दिमाग की गतिविधियां पढ़ने वाले उपकरण जल्द होंगे आम, नई पीढ़ी पर क्या होगा असर?

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दिमाग की गतिविधियां पढ़ने वाले उपकरण जल्द होंगे आम, नई पीढ़ी पर क्या होगा असर?

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  • Publish Date - September 2, 2026 / 04:12 PM IST,
    Updated On - September 2, 2026 / 04:12 PM IST

( जोस एम मुनोज, आईई यूनिवर्सिटी )

मैड्रिड, दो सितंबर (द कन्वरसेशन) दिमाग की गतिविधियों को पढ़ने वाले ईयरबड अब विज्ञान-कथा की बात नहीं रह गए हैं और जल्द ही रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन सकते हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि इन उपकरणों के आम होने से ऐसी पीढ़ी विकसित हो सकती है, जो बचपन से ही न्यूरोटेक्नोलॉजी के साथ बड़ी होगी।

न्यूरल तकनीक से जुड़े उपकरण बनाने वाली कंपनी ‘न्यूरेबल’ का दावा है कि उसके इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (ईईजी) सेंसर वाले हेडफोन थकान पर नजर रख सकते हैं और काम के दबाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। वहीं, ‘नेक्स्टसेंस’ के स्मार्टबड्स रात में दिमाग के विद्युत संकेतों को रिकॉर्ड कर नींद का विश्लेषण करते हैं और दिन में इन्हीं सेंसर की मदद से ये स्मार्टबड्स व्यक्ति के सबसे बेहतर प्रदर्शन वाले समय में कठिन काम तय करने में मदद करते हैं।

इस तकनीक में बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां भी रुचि ले रही हैं। एप्पल ने 2023 में ऐसे एयरपॉड्स के लिए पेटेंट आवेदन दायर किया था, जिनमें दिमाग की गतिविधियां मापने वाले इलेक्ट्रोड शामिल हैं। करोड़ों ईयरबड पहले ही इस्तेमाल किए जा रहे हैं और एप्पल के इस क्षेत्र में प्रवेश से ईईजी तकनीक बड़े पैमाने पर आम लोगों तक पहुंच सकती है।

खास बात यह है कि यह बदलाव बेहद सामान्य तरीके से हो रहा है। इसके लिए किसी चमकते हुए विशेष हेडसेट या बड़े उपकरण की जरूरत नहीं है। निकट भविष्य में किसी 10 वर्षीय बच्चे के लिए दिमाग की गतिविधियां मापने वाले ईयरबड किसी न्यूरोटेक्नोलॉजी जैसे नहीं, बल्कि सोने, पढ़ने या ध्यान केंद्रित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामान्य ईयरबड होंगे।

लेखक जोस एम. मुनोज के अनुसार, न्यूरोटेक्नोलॉजी अब प्रयोगशालाओं और अस्पतालों से निकलकर कार्यालयों, सड़कों और घरों तक पहुंच रही है। इससे ऐसा तकनीकी दौर बन रहा है जिसमें दिमाग जैविक व्यक्ति और डिजिटल प्रणालियों के बीच संपर्क का एक सामान्य माध्यम बन सकता है।

इस बदलाव के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जिसने वैज्ञानिकों और डेवलपरों को बिना शरीर में कोई उपकरण लगाए दिमाग की गतिविधियों से उपयोगी संकेत निकालने में सक्षम बनाया है। दूसरा, बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों का न्यूरल इंटरफेस में बढ़ता निवेश।

उदाहरण के लिए, मेटा ने 2025 में एक ऐसा रिस्टबैंड पेश किया था जो मांसपेशियों से जुड़े न्यूरोइलेक्ट्रिकल संकेतों को पढ़कर उसके नए चश्मे को नियंत्रित करने में मदद करता है।

लेखक का कहना है कि आज के कई बच्चे ऐसे समाज में बड़े होंगे जहां न्यूरोटेक्नोलॉजी रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा होगी। उन्हें ‘‘न्यूरोटेक्नोलॉजिकल नेटिव्स’’ कहा जा सकता है।

यह अवधारणा ‘डिजिटल नेटिव्स’ से मिलती-जुलती है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा हो सकता है। डिजिटल तकनीक ने अब तक स्क्रीन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिये हमारे व्यवहार और ध्यान को बाहर से प्रभावित किया है। न्यूरोटेक्नोलॉजी सीधे दिमाग की गतिविधियों को मापने, समझने और बदलने की क्षमता रखती है।

लेखक के अनुसार, यह सवाल उठाना जरूरी है कि लगातार ऐसी तकनीक के साथ बड़े होने का बच्चों की आत्म-पहचान, आत्म-नियंत्रण और व्यक्तित्व पर क्या असर पड़ेगा।

एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जब बच्चों के लिए बोलने के बजाय दिमाग के संकेतों को पढ़ने और मौन संचार के उपकरण उपलब्ध होंगे, तो उनके भीतर विकसित होने वाली ‘आंतरिक आवाज’ यानी इनर स्पीच किस तरह बदलेगी।

लेखक के मुताबिक, इस बदलाव से जुड़े कई सवालों पर अभी पर्याप्त शोध नहीं हुआ है। इनमें यह समझना शामिल है कि रोजमर्रा के उपकरणों में न्यूरोटेक्नोलॉजी को सुरक्षित तरीके से कैसे शामिल किया जाए और दिमाग से मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल कैसे किया जाए।

इसके अलावा, यह भी तय करना होगा कि इन तकनीकों तक किसकी पहुंच होगी और क्या इससे समाज में एक नया ‘न्यूरोटेक्नोलॉजी विभाजन’ पैदा होगा।

कुछ कार्यस्थलों में, मसलन खनन उद्योग में, कर्मचारी पहले से ही थकान पर नजर रखने वाले ईईजी उपकरण पहन रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि इसके प्रभावों पर अधिक शोध होने और नियम बनने का इंतजार नहीं किया जा सकता।

लेखक का कहना है कि जिस तरह इंटरनेट से पहले की दुनिया में पले लोगों से अलग ‘डिजिटल नेटिव्स’ की पहचान बनी, उसी तरह जल्द ही न्यूरोटेक्नोलॉजी के साथ बड़े होने वाले लोगों की एक नई श्रेणी सामने आ सकती है। इस नई आबादी को समय रहते पहचानना जरूरी है ताकि उससे जुड़े शोध, नैतिक सवालों और नियमन पर पहले से विचार किया जा सके।

द कन्वरसेशन

मनीषा संतोष

संतोष