ततैया-मेंढक अपने विष में महत्वपूर्ण दर्द अणु का लगातार करते रहते हैं विकास
ततैया-मेंढक अपने विष में महत्वपूर्ण दर्द अणु का लगातार करते रहते हैं विकास
(सैम रॉबिन्सन, द यूनिवर्सिटी ऑफ क्वीन्सलैंड)
ब्रिसबेन, आठ मार्च (द कन्वरसेशन) अगली बार जब आपके पैर के अंगूठे में चोट लगे, सुई चुभ जाए, या पियानो के कवर में आपकी उंगली फंस जाएं, तो शायद आप एक पल रुककर इस बात पर विचार करें कि हमारा शरीर ऐसी चोटों को कितनी अद्भुत तरीके से ठीक कर लेता है।
चोट लगते ही, हमारे शरीर में मौजूद कई तरह के अणु सक्रिय हो जाते हैं और अपना काम शुरू कर देते हैं।
ये अणु रक्तस्राव को रोकने, त्वचा में दरारों को भरने, हमारे प्रतिरक्षा तंत्र (इम्युन सिस्टम) को घाव को साफ रखने का संकेत देने का काम शुरू कर देते हैं।
ऐसा ही एक अणु है ‘ब्रैडीकिनिन’।
यह सभी जीवों में पाया जाता है, जिनमें स्तनधारी, सरीसृप, पक्षी और मछलियां शामिल हैं लेकिन यह ततैये के जहर और मेंढक के जहरीले त्वचा स्राव में भी मौजूद होता है।
‘ब्रैडीकिनिन’ के कार्य में ये स्पष्ट विसंगतियां दशकों से वैज्ञानिकों को हैरान करती रही हैं।
साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन में मेरे सहयोगियों और मैंने खुलासा किया कि ‘ब्रैडीकिनिन’ कुछ विष में क्यों पाया जाता है और यह वहां कैसे पहुंचा।
यह उत्तर विकास के एक ऐसे पहलू पर प्रकाश डालता है, जिसे अब तक अनदेखा किया गया था और जो यह दर्शाता है कि जीवन वास्तव में यूं ही नहीं है।
‘ब्रैडीकिनिन’ बहुउद्देशीय अणु
‘ब्रैडीकिनिन’ मनुष्यों और कशेरुकी (वर्टेब्रेट्स) जीवों में कई कार्य करता है। यह चोट लगने वाली जगह पर सक्रिय हो जाता है और रक्त वाहिकाओं के रिसाव को रोक देता है, जिससे अन्य सहायक अणुओं को घाव तक पहुंचने में मदद मिलती है।
यह स्थानीय संवेदी तंत्रिकाओं को भी सक्रिय करता है, जिससे दर्द होता है, जो हमें यह सिखाता है कि हमने जो किया है उसे दोबारा न करें व उस हिस्से की रक्षा करें और उसे ठीक होने देने के लिए कार्य करें।
विभिन्न प्रकार के ततैयों के विष में बार-बार बड़ी मात्रा में ‘ब्रैडीकिनिन’ की पहचान करने के बाद मैंने इस लंबे समय से चले आ रहे रहस्य को सुलझाने का निर्णय लिया।
हमने इन ‘ब्रैडीकिनिन’ की पहचान करने वाले जीनों का विश्लेषण किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि वे कुछ विष में क्यों मौजूद थे और वे वहां कैसे पहुंचे।
इससे एक आश्चर्यजनक उत्तर सामने आया।
जब हम दो ऐसे व्यक्तियों को देखते हैं जो देखने में एक जैसे लगते हैं, तो हम मान सकते हैं कि वे जुड़वां हैं या कम से कम करीबी रिश्तेदार हैं।
जब वैज्ञानिक एक जैसे अणु देखते हैं, तो अक्सर यह साझा वंश का संकेत होता है। लेकिन, जैसा कि हमने पाया ‘ब्रैडीकिनिन’ के मामले में ऐसा नहीं है।
ततैया के विष और मेंढक की त्वचा में पाए जाने वाले ‘ब्रैडीकिनिन’, कशेरुकी जीवों में पाए जाने वाले ‘ब्रैडीकिनिन’ से असंबंधित हैं।
इसके बजाय, ये दिखने में तो एक जैसे हैं, लेकिन उनकी आनुवंशिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से भिन्न है। कई मामलों में, वे संरचनात्मक रूप से पूरी तरह से एक जैसे हैं।
हमने पाया कि ‘ब्रैडीकिनिन’ ततैया और चींटियों में कम से कम चार बार स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ और संभवतः मेंढकों में इससे भी अधिक बार।
‘ब्रैडीकिनिन’ उन कई उदाहरणों में से एक है, जहाँ वैज्ञानिक जीन स्तर पर समान वातावरण या परिस्थितियों के कारण एक जैसी विशेषताएं विकसित करने वाले अलग-अलग जीव के विकास का पता लगा रहे हैं।
इन उदाहरणों ने मिलकर जीवन के विकास में इसकी महत्वपूर्ण और पहले उपेक्षित भूमिका को उजागर किया है।
यह हमें बताता है कि पर्यावरण जीन को आकार देने में व्यापक रूप से स्वीकृत धारणा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह शोध हमें बताता है कि जीवन का विकास यूं ही नहीं, अप्रत्याशित और असंभावित परिणामों का मिश्रण नहीं बल्कि वास्तव में, यह एक व्यवस्थित, नियंत्रित, पूर्वानुमानित तरीके से आगे बढ़ रहा है।
द कन्वरसेशन जितेंद्र प्रशांत नरेश
नरेश

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