बच्चों में मादक पदार्थों का इस्तेमाल केवल जनस्वास्थ्य नहीं, बाल संरक्षण का भी मुद्दा : प्रधान न्यायाधीश

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बच्चों में मादक पदार्थों का इस्तेमाल केवल जनस्वास्थ्य नहीं, बाल संरक्षण का भी मुद्दा : प्रधान न्यायाधीश

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  • Publish Date - September 26, 2026 / 01:43 PM IST,
    Updated On - September 26, 2026 / 01:43 PM IST

(फाइल फोटो के साथ जारी)

पटना, 26 सितंबर (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि बच्चों द्वारा मादक पदार्थों का सेवन किए जाने की समस्या को केवल जनस्वास्थ्य से जुड़ी चिंता के रूप में नहीं, बल्कि बाल संरक्षण के मुद्दे के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यहां बिहार लोक भवन में ‘मादक पदार्थों से परे बचपन: संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास’ विषय पर ‘पाटलिपुत्र प्रज्ञा प्रवाह’ व्याख्यान देते हुए ‘लांसेट’ के एक हालिया अध्ययन का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अध्ययन के अनुसार भारत में हर पांच में से कम से कम एक किशोर के मादक पदार्थों के सेवन के मध्यम से उच्च जोखिम में होने का अनुमान है।

हालांकि, उन्होंने कहा कि केवल आंकड़ों से पूरी स्थिति का पता नहीं चलता।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हर आंकड़े के पीछे एक बच्चा है और हर बच्चे की परिस्थितियां दूसरे बच्चे से अलग होती हैं। बच्चों को जोखिम की स्थिति में पहुंचाने वाली परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं, इसलिए उनसे निपटने के उपाय भी इन भिन्नताओं को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘बच्चों द्वारा मादक पदार्थों के सेवन की समस्या को केवल जनस्वास्थ्य से जुड़ी चिंता के रूप में नहीं, बल्कि बाल संरक्षण के मुद्दे के रूप में भी समझा जाना चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘बच्चे केवल भविष्य के ही नागरिक नहीं है, वे वर्तमान में भी देश के नागरिक हैं। उन्हें सुरक्षा, गरिमा, शिक्षा, देखभाल और आगे बढ़ने का अवसर पाने का अधिकार है। इसलिए बचपन को वापस लौटाने का अर्थ केवल मादक पदार्थों के सेवन को रोकना नहीं होना चाहिए।’’

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि नशे की लत से निपटने के लिए ‘‘बाल-संवेदनशील दृष्टिकोण’’ अपनाए जाने की जरूरत है ताकि बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उसकी गरिमा, गोपनीयता एवं आत्मसम्मान की भी रक्षा की जा सके।

उन्होंने कहा कि ये ‘‘प्रभावी पुनर्वास के अभिन्न अंग’’ हैं, न कि गौण पहलू।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘किसी कठिन दौर से गुजरने के कारण किसी बच्चे पर जीवन भर के लिए कोई ठप्पा नहीं लगना चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘पुनर्वास का अर्थ ऐसी परिस्थितियां पैदा करना है जिनमें बच्चा फिर से उन चीजों का अनुभव कर सके जो बचपन में मिलनी चाहिए जैसे शिक्षा, रिश्ते, खेल, विश्वास और मौजूदा मुश्किलों से आगे बेहतर भविष्य का भरोसा।’’

प्रधान न्यायाधीश ने लोगों से बच्चों का ‘‘खोया हुआ बचपन वापस दिलाने’’ और उन्हें नशे की लत से बचाने का सामूहिक संकल्प लेने का आग्रह किया।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नशे की लत से जूझ रहे किसी बच्चे से आगे बढ़ने, सीखने, स्वस्थ होने और समाज का हिस्सा बने रहने का अवसर नहीं छिनना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘‘किसी बच्चे ने यदि मादक पदार्थ का सेवन किया है तो यह तथ्य हमें पूरी कहानी नहीं बताता। इससे यह पता नहीं चलता कि उस बच्चे ने क्या झेला है, मादक पदार्थों का सेवन शुरू होने से पहले उसकी परिस्थितियां कैसी थीं, उसके आसपास अब भी कौन से खतरे मौजूद हैं या उसे स्वस्थ होने में किस तरह की मदद की जरूरत है।’’

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि रोकथाम, शुरुआती पहचान, उपचार, शिक्षा, परिवार का सहयोग, पुनर्वास और उपचार के बाद की देखभाल स्वस्थ होने की पूरी प्रक्रिया की अहम कड़ियां हैं। उन्होंने कहा, ‘‘यदि इनमें से कोई भी कड़ी गायब हो तो बच्चा सहायता के दायरे से बाहर हो सकता है।’’

प्रधान न्यायाधीश ने जोखिम की स्थिति में मौजूद और मादक पदार्थों के सेवन से प्रभावित बच्चों को समय पर उचित सेवाओं से जोड़ने के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाने, सेवाओं को अधिक सुलभ करने, कर्मियों को बेहतर प्रशिक्षण देने, गोपनीयता सुनिश्चित करने और उपचार के बाद भी सहायता जारी रखने की जरूरत पर जोर दिया।

उन्होंने मादक पदार्थों के सेवन और नशे की लत से जूझ रहे बच्चों की मदद के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय और गुणवत्तापूर्ण कानूनी सेवाओं की उपलब्धता पर भी जोर दिया।

भाषा सिम्मी रंजन

रंजन