World Refugee Day: शरणार्थियों ने छत्तीसगढ़ के इस इलाके को दिलाई ‘मिनी बंगाल’ की पहचान, जानिए…

World Refugee Day: शरणार्थियों ने छत्तीसगढ़ के इस इलाके को दिलाई 'मिनी बंगाल' की पहचान, जानिए...

World Refugee Day: शरणार्थियों ने छत्तीसगढ़ के इस इलाके को दिलाई ‘मिनी बंगाल’ की पहचान, जानिए…
Modified Date: November 29, 2022 / 08:06 pm IST
Published Date: June 20, 2020 6:21 am IST

रायपुर। 20 जून यानि विश्व शरणार्थी दिवस। आज दिन उन लोगों को समर्पित है जो विपरीत परिस्थितियों में अपना देश या घरबार छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेते हैं। दरअसल यह दिवस उन लोगों के साहस, शक्ति और संकल्प के प्रति सम्मान जताने के लिए माना जाता है जो हिंसा, संघर्ष, युद्ध और प्रताड़ना के चलते अपना सब कुछ छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।

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बीसवीं सदी की शुरुवाद में ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने घोषणा किया था कि 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस के तौर पर मनाया जाएगा। तब से आज तक हिंसा, संघर्ष, युद्ध और प्रताड़ना के चलते अपना सब कुछ छोड़ने वालों के सम्मान में यह दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य वजह लोगों में जागरुकता फैलानी है कि कोई भी इंसान अमान्य नहीं होता फिर चाहे वह किसी भी देश का हो। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएचसीआर शरणार्थी लोगों की सहायता करती है। इसके तहत यूएनएचसीआर शरणार्थियों के लिए कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है और उनकी समस्याओं का लंबे वक्त से स्थायी समाधान तलाशता है, जिससे उन्हें या तो स्वेच्छा से अपने घरों में लौटने या अन्य देशों में बसने में मदद मिल सके। इसका उद्देश्य शरणार्थियों और अन्य जबरन विस्थापितों की मदद करना है जो शांति और गरिमा के साथ अपने जीवन का पुनर्निर्माण करते हैं।

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1947 से लेकर 1950 तक देश में पाकिस्तान से प्रताडि़त होकर सिंधी, पंजाबी और सिख समाज के लोग आए तो उनको बसाने का प्रयास किया गया। इन शरणार्थियों को देश के कई हिस्सों में बसाया गया है। देश की राजधानी दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में आज भी ये शरणार्थी रह रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में भी बसे हैं शरणार्थी
छत्तीसगढ़ में कई ऐसे हिस्से हैं, जहां बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हुए लोगों को विस्थापित किया गया है। पखांजूर के 295 गांव में से 133 इन बांग्लादेशी शरणार्थियों के लिए बसाए गए थे। 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की कुल 1.71 लाख की आबादी में से एक लाख लोग बांग्ला बोलते हैं। वहीं पखांजूर शहर की कुल 10,201 लोगों की आबादी में क़रीब 95 फ़ीसदी हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान से आए इन्हीं लोगों का है।

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नागरिकता कानून में संशोधन
नागरिकता संशोधन कानून 2019 में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और क्रिस्चन धर्मों के प्रवासियों के लिए नागरिकता के नियम को आसान बनाया गया है। पहले किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल से यहां रहना अनिवार्य था। इस नियम को आसान बनाकर नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 6 साल किया गया है यानी इन तीनों देशों के ऊपर उल्लिखित छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। आसान शब्दों में कहा जाए तो भारत के तीन मुस्लिम बहुसंख्यक पड़ोसी देशों से आए गैर मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने के नियम को आसान बनाया गया है।

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शरणार्थियों की वजह से मिली मिनी बंगाल की पहचान
बस्तर के घने जंगलों के बीच बसे नक्सल प्रभावित पखांजूर विकासखंड को इस इलाके में ‘मिनी बंगाल’ के नाम से जाना जाता है। बाहर से यहां पहुंचे लोगों को इस आदिवासी इलाके में खान-पान, रहन-सहन, भाषा-बोली को देख कर लगेगा कि वो बंगाल के किसी इलाके में पहुंच गए हैं।

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केंद्र सरकार ने 12 सितंबर 1958 को एक प्रस्ताव पारित कर पूर्वी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को तत्कालीन मध्यप्रदेश के बस्तर और उड़ीसा के मलकानगिरि में बसाने के लिए ‘दंडकारण्य परियोजना’ को मंजूरी दी थी। आंकड़े बताते हैं कि 31 अक्टूबर 1979 तक बस्तर के इलाके में 18,458 शरणार्थियों को बसाया गया। इन शरणार्थियों के लिए सिंचाई सुविधा, पेयजल आपूर्ति, ज़मीन सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा, सड़क निर्माण जैसे विकास के काम किए गए।


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