प्राचीन समय में ‘ब्रेसेस’ संबंधी मिथक: हमारे पूर्वजों को दांत सीधा करने की जरूरत क्यों नहीं पड़ी
प्राचीन समय में ‘ब्रेसेस’ संबंधी मिथक: हमारे पूर्वजों को दांत सीधा करने की जरूरत क्यों नहीं पड़ी
(सरोश शाहिद, क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन)
लंदन, तीन जनवरी (द कन्वरसेशन) प्राचीन मिस्र और एट्रस्कन सभ्यता के लोगों ने दंत संरेखण विज्ञान (ऑर्थोडॉन्टिक्स) की शुरुआत की थी और वे दांतों को सीधा करने के लिए सोने के पतले तार और कैटगट (प्राकृतिक धागे जैसे पदार्थ) का इस्तेमाल करते थे।
यह एक ऐसी कहानी है जो दशकों से दंत विज्ञान की किताबों में छपती आ रही है, जिसमें हमारे पूर्वजों को आदर्श मुस्कान पाने की चाहत के लिहाज से हैरतअंगेज तरीके से काफी आधुनिक दिखाया गया है। लेकिन जब पुरातत्वविदों और दंत इतिहासकार ने अंततः साक्ष्यों की गहन जांच की, तो उन्होंने पाया कि उनमें से अधिकांश मिथक हैं।
लगभग 2500 ईसा पूर्व की मिस्र के अल-क्वाट्टा कृत्रिम दंत (डेंटल ब्रिज) को ही लीजिए। प्राचीन अवशेषों के साथ मिले सोने के तार का काम वैसा नहीं था, जैसा हम सोचते थे।
दांतों को संरेखित करने के बजाय, ये तार ढीले दांतों को स्थिर कर रहे थे या बदले हुए दांतों को अपनी जगह पर टिकाए रख रहे थे। दूसरे शब्दों में, ये कृत्रिम दांतों की तरह काम कर रहे थे, न कि ब्रेसेस (दांत संरेखित करने का उपकरण) की तरह।
एट्रस्कन सभ्यता (प्राचीन इटली की एक सभ्यता) के लोगों की कब्रों में मिली सोने की पट्टियां भी कुछ ऐसी ही कहानी कहती हैं। ये शायद मसूड़ों की बीमारी या चोट से ढीले हुए दांतों को सहारा देने के लिए बनाई गई दंत पट्टियां थीं, न कि दांतों को नयी स्थिति में लाने के उपकरण।
एट्रस्कन सभ्यता के लोगों के उपकरणों पर किए गए परीक्षणों से पता चला कि उनमें इस्तेमाल किया गया सोना 97 प्रतिशत शुद्ध था, और शुद्ध सोना काफी नरम होता है।
यह बिना टूटे आसानी से मुड़ और खिंच सकता है, जो इसे दंत संरेखण विज्ञान के लिहाज से अनुपयोगी बनाता है। ब्रेसेस लंबे समय तक निरंतर दबाव डालकर काम करते हैं, जिसके लिए एक मजबूत और लचीली धातु की आवश्यकता होती है। शुद्ध सोना ऐसा नहीं कर सकता।
दांत को सीधा करने के लिए इसे अधिक कसने की कोशिश करें तो यह विकृत हो जाएगा या टूट जाएगा।
यह भी एक दिलचस्प सवाल है कि इन सोने की पट्टियों को कौन पहनता था। कई पट्टियां महिलाओं के कंकालों के साथ मिलीं, जिससे पता चलता है कि वे चिकित्सा उपकरण के बजाय प्रतिष्ठा के प्रतीक या सजावटी आभूषण रहे होंगे।
खास बात यह है कि इनमें से कोई भी पट्टी बच्चों या किशोरों के मुंह में नहीं मिली।
शायद सबसे रोचक खुलासा यह है कि प्राचीन लोगों को दांतों की वैसी समस्याएं नहीं थीं जैसी हमें आज होती हैं।
दांतों का टेढ़ा-मेढ़ा होना (मैलोकक्लूजन), जो आजकल आम है, अतीत में दुर्लभ था। पाषाण युग की खोपड़ियों के अध्ययन से पता चलता है कि उनमें लगभग कोई टेढ़ापन नहीं था। इसका कारण आहार है।
हमारे पूर्वज कठोर, रेशेदार भोजन खाते थे जिन्हें चबाने में काफी मेहनत लगती थी। जबड़े के इस लगातार इस्तेमाल से मजबूत और बड़े जबड़े विकसित हुए जो उनके सभी दांतों को समायोजित करने में पूरी तरह सक्षम थे।
