बच्चों और स्कूलों को निशाना बनाने वालों को हर हाल में जवाबदेह ठहराया जाए : भारत
बच्चों और स्कूलों को निशाना बनाने वालों को हर हाल में जवाबदेह ठहराया जाए : भारत
(योषिता सिंह)
संयुक्त राष्ट्र, 26 जून (भाषा) भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में कहा कि जवाबदेही के बिना बच्चों की सुरक्षा का प्रयास अधूरा है और जो लोग दंड के भय के बिना स्कूलों और बच्चों को निशाना बनाते हैं, उन्हें हर हाल में उनके कृत्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वतनेनी ने कहा, ‘‘ शिक्षा एक ऐसा मौलिक अधिकार है, जो संघर्ष और युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी कायम रहना चाहिए। इसे पाना स्थायी शांति स्थापित करने की सबसे प्रभावी नींवों में से एक है। सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित बच्चों की सुरक्षा तथा उनके सीखने, विकसित होने और अपनी पूरी क्षमता हासिल करने के अधिकार की रक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता अटूट है।’
वह बुधवार को यहां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली चर्चा ‘‘सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित बच्चों की शिक्षा की रोकथाम और सुरक्षा को मजबूत बनाना : नीतिगत प्रतिबद्धताओं से प्रभावी क्रियान्वयन तक’’ विषय पर अपने विचार रख रहे थे।
राजदूत पर्वतनेनी ने कहा, ‘‘सुरक्षा तभी सार्थक है, जब उसके साथ जवाबदेही भी सुनिश्चित हो। जो लोग दंड के भय के बिना स्कूलों और बच्चों को निशाना बनाते हैं, उन्हें उनके अपराधों के लिए कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए।’
‘‘बच्चे और सशस्त्र संघर्ष’’ पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में सशस्त्र संघर्षों के दौरान बच्चों के अधिकारों के गंभीर हनन चौंकाने वाले स्तर पर पहुंच गए और अभूतपूर्व संख्या में बच्चे इनका शिकार बने।
रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2025 में बच्चों के अधिकारों के 38,558 गंभीर उल्लंघनों की पुष्टि की, जिनसे 24,174 बच्चे प्रभावित हुए। इनमें 15,493 लड़के, 7,990 लड़कियां और 691 ऐसे बच्चे शामिल थे, जिनकी लैंगिग पहचान स्पष्ट नहीं हो सकी। यह संयुक्त राष्ट्र के इस निगरानी अभियान की शुरुआत के बाद से गंभीर उल्लंघनों से प्रभावित बच्चों की अब तक की सर्वाधिक संख्या है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि गंभीर उल्लंघनों का शिकार बनने वाले बच्चों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। यह आंकड़ा 2024 में 3,137 था जो बढ़कर 2025 में 3,176 हो गया।
भारत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव की वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट ‘बच्चे और सशस्त्र संघर्ष’ बेहद चिंताजनक आंकड़े सामने रखती है। रिपोर्ट के अनुसार, स्कूलों पर हमलों में केवल एक वर्ष के भीतर 44 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
पर्वतनेनी ने कहा कि दुनिया भर में करीब 47.3 करोड़ बच्चे-यानी हर छह में से एक बच्चा-या तो संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में रह रहा है या वहां से पलायन करने को मजबूर है। इनमें से 8.5 करोड़ से अधिक बच्चे शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा से पूरी तरह वंचित हैं।
उन्होंने कहा, ‘ये आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि हम सामूहिक रूप से अपनी प्रतिबद्धताओं को ज़मीनी हकीकत में बदलने में असफल रहे हैं।’
यह रेखांकित करते हुए कि किसी बच्चे की शिक्षा की रक्षा करना, वास्तव में किसी राष्ट्र के भविष्य की रक्षा करना है, पर्वतनेनी ने कहा कि बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और उन्हें बढ़ावा देने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकारों की है और उन्हें अपने दायित्वों का पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत में शिक्षा का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है, जो 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। सभी तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए भारत ने दीक्षा (डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग) नामक राष्ट्रीय डिजिटल मंच विकसित किया है।
उन्होंने कहा, ‘सस्ती, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की हमारी घरेलू प्रतिबद्धता ही इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारे दृष्टिकोण और सहभागिता का आधार भी है।’
उन्होंने कहा कि भारत ने विशेष रूप से कोविड-19 महामारी जैसे समय में, जब स्कूलों में प्रत्यक्ष पढ़ाई बाधित हो गई थी, डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने के प्रभावी माध्यम के रूप में किया।
पर्वतनेनी ने कहा, ‘हमारे अनुभव ने यह सिद्ध किया है कि संघर्ष की परिस्थितियों में भी डिजिटल शिक्षा बच्चों और पढ़ाई के बीच एक मजबूत सेतु का काम कर सकती है।’
उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध और हिंसा का सबसे अधिक दुष्प्रभाव झेल रहे बच्चों की शिक्षा में निवेश करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत ने अपने पड़ोसी देशों से आए शरणार्थियों और विस्थापित समुदायों के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए निरंतर निवेश किया है, क्योंकि हमारा मानना है कि शिक्षा की निरंतरता ही उन्हें कठिन परिस्थितियों से उबरने और भविष्य के प्रति आशावान बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है।’’
भाषा शोभना रंजन
रंजन

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