आय से अधिक संपत्ति मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले लोकसेवक की सुनवाई जरूरी नहीं : अदालत
आय से अधिक संपत्ति मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले लोकसेवक की सुनवाई जरूरी नहीं : अदालत
लखनऊ, 21 मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बृहस्पतिवार को अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति (डीए) के मामलों में मुकदमा दर्ज करने से पहले किसी सरकारी कर्मचारी से स्पष्टीकरण मांगना अनिवार्य नहीं है।
अदालत ने कहा कि अगर जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त ‘स्रोत सामग्री’ है जिससे कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तो अलग से प्रारंभिक जांच किए बगैर भी प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राथमिकी दर्ज करने के दौरान जांच अधिकारी की भूमिका सिर्फ यह सत्यापित करने तक सीमित है कि क्या उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया किसी अपराध के होने का खुलासा करती है और यह कि कोई आरोपी मामला दर्ज होने से पहले सुनवाई या स्पष्टीकरण के अधिकार का दावा नहीं कर सकता।
न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दीना नाथ यादव द्वारा दायर एक याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया।
यादव ने अपनी याचिका में डीए के मामले में अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे को रद्द करने की मांग की थी। यह प्राथमिकी 17 दिसंबर 2025 को लखनऊ सेक्टर के सतर्कता आयोग थाने में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(बी) और 13(2) के तहत दर्ज की गई थी।
मुकदमे के अनुसार सतर्कता जांच में पाया गया कि याचिकाकर्ता की आय के ज्ञात स्रोत से अर्जित संपत्ति लगभग 1.95 करोड़ रुपये थी, जबकि उसका खर्च लगभग 2.51 करोड़ रुपये था। इससे जाहिर होता है कि उसने लगभग 55 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च किये।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह तर्क दिया कि मुकदमा दर्ज होने से पहले उसकी आय और संपत्ति के संबंध में उससे कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया था। याची ने यह भी तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के 2021 के एक आदेश ने राज्य के अधिकारियों को उसकी संपत्ति का विवरण मांगने से रोक दिया था लिहाजा उसका स्पष्टीकरण प्राप्त किए बिना कार्यवाही शुरू करना अवैध था।
राज्य सरकार के वकील ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय पहले ही यह कानूनी स्थिति स्पष्ट कर चुका है कि किसी सरकारी कर्मचारी के पास कथित आय से अधिक संपत्ति के बारे में स्पष्टीकरण देने का प्राथमिकी से पहले का कोई अधिकार नहीं होता है।
पीठ ने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि प्राथमिकी दर्ज होने के चरण में जांच अधिकारी को केवल यह निर्धारित करने की जरूरत होती है कि क्या उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है।
भाषा सं सलीम गोला
गोला

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