मथुरा में सियासी सरगर्मी बढ़ा रहा यमुना जल के प्रदूषण का मुद्दा
मथुरा में सियासी सरगर्मी बढ़ा रहा यमुना जल के प्रदूषण का मुद्दा
मथुरा (उप्र), तीन मई (भाषा) यमुना नदी में बढ़ते प्रदूषण का मसला वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मथुरा में तेजी से एक अहम राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है और विपक्षी दल इस मामले पर सरकार को घेरने की लगातार कोशिशें कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के फरवरी 2026 के आंकड़े केसी घाट, विश्राम घाट और गोकुल बैराज जैसी अहम जगहों पर प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर पहुंचने की गवाही देते हैं।
इन सरकारी आंकड़ों के आधार पर यमुना के पानी के नमूनों का विश्लेषण करने वाले ‘बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी’ के के.पी. सिंह ने कहा, ”हालांकि तापमान और पीएच स्तर जैसे बुनियादी पैमाने स्वीकार्य सीमा के भीतर हैं लेकिन प्रदूषण के कई अहम संकेतक सुरक्षित मानकों से कहीं ज़्यादा हैं।”
उन्होंने कहा कि तीनों जगहों पर गंदगी, बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) का उच्च स्तर ‘नदी में भारी जैविक प्रदूषण’ को जाहिर करता है।
विश्लेषण के अनुसार, विश्राम घाट में सबसे ज़्यादा गंदगी और जीवाणुओं का संक्रमण पाया गया जिससे यह यमुना के प्रवाह क्षेत्र की सबसे प्रदूषित जगह बन गई है, वहीं गोकुल बैराज में घुलित ऑक्सीजन का स्तर बेहतर था लेकिन जैविक भार सबसे ज़्यादा था, जबकि केसी घाट में प्रदूषण का स्तर भी अधिक पाया गया।
रिपोर्ट में सभी जगहों पर मल-संबंधी कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की बहुत ज़्यादा मात्रा भी पाई गई, जो संकेत देता है कि सीवर का पानी भी इसमें मिल रहा है।
विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसी स्थितियां पानी को इंसानों के पीने के लिए असुरक्षित बनाती हैं और बिना उचित शोधन के इस पानी से नहाना भी जोखिम भरा है। उन्होंने कहा कि साथ ही यह जलीय जैव विविधता के लिए भी खतरा पैदा करता है जिससे केवल प्रदूषण सहन करने की अधिक क्षमता वाली प्रजातियां ही जिंदा रह पाती हैं।
निष्कर्षों में यह भी बताया गया है कि दिसंबर 2025, जनवरी 2026 और फरवरी 2026 में पानी की गुणवत्ता ‘डी’ श्रेणी में बनी रही, जो केवल जलीय जीवन के लिए ही उपयुक्त है।
रिपोर्ट में मलजल को उपचारित किये बगैर उसे नदी में बहाना, घाटों के किनारे बढ़ती मानवीय गतिविधियां और अपर्याप्त अपशिष्ट जल प्रबंधन प्रणालियों को इस गिरावट का कारण बताया गया है।
पर्यावरण कार्यकर्ता गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने कई अदालती आदेशों और नीतियों के बावजूद कार्यदायी संस्थाओं के ‘सुस्त रवैये’ को यमुना की इस हालत के लिए दोषी ठहराया।
उन्होंने कहा, ”पीतल की पॉलिशिंग और अन्य कार्यों में सफाई के लिए साइनाइड जैसे बेहद ज़हरीले रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है और फिर इस पानी को बिना उपचार किये नदी में बहा दिया जाता है।”
चतुर्वेदी ने कहा, ‘‘ शोधन संयंत्र, सीवेज को साफ करने के लिए बनाए जाते हैं, न कि रसायनों को साफ करने के लिये।”
उन्होंने कहा, ”रसायनों से भरे नदी के पानी को पीने योग्य बनाने के लिए क्लोरीन और फिटकरी से साफ करना व्यर्थ है, क्योंकि दोनों ही रसायनों को साफ नहीं कर सकते।”
चतुर्वेदी ने सख्त अनुपालन की भी मांग की और कहा कि जिन सीवेज उपचार संयंत्रों में नालियां पंपिंग स्टेशनों से जुड़ी हैं, वहां से किसी भी प्रकार का ओवरफ्लो नहीं होने दिया जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी पंकज यादव ने कहा, ”हालांकि यमुना का पानी जलीय जीवों के लिए ठीक है लेकिन साफ किये बगैर यह पीने लायक नहीं है। गोकुल बैराज के दूसरी तरफ जो झाग दिखाई देता है, वह मुख्य रूप से घरों में इस्तेमाल होने वाले डिटर्जेंट की वजह से होता है। जब पानी ऊंचाई से गिरता है, तो झाग बनता है। झाग का बनना तापमान के अंतर पर निर्भर करता है। इसलिए सर्दियों में यह ज्यादा दिखाई देता है।”
यादव ने बताया कि विभाग ने ‘तोड़िया’ इकाइयों को बंद करवाने के लिए एक विशेष अभियान चलाया है। उन्होंने बताया कि तोड़िया इकाई वे कारखाने होते हैं जहां चांदी और जिलेट के आभूषणों का काम होता है और इनमें अक्सर आभूषणों को चमकाने के लिये खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।
बहरहाल, यमुना नदी के प्रदूषण का यह मुद्दा अब सियासी रंग लेता जा रहा है और आगामी विधानसभा चुनाव में विपक्षी दल इसे जोर-शोर से उठाने की तैयारी कर रहे हैं।
कांग्रेस नेता प्रदीप माथुर ने कहा, ”दुर्भाग्य से, व्यापक भ्रष्टाचार की वजह से यह पवित्र नदी अब सीवेज का एक तालाब बन गई है। इसमें ‘टोटल कोलीफॉर्म’ और ‘फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया’ की संख्या खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है। नदी सिर्फ हथनीकुंड बैराज तक ही साफ रहती है। उसके बाद अगले 35 किलोमीटर तक यह लगभग ‘मृत’ हो चुकी है, क्योंकि हरियाणा सरकार इसमें पानी नहीं छोड़ती और उसके बाद यह इतनी प्रदूषित हो जाती है कि वहां से इसका ठीक होना नामुमकिन है। इस नदी में अब कोई भी ताजा पानी नहीं बचा है।”
उन्होंने कहा कि केंद्र के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकारें होने के बावजूद इस दिशा में कोई तालमेल भरा प्रयास नहीं किया गया।
माथुर ने पौराणिक महत्व की यमुना नदी के प्रदूषण को लेकर साधु-संतों की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, ”क्या वे नदी की इस हालत से खुश हैं?”
उन्होंने कहा कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में यमुना नदी के प्रदूषण का मामला एक बहुत बड़ा मुद्दा बनने वाला है।”
भाजपा की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल के नेता अशोक अग्रवाल ने इस मामले पर कहा, ‘‘ नदी के एक प्रमुख धार्मिक केंद्र यानी विश्राम घाट को सबसे ज़्यादा प्रदूषित जगह के तौर पर पहचाना गया है। दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु विश्राम घाट आकर यहां के जल का एक घूंट पीते हैं और यमुना में स्नान करते हैं। विश्राम घाट पर ही सबसे ज्यादा प्रदूषण होने से उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच रही है।”
उन्होंने कहा, ”हम उम्मीद करते हैं कि एक सनातनी सरकार तो कम से कम धार्मिक विरासत का ध्यान रखेगी।”
विश्राम घाट स्थित श्री यमुना मंदिर के एक सेवायत, संजय चतुर्वेदी ‘अल्पाइन’ ने कहा कि पानी की बिगड़ती गुणवत्ता का असर अब धार्मिक अनुष्ठानों पर भी पड़ने लगा है।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”नदी का पानी इतना प्रदूषित हो गया है कि अब इसका इस्तेमाल गोपाल जी और यमुना महारानी को स्नान कराने के लिए नहीं किया जाता। इसके बजाय हम कुएं के पानी का इस्तेमाल करते हैं।”
चतुर्वेदी ने कहा कि अब मंदिर में यमुना जी को प्रतिदिन इत्र से स्नान कराया जाता है और अब देवी को अर्पित करने के लिए नदी का पानी ‘झारी’ (लम्बी गर्दन वाला बर्तन) में जमा करके नहीं रखा जाता।
उन्होंने कहा, ”इससे चाँदी के बर्तन को नुकसान पहुंचता है और पानी में कीड़े पड़ जाते हैं।”
मथुरा की सांसद हेमा मालिनी ने इन चिंताओं का जवाब देते हुए कहा, ”यह सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि एक विरासत है। सरकार इस नदी की सफाई के लिये काम कर रही है।”
उन्होंने कहा, ”460 करोड़ रुपये की परियोजनाएं पहले ही पूरी हो चुकी हैं और लगभग 493 करोड़ रुपये की परियोजनाए स्वीकृत हो चुकी हैं जिन पर ‘नमामि गंगे’ परियोजना के तहत काम हो रहा है। मैंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ अपनी बैठकों में यह मुद्दा उठाया है और उन्होंने इस मामले में त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया है।”
मथुरा से भाजपा के विधायक एवं पूर्व मंत्री श्रीकांत शर्मा ने कहा, ”वर्ष 2017 में जब से भाजपा सरकार सत्ता में आई है, नदी की हालत में काफी सुधार हुआ है। हमने नालों को नदी में गिरने से रोकने और मसानी में एक बड़ा शोधन संयंत्र बनाने का फ़ैसला किया।शोधन संयंत्र से मिले अच्छे नतीजों के बाद, हमने बाकी बचे सभी नालों को रोकने पर काम शुरू कर दिया।”
उन्होंने दावा किया कि मथुरा के 23 में से 19 नाले और वृंदावन के 13 में से 11 नाले रोके जा चुके हैं। बाकी बचे नालों पर भी काम भी जल्द ही पूरा होने की उम्मीद है।
इस बीच, इंडियन ऑयल की मथुरा रिफाइनरी के अधिकारी मुकुल अग्रवाल ने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए रिफ़ाइनरी ने अपने मूलभूत ढांचे को उन्नत किया है।
उन्होंने कहा, ”रिफ़ाइनरी हानिकारक गैसों को अलग करने के लिए एक सोर वॉटर स्ट्रिपर यूनिट का इस्तेमाल करती है, जिससे अलग किए गए पानी को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है और ताजे पानी की खपत कम होती है।”
अग्रवाल ने यह भी बताया कि ‘रिवर्स ऑस्मोसिस’ समेत पानी के उपचार की तमाम व्यवस्थाएं भी मौजूद हैं।
वैज्ञानिक नतीजों से गंभीर प्रदूषण की बात सामने आने और राजनीतिक पार्टियों के एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच लोगों की आस्था से जुड़ी यमुना नदी की बुरी हालत वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले मथुरा में एक विवादित और भावनात्मक मुद्दा बनी रहने की संभावना है।
भाषा सं. सलीम शोभना
शोभना

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