इसके विपरीत, आधुनिक आहार नरम और प्रसंस्कृत होता है, जिससे हमारे जबड़ों को बहुत कम व्यायाम मिलता है। नतीजा? हमारे जबड़े अक्सर हमारे पूर्वजों के जबड़ों से छोटे होते हैं, जबकि हमारे दांतों का आकार वही रहता है, जिससे आज हमें दांतों में टेढ़ापन दिखाई देता है।
चूंकि प्राचीन काल में टेढ़े-मेढ़े दांत लगभग नहीं के बराबर थे, इसलिए उन्हें सीधा करने के तरीकों को विकसित करने का कोई कारण नहीं था।
फिर भी, प्राचीन लोग कभी-कभी दांतों की अनियमितताओं के लिए सरल उपचार करने का प्रयास करते थे। प्राचीन रोम निवासी लोगों द्वारा वास्तविक दंत संरेखण संबंधी चिकित्सा का सबसे प्रारंभिक विश्वसनीय संदर्भ मिलता है।
* वैज्ञानिक दंत संरेखण चिकित्सा
वास्तविक वैज्ञानिक दंत संरेखण चिकित्सा की शुरुआत 1728 में फ्रांसीसी दंत चिकित्सक पियरे फॉचर्ड के कार्यों से हुई। आधुनिक दंत चिकित्सा के जनक कहे जाने वाले फॉचर्ड ने दो खंडों वाली एक ऐतिहासिक पुस्तक ‘द सर्जन डेंटिस्ट’ प्रकाशित की जिसमें विकृत दंत विन्यास के उपचार का पहला विस्तृत विवरण दिया गया था।
उन्होंने ‘बैंड्यू’ (एक घुमावदार धातु की पट्टी जिसे दांतों के चारों ओर लपेटकर दंत चाप को चौड़ा किया जाता है) विकसित किया। यह दांतों को नियंत्रित बल का उपयोग कर स्थानांतरित करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया पहला उपकरण था।
फॉचर्ड ने दांतों को पुनःस्थापित करने के बाद उन्हें सहारा देने के लिए धागों के उपयोग का भी वर्णन किया। उनके कार्य ने प्राचीन मिथकों और दर्दनाक प्रयोगों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित किया, जिससे अंततः आधुनिक ‘ब्रेसेस’ समेत स्पष्ट संरेखण करने वाले उपकरणों का विकास हुआ।
19वीं और 20वीं शताब्दियों में दंत चिकित्सा में हुई प्रगति के साथ दंत संरेखण विज्ञान एक विशेषज्ञता का क्षेत्र बन गया। धातु के ‘ब्रैकेट’, ‘आर्चवायर’, ‘इलास्टिक’ और अंततः ‘स्टेनलेस स्टील’ ने उपचार को उम्मीद के अनुरूप बना दिया।
बाद के नवाचारों जैसे कि ‘सिरेमिक ब्रैकेट’, ‘लिंगुअल ब्रेसेस’ और ‘क्लियर एलाइनर’ ने प्रक्रिया को अधिक जटिल बना दिया। आज दंत संरेखण विज्ञान में डिजिटल स्कैन, कंप्यूटर मॉडल और 3डी प्रिंटिंग का उपयोग करके उपचार की योजना बेहद सटीक तरीके से बनाई जाती है।
प्राचीन लोगों द्वारा सोने और ‘कैटगट’ से बने ‘ब्रेसेस’ पहने जाने की छवि बेशक आकर्षक और नाटकीय है, लेकिन यह साक्ष्य से मेल नहीं खाती।
प्राचीन सभ्यताएं दंत समस्याओं से अवगत थीं और कभी-कभी सरल समाधानों का प्रयास भी करती थीं। फिर भी उन्हें न तो दांतों को स्थानांतरित करने की जरूरत थी और न ही उनके पास वैसी तकनीक थी जो आज हमारे पास है।
दंत संरेखण विज्ञान की असली कहानी प्राचीन दुनिया में नहीं बल्कि 18वीं सदी और उसके बाद वैज्ञानिक खोजों से शुरू होती है। यह एक ऐसा इतिहास है जो बिना किसी मिथक के काफी दिलचस्प है।
(द कन्वरसेशन)
संतोष अविनाश
अविनाश

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