हमारी एकमात्र उम्मीद सुरंग के अंदर: बाढ़ में लापता हुए पनबिजली कर्मियों के परिजन कर रहे प्रतीक्षा
हमारी एकमात्र उम्मीद सुरंग के अंदर: बाढ़ में लापता हुए पनबिजली कर्मियों के परिजन कर रहे प्रतीक्षा
नुवाकोट (नेपाल), एक सितंबर (भाषा) बीस साल के अनुष गुरुंग अपने 60 वर्षीय पिता लक्ष्मण की तलाश कर रहे हैं, जो 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ के बाद नेपाल के रसुवा जिले में ‘अपर त्रिशूली-1’ पनबिजली परियोजना क्षेत्र से लापता हैं।
उस दिन अनुष की अपने पिता से आखिरी बातचीत सुबह करीब 8 बजे हुई थी। फिर अचानक बाढ़ आ गई और लक्ष्मण लापता हो गए।
‘द काठमांडू पोस्ट’ की मंगलवार की खबर के अनुसार, लक्ष्मण के सहकर्मियों से परिवार को अलग-अलग बातें सुनने को मिली हैं। ये बातें इस बारे में हैं कि जब इलाके में बाढ़ आई, तो उस समय लक्ष्मण सुरंग के अंदर थे या नहीं।
अनुष ने अख़बार से कहा, “हम किस पर यकीन करें? अगर सुरंग की तलाशी ली जाए, तो हमें पक्का पता चल जाएगा। अब हमारी एकमात्र उम्मीद सुरंग के अंदर है।”
नेपाल की ‘इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन’ के अनुसार, 11 पनबिजली परियोजनाओं में काम करने वाले 600 से अधिक लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है।
लापता कर्मचारियों के परिवार अधिकारियों पर खोज तेज़ करने का दबाव बना रहे हैं, जबकि बचाव दल सुरंगों से कीचड़ और मलबा हटाने में जूझ रहे हैं।
‘द काठमांडू पोस्ट’ के अनुसार, नुवाकोट में ‘अपर त्रिशूली-3बी’ परियोजना पर काम करने वाले कम से कम 122 लोग लापता हैं, जिनमें 58 वर्षीय कमल बहादुर पांडे भी शामिल हैं; और उनके बेटे विवेक पांडे उन्हें ढूंढ़ रहे हैं।
बिदुर में सेना के बचाव और राहत केंद्र में रिश्तेदार एकत्र हुए और अधिकारियों पर खोज तेज करने का दबाव डाला। कई दिनों के दबाव के बाद, सोमवार को घटनास्थल पर एक खुदाई मशीन लाई गई।
विवेक ने अख़बार से कहा, ‘‘अगर खुदाई शुरू होती है, तो क्वार्टर पर जमी रेत हटाई जा सकती है। हमें अब भी उम्मीद है।’’
यह स्पष्ट नहीं है कि बाढ़ आने के समय कमल बहादुर सुरंग के अंदर थे या नहीं।
अखबार के अनुसार, सीता पांडे का मानना है कि ‘अपर त्रिशूली-3ए’ परियोजना में उनके पति जिबलाल अधिकारी उन 30 से 40 लोगों में शामिल हो सकते हैं, जिनके परियोजना के भूमिगत बिजलीघर में फंसे होने की आशंका है।
अधिकारी आम तौर पर कुलेखानी परियोजना में काम करते थे, लेकिन वार्षिक रखरखाव के दौरान मशीनरी का निरीक्षण करने के लिए ‘अपर त्रिशूली-3ए’ गए थे।
सीता ने अख़बार से कहा, ‘‘क्योंकि वहाँ ऑक्सीजन प्रणाली है, इसलिए मुझे 50 प्रतिशत उम्मीद है कि वह ज़िंदा हैं। लेकिन जैसे-जैसे हर घंटा गुज़र रहा है, वह उम्मीद कम होती जा रही है।’’
कई अन्य लोगों की कहानी भी ऐसी है जिन्हें अब भी किसी चमत्कार से अपनों के जीवित मिलने की उम्मीद है।
भाषा नेत्रपाल अविनाश
अविनाश

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