जलवायु परिवर्तन के कारण शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों का क्या भविष्य होगा?

जलवायु परिवर्तन के कारण शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों का क्या भविष्य होगा?

जलवायु परिवर्तन के कारण शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों का क्या भविष्य होगा?
Modified Date: February 8, 2026 / 12:40 pm IST
Published Date: February 8, 2026 12:40 pm IST

(डेनियल स्कॉट, वाटरलू विश्वविद्यालय, मैडेलिन ओर, टोरंटो विश्वविद्यालय और रॉबर्ट स्टिगर, इन्सबर्क विश्वविद्यालय)

वाटरलू (बेल्जियम), आठ फरवरी (द कन्वरसेशन) शीतकालीन ओलंपिक खेलों का 25वां संस्करण हमारे सामने है और इटली चौथी बार इन खेलों की मेजबानी कर रहा है। वर्ष 2026 के मिलानो-कॉर्टिना शीतकालीन ओलंपिक का कार्यक्रम पिछले संस्करणों जैसा ही है- बर्फ और हिम पर खेले जाने वाले खेल, जिन्हें पहाड़ी और ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में आयोजित किया जाता है।

लेकिन जिस बर्फीली ठंड की कल्पना हम ओलंपिक खेलों के साथ करते हैं, वह शायद भविष्य में लंबे समय तक संभव नहीं रह पाएगी।

जलवायु परिवर्तन दुनियाभर में शीतकालीन खेलों को बदल रहा है। उत्तरी गोलार्ध में पिछले 50 वर्षों में सर्दियों के मौसम की अवधि छोटी हो गयी है। कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान वैश्विक औसत से दोगुनी गति से बढ़ रहा है, जिससे बर्फ की परतों में व्यापक गिरावट आई है।

बर्फीले खेलों के खिलाड़ी इन बदलावों को सीधे महसूस कर रहे हैं। हाल के वर्षों में ‘इंटरनेशनल स्की और स्नोबोर्ड फेडरेशन’ के कई विश्व कप कार्यक्रम कम हिमपात और असुरक्षित परिस्थितियों के कारण रद्द किए गए।

वर्ष 2023 में लगभग 300 चिंतित खिलाड़ियों ने फेडरेशन को पत्र लिखकर जलवायु परिवर्तन पर अधिक कार्रवाई और ‘‘भौगोलिक रूप से उचित’’ कार्यक्रम की मांग की, जो बदलते मौसम के अनुरूप हो।

साल 2021 में 20 देशों के 339 पेशेवर और ओलंपिक शीतकालीन खिलाड़ियों व कोचों के सर्वेक्षण में 90 प्रतिशत ने चिंता जताई कि जलवायु परिवर्तन शीतकालीन खेलों के भविष्य को प्रभावित करेगा।

शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक के लिए जलवायु परिवर्तन भविष्य में खेलों की मेजबानी के स्थानों को मूल रूप से प्रभावित कर सकता है। वर्ष 2022 में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने 2030 के मेजबान शहर के चयन में देरी की ताकि संभावित स्थानों के जलवायु जोखिम को बेहतर समझा जा सके।

हमारे 2024 के अध्ययन में 93 संभावित मेजबान स्थानों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि उन्नत ‘स्नोमेकिंग’ के बावजूद कई स्थान भविष्य में विश्वसनीय बर्फ उपलब्ध नहीं करा पाएंगे। 2050 के दशक तक संभावित ओलंपिक मेजबानों की संख्या आधी रह जाएगी और चिंता की बात यह है कि पैरालंपिक के लिए केवल 17 से 31 स्थान ही उपयुक्त रहेंगे।

ओलंपिक और पैरालंपिक पर संकट :

हमारे हाल के अध्ययन में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जोखिमों को कम करने के लिए कई रणनीतियों पर चर्चा की गई है। हर रणनीति का सावधानी से मूल्यांकन जरूरी है क्योंकि इनके साथ कई समझौते जुड़े हैं, जो समुदायों की मेजबानी क्षमता, खिलाड़ियों और दर्शकों के अनुभव तथा खेलों की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, बर्फीले खेलों के आयोजन स्थल मुख्य मेजबान शहर से दूर ऊंचे क्षेत्रों में रखने से जलवायु विश्वसनीयता बढ़ सकती है, लेकिन इससे यात्रा समय और उत्सर्जन बढ़ेगा तथा दर्शकों के लिए कुछ प्रतियोगिताएं देखना कठिन होगा।

इस वर्ष के मिलानो-कॉर्टिना खेलों में आयोजन स्थल उत्तरी इटली में अलग-अलग स्थानों पर फैले होंगे। इससे खिलाड़ियों और प्रशंसकों का आपसी मेलजोल कठिन होगा और टीम भावना को झटका लगेगा। कई खिलाड़ी उद्घाटन या समापन समारोह में भी शामिल नहीं हो पाएंगे क्योंकि वे सैकड़ों किलोमीटर दूर प्रतिस्पर्धा कर रहे होंगे।

कार्यक्रम में बदलाव :

चूंकि पैरालंपिक ओलंपिक के बाद होते हैं, इसलिए वे जलवायु परिवर्तन से विशेष रूप से अधिक खतरे में हैं। ‘‘वन बिड, वन सिटी’’ समझौता, जिसके तहत एक ही शहर दोनों खेलों को एक ही स्थलों पर आयोजित करता है, पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

यह समझौता पैरा खेलों को नयी पहचान और उत्कृष्टता तक ले गया है, लेकिन हमारा शोध बताता है कि यह जलवायु परिवर्तन के दबाव में टिक नहीं पाएगा। पैरालंपिक का खत्म होना शीतकालीन खेलों के लिए विनाशकारी झटका होगा।

समाधान यह हो सकता है कि पैरालंपिक को पहले आयोजित किया जाए।

हमारे विश्लेषण से पता चला कि यदि ओलंपिक और पैरालंपिक को तीन सप्ताह पहले आयोजित किया जाए तो विश्वसनीय मेजबान स्थानों की संख्या काफी बढ़ सकती है।

यदि ओलंपिक जनवरी के अंत या फरवरी के पहले सप्ताह में और पैरालंपिक फरवरी के अंत या मार्च के पहले सप्ताह में आयोजित हों, तो पैरालंपिक के लिए जलवायु-विश्वसनीय मेजबानों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाएगी।

स्नोमेकिंग का क्या?

कृत्रिम बर्फ बनाने पर निर्भरता बढ़ने से आलोचना भी हुई है, खासकर 2022 बीजिंग खेलों में जहां लगभग 100 प्रतिशत मशीन से बनी बर्फ इस्तेमाल हुई थी। 1980 से हर शीतकालीन ओलंपिक में ‘स्नोमेकिंग’ का उपयोग हुआ है और भविष्य में यह और जरूरी हो जाएगी।

हमारे अध्ययन के अनुसार, ‘स्नोमेकिंग’ के बिना शीतकालीन खेलों का मौजूदा स्वरूप संभव नहीं रहेगा। यदि कृत्रिम बर्फ न बनाई जाए तो 2050 तक विश्वसनीय मेजबानों की संख्या घटकर चार या उससे भी कम रह जाएगी।

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव से कोई भी बाहरी खेल नहीं बच पाएगा, लेकिन बर्फीले खेल सबसे पहले खतरे की घंटी हैं।

वैश्विक खेल समुदाय को मिलकर मजबूत जलवायु कार्रवाई के लिए आवाज उठानी होगी ताकि पेरिस समझौते के लक्ष्य हासिल हों, भविष्य के ओलंपियनों और पैरालंपियनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और इस वैश्विक खेल उत्सव की सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए बची रहे।

(द कन्वरसेशन) गोला देवेंद्र

देवेंद्र


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