Iran Israel War: युद्ध के बीच खाड़ी देशों में फूट! यूएई चाहता था ईरान पर संयुक्त हमला, लेकिन इन देशों ने नहीं दिया साथ, पढ़िए क्या है पूरा मामला
Iran Israel War: ईरान को लेकर खाड़ी देशों के बीच बड़े मतभेद सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब यूएई ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को ईरान के खिलाफ एकजुट करने की कोशिश की थी।
middle east/ image source: wikimedia
- यूएई चाहता था संयुक्त हमला
- सऊदी-कतर ने दूरी बनाई
- ईरान ने दागे ड्रोन-मिसाइल
Iran Israel War: ईरान को लेकर खाड़ी देशों के बीच बड़े मतभेद सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब यूएई ने पूरे खाड़ी क्षेत्र को ईरान के खिलाफ एकजुट करने की कोशिश की थी। हालांकि, उसे इसमें ज्यादा सफलता नहीं मिली और कई देशों ने सीधे सैन्य कार्रवाई से दूरी बना ली।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में हुए बड़े खुलासे
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने कई खाड़ी नेताओं से बातचीत की और खास तौर पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मिलकर ईरान के खिलाफ सामूहिक जवाबी कार्रवाई की अपील की। यूएई का मानना था कि अगर सभी खाड़ी देश एकजुट होकर खड़े होंगे तो ईरान पर दबाव बनेगा और वह आगे हमले करने से डरेगा।
दरअसल, अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल हमले किए थे। इन हमलों में बंदरगाह, एयरपोर्ट, होटल और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया। साथ ही होर्मुज स्ट्रेट प्रभावित होने से तेल और गैस सप्लाई पर असर पड़ा, जिससे खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूएई इस पूरे संकट को सिर्फ एक देश का मामला नहीं, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मान रहा था। यूएई नेतृत्व ने यह भी याद दिलाया कि 1981 में गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) का गठन भी क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान से पैदा होने वाले खतरों को देखते हुए किया गया था।
सऊदी अरब का रुख अलग
हालांकि, सऊदी अरब का रुख इससे अलग रहा। सऊदी नेतृत्व नहीं चाहता था कि हालात और ज्यादा बिगड़ें। इसलिए उसने सीधे सैन्य कार्रवाई की बजाय सुरक्षा और बचाव की रणनीति पर ज्यादा ध्यान दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब को आशंका थी कि यूएई का आक्रामक रुख क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा सकता है।
इसी बीच खबर यह भी सामने आई कि मार्च और अप्रैल के दौरान यूएई ने अकेले ही ईरान पर कुछ सीमित हमले किए। इससे यूएई और सऊदी अरब के रिश्तों में और तनाव बढ़ गया। दोनों देशों के बीच पहले से ही यमन और सूडान जैसे मुद्दों को लेकर मतभेद बताए जा रहे हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बाद में यूएई ने नाराज होकर ओपेक छोड़ने का फैसला भी लिया। माना जा रहा है कि ईरान युद्ध और खाड़ी देशों के बीच बढ़ती असहमति इसकी बड़ी वजह रही।
युद्ध के दौरान यूएई सबसे ज्यादा निशाने पर रहा
युद्ध के दौरान यूएई सबसे ज्यादा निशाने पर रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने यूएई पर करीब 3,000 ड्रोन और मिसाइल दागे, हालांकि अधिकतर हमलों को एयर डिफेंस सिस्टम ने नाकाम कर दिया। हाल ही में ईरान ने यूएई के फुजैराह तेल बंदरगाह को भी निशाना बनाया।
इस पूरे संकट के दौरान इजरायल और यूएई ने मिलकर काम किया। दोनों देशों ने खुफिया जानकारी साझा की और मिसाइल हमलों को रोकने के लिए सहयोग किया। इजरायल ने यूएई को आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य सहायता भी उपलब्ध कराई।
कुवैत, बहरीन और ओमान ने बचने की कोशिश की
दूसरी ओर कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान ने सीधे युद्ध में शामिल होने से बचने की कोशिश की। कतर ने अपने गैस प्लांट पर हमले के बाद जवाबी कार्रवाई पर विचार किया, लेकिन बाद में तनाव कम करने का रास्ता चुना।
रिपोर्ट के अनुसार, उस समय अमेरिकी प्रशासन चाहता था कि सऊदी अरब और कतर भी ईरान के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई में शामिल हों। लेकिन इन देशों को डर था कि इससे ईरान उनके यहां मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकता है। इसी कारण उन्होंने सीधे युद्ध से दूरी बनाए रखना बेहतर समझा।

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