चेरनोबिल त्रासदी के 40 वर्ष बाद अपने पर्यावासों की ओर लौटते पशुओं की झलक दिखाता उपन्यास
चेरनोबिल त्रासदी के 40 वर्ष बाद अपने पर्यावासों की ओर लौटते पशुओं की झलक दिखाता उपन्यास
( निक डुन, लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी )
लैंकेस्टर (ब्रिटेन), 23 अप्रैल (द कन्वरसेशन) लेखक ई.जे. स्विफ्ट के उपन्यास ‘व्हेन देयर आर वुल्व्स अगेन’ में चेरनोबिल आपदा और उसके प्रभावों को एक ऐसे निकट भविष्य में प्रस्तुत किया गया है, जहां प्राकृतिक आवास कमजोर और अस्थिर हो चुके हैं और वन्यजीवों पर इनका असर पड़ रहा है।
यह पर्यावरण आधारित गल्प कृति उन संभावित रास्तों की पड़ताल करती है, जिनके जरिए जानवर एक क्षतिग्रस्त प्राकृतिक क्षेत्र में वापस लौट सकते हैं। वास्तविक दुनिया में भी इसी तरह की एक समानांतर कहानी सामने आई है, जहां अनुपयुक्त एवं पूर्व परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के आसपास प्रकृति फल-फूल रही है।
यूक्रेन स्थित पूर्व चेरनोबिल संयंत्र के आसपास यह स्थिति विशेष रूप से स्पष्ट है, जहां मानव गतिविधियों की अनुपस्थिति ने लगातार विकिरण के बावजूद वन्यजीवों को पनपने का अवसर दिया है। परमाणु दुर्घटना के 40 वर्ष बाद भी यहां जैव विविधता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
वर्ष 1986 में हुई इस दुर्घटना के बाद 2,600 वर्ग किलोमीटर के दायरे में ‘बहिष्करण क्षेत्र’ स्थापित हो गया था। इस हादसे में रेडियोधर्मी बादल पूरे यूरोप में फैल गये थे और करीब 1,15,000 लोगों को विस्थापित होनाा पड़ा था। शुरुआती चरण में ही विकिरण विषाक्तता के कारण 31 संयंत्र कर्मियों और दमकलकर्मियों की मौत हो गई थी।
चेरनोबिल बहिष्करण क्षेत्र (सीईजेड) में लोगों के रहने, व्यावसायिक गतिविधियों, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और सार्वजनिक पहुंच पर प्रतिबंध है। 1986 के बाद से यह क्षेत्र अनजाने में एक समृद्ध वन्यजीव अभयारण्य और विशाल ‘रीवाइल्डिंग प्रयोगशाला’ में बदल गया है, जहां बड़े स्तनधारी प्राणियों की आबादी तेजी से बढ़ी है।
यहां भेड़िये, लोमड़ी, यूरेशियन लिंक्स, एल्क और जंगली सूअर की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि भूरे भालू और यूरोपीय वन भैंसे जैसी प्रजातियां भी लौट आई हैं। यह ‘रीवाइल्डिंग’ का एक चरम उदाहरण स्पष्ट है, जहां मानव हस्तक्षेप की अनुपस्थिति ने कई अप्रत्याशित प्रभाव पैदा किए हैं।
अध्ययनों से संकेत मिलता है कि मनुष्य द्वारा शिकार, कृषि और विकास गतिविधियों के अभाव का पशुओं पर विकिरण के नकारात्मक प्रभाव से अधिक सकरात्मक प्रभाव है। बेलारूस के एक हिस्से में बड़े स्तनधारियों की आबादी गैर-प्रदूषित अभयारण्यों के बराबर या उससे अधिक पाई गई है।
हालांकि, प्रारंभिक विकिरण ने वनस्पति और जीव-जंतुओं को भारी नुकसान पहुंचाया था, विशेष रूप से ‘रेड फॉरेस्ट’ क्षेत्र में, जो संयंत्र के पास लगभग 10 वर्ग किलोमीटर का इलाका है। यहां पेड़ अत्यधिक विकिरण सोखने के कारण लाल-भूरे रंग के हो गए थे। फिर भी, दीर्घकालिक अध्ययनों से पता चलता है कि मानव अनुपस्थिति में जैव विविधता बढ़ी है।
दुर्लभ प्रजातियों की वापसी
बहिष्करण क्षेत्र में कई संकटग्रस्त प्रजातियां वापस लौटी हैं। इनमें प्रज्वाल्स्की घोड़े शामिल हैं, जिन्हें 1998 में संरक्षण प्रयोग के तहत यहां छोड़ा गया था और अब उनकी संख्या 150 से अधिक हो चुकी है।
यूरेशियन लिंक्स और यूरोपीय वन भैंसे पहले इस क्षेत्र से गायब हो गए थे, लेकिन वह अब फिर से यहां बस चुके हैं। काले सारस, सफेद सारस और सफेद पूंछ वाले गरुड़ जैसे कई पक्षी भी लौट आए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण वापसी वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त ‘ग्रेटर स्पॉटेड ईगल’ की मानी जा रही है, जो आर्द्रभूमि में रहता है और मानव हस्तक्षेप के प्रति बेहद संवेदनशील है। परमाणु दुर्घटना के समय यह क्षेत्र से गायब हो गया था।
वर्ष 2019 में अध्ययन स्थल पर इसके चार जोड़े दर्ज किए गए थे, जबकि बेलारूस के हिस्से में कम से कम 13 जोड़ों के घोंसले पाए गए। वर्तमान में यह क्षेत्र दुनिया का एकमात्र स्थान है, जहां इस दुर्लभ प्रजाति की आबादी बढ़ रही है।
मेंढकों के रंग में बदलाव
वैज्ञानिक प्रमाण यह भी बताते हैं कि कुछ प्रजातियां विकिरणीय वातावरण के अनुकूल हो रही हैं। उदाहरण के तौर पर, इस क्षेत्र के पेड़ में रहने वाले मेंढकों का रंग अधिक गहरा हो गया है, क्योंकि मेलानिन का अधिक स्तर उन्हें विकिरण से बचाने में मदद करता है।
इसी तरह, यूरेशियन भेड़ियों पर किए गए शोध से संकेत मिलता है कि उनमें दीर्घकालिक विकिरण के प्रभावों से बचने और कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए जैविक अनुकूलन विकसित हो सकता है।
यह अनुकूलन केवल जानवरों तक सीमित नहीं है। वर्ष 1991 में रिएक्टर-4 के अंदर एक काले फंगस की खोज की गई थी, जो मेलानिन का उपयोग कर गामा विकिरण को ऊर्जा में बदलता है और सामान्य से तेज गति से बढ़ता है।
इसके अलावा, आसपास के क्षेत्रों में कुछ पौधों में उच्च विकिरण स्तर के जवाब में डीएनए मरम्मत की क्षमता विकसित होती दिखी है। इससे यह संकेत मिलता है कि वनस्पति ने विकिरण और भारी धातुओं से निपटने की क्षमता विकसित कर ली है।
आज यह क्षेत्र यूरोप के सबसे बड़े प्राकृतिक अभयारण्यों में से एक बन चुका है और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है, विशेषकर यह समझने के लिए कि बिना मानव हस्तक्षेप के पारिस्थितिकी तंत्र कैसे पुनर्जीवित होते हैं।
हालांकि, इस आपदा के सभी प्रभाव सकारात्मक नहीं रहे हैं। कुछ प्रजातियों में प्रजनन क्षमता में कमी और उच्च उत्परिवर्तन दर देखी गई है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी सामने आई हैं।
चेरनोबिल ही नहीं, बल्कि जापान के फुकुशिमा जैसे अन्य परमाणु प्रभावित क्षेत्रों में भी भालू, रैकून और जंगली सूअर जैसे स्तनधारी बड़ी संख्या में लौट आए हैं, जिससे ये बहिष्करण क्षेत्र अनपेक्षित रूप से वन्यजीव अभयारण्य बन गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति जटिल है और इससे स्पष्ट होता है कि पारिस्थितिकी तंत्र बिना मानव हस्तक्षेप के भी पुनर्जीवित हो सकता है। हालांकि, इसके लिए यह नहीं मान लिया जाए कि कोई परमाणु आपदा हो, तभी ऐसा होगा।
चेरनोबिल के आसपास वन्यजीवों की वापसी मुख्य रूप से मानव अनुपस्थिति के कारण हुई है, हालांकि यह प्रक्रिया पूरी तरह समान नहीं रही है या इसका पूरी तरह पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, यह बताती है कि जब सामान्य परिस्थितियां बदल जाती हैं, तब भी पारिस्थितिकी तंत्र अनुकूल होकर फल-फूल सकता है।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा वैभव
वैभव

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