक चुने गए। 2008 में परिसीमन के बाद इस सीट को फिर से सामान्य घोषित कर दिया गया और कांग्रेस ने एक बार फिर राजपरिवार के सदस्य पर अपना भरोसा जताया। हालांकि काफी नजदीकी मुकाबले में कांग्रेस के टीएस सिंहदेव ने बीजेपी के अनुराग सिंहदेव को मात्र 980 वोटों से ही मात दे पाए। 2013 में एक बार फिर कांग्रेस से टीएस सिंहदेव उम्मीदवार थे और  बीजेपी ने अनुराग सिंहदेव पर दांव खेला। लेकिन कांग्रेस की तरफ से टीएस सिंहदेव ने फिर से जीत हासिल की और  बीजेपी प्रत्याशी को 19558 वोटों से मात दी।

2 लाख 15 हजार 694 मतदाता वाले इस विधानसभा में जातिगत समीकरणों का भी खासा असर है। भले ही सीट सामान्य वर्ग के लिए है। लेकिन यहां पर एससी,एसटी और ओबीसी मतदाता ही कुर्सी का भाग्य तय करते हैं। हालांकि सरहदी इलाका होने के कारण बाहर से आकर अंबिकापुर बसे और अब यहां के मतदाता हो चुके लोग भी अहम भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही इन मतदाताओं को लुभाने की कोशिश शुरू कर दी है। राजे रजवाड़े के असर वाले इस क्षेत्र की सियासी चालों को यहां के मतदाता बखूबी समझते हैं। यही वजह है कि आने वाले चुनाव में सभी दलों को जनता को लुभाने की कोशिश सोच समझकर करनी होगी।

अंबिकापुर में मुद्दों की कोई कमी नहीं है। यूं तो टीएस सिंहदेव राजमहल के अगुवा होने के कारण हमेशा से ही एक विशेष वर्ग के निशाने पर रहे हैं। लेकिन नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद अपने विधानसभा क्षेत्र में कम समय देना लोगों को नागवार गुजर रहा है और इसका जवाब उन्हें जनता को इस बार देना पड़ेगा। ऐसे कई वायदे थे जो विधायक पूरा नहीं कर पाए और कई ऐसी घोषणाएं थीं जो अब पूरी होती नजर नहीं आ रही हैं। वहीं इस इलाके में सड़कें और अदानी की कोल माइंस एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आ रही है।

कोयले की दलाली में हाथ काले की कहावत पुरानी है, लेकिन इन दिनों अंबिकापुर की सियासत में ये कहावत खूब चरितार्थ हो रही है और यहां की राजनीति में भी ये अपना असर दिखा रही है। यहां कोई कोयला घोटाला तो नहीं हुआ है लेकिन अदानी कंपनी की कोयला खदानें खुलने के बाद यहां एक नया मुद्दा खड़ा हो गया है जो आने वाले चुनाव में जमकर गूंज सकता है। दरअसल अदानी की कोल माइंस खोलने के लिए जमीन अधिग्रहित करने से पहले लोगों को रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के सपने दिखाए गए थे। लेकिन आज तक प्रभावित लोगों को ना तो रोजगार मिला और ना ही जरूरी सुविधाएं।

यह भी पढ़ें : 500 रुपये की रिश्वत लेते महिला पटवारी रंगे हाथ गिरफ्तार

 

कोलमाइंस खुलने के बाद उदयपुर से अंबिकापुर तक की सड़कें पूरी तरह से जर्जर हो गई हैं। सड़कों पर मरने वालों की संख्या में कई गुना ज्यादा वृद्धि हो गई। लगातार मौतों से ग्रामीण हिंसक होने लगे और आए दिन सड़कों पर मारपीट और गाडियां जलाने की घटनाएं सामने आने लगीं। जाहिर है ऐसे में सियासत भी इससे प्रभावित नहीं रह सकती है और दोनों दलों की तरफ से होने वाली बयानबाजी से ये साफ जाहिर भी होता रहा है।

अंबिकापुर में बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दे भी गरमाने शुरू हो गए हैं। सबसे बड़ा मुद्दा शिक्षा और स्वास्थ्य का है। हायर एजुकेशन में स्पेशलाइज्ड कोर्स ना होने की वजह से छात्रों को दूसरे बडे शहरों का रूख करना पड़ता है। अंबिकापुर शहर से 25 किलोमीटर दूर इंजीनियरिंग कॉलेज तो खोल दिया गया है, लेकिन वहां तक आने जाने की पर्याप्त सुविधा ना होने की वजह से छात्रों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 37 वर्षों से घुनघुट्टा बांध के प्रभावितों को मुआवजा दिलाने का श्रेय लेने के लिए बीजेपी और कांग्रेस में होड़ मची हुई है।

अंबिकापुर में कभी इस महल के आगे मदद की गुहार लगाने वाली जनता आज पूरे हक से अपनी आवाज बुलंद करती है। लेकिन राजतंत्र से लोकतंत्र तक इस लंबे सफर के बाद भी कुछ दुष्वारियां ऐसी हैं जिनका हल ना तो पहले निकल पाया था और ना ही आज निकल पा रहा है।

वेब डेस्क, IBC